Tuesday, April 29, 2014

Essay on Development of India in Hindi


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साठ सालों के विकास का सफ़र : क्या खोया, क्या पाया ?

शायद वृद्धावस्था में दिमाग खाली रहने के कारण भूत और वर्तमान के बीच भटकता रहता है. यही कारण है कि विगत दिनों से कई बार जीवन काल में आये बदलावों पर मन भटकता रहता है. बचपन से आज तक सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक मूल्यों में बदलाव के साथ विकास का यह 60 सालों का सफ़र कितना कुछ अपने साथ लाया व कितना कुछ अपने साथ ले गया, इस पर प्राय: मन भटकता रहता है. 

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले सात दशकों में भारत ने प्रशंसनीय प्रगति की है. शिक्षा, सुख-सुविधा के साधन, उपचार की उपलब्धता, कमाने के अवसर, संचार माध्यम तथा मनोरंजन के साधनों का तेजी से विस्तार एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. 

लोगों के आर्थिक विकास और क्रय शक्ति में वृद्धि से आज भारत विकासशील देशों में अग्रिम पंक्ति में खड़ा है. आने वाले बीस से पच्चीस वर्षों में भविष्य का अध्ययन करने वाले विद्वान भारत को जापान व अमेरिका से सम्पन्नता में आगे निकल जाने की भविष्यवाणी करने लगे हैं. सभी भारतीयों को देश की इस उपलब्धि पर गर्व महसूस होना चाहिए. 

किन्तु विकास के इस सफ़र में हमने क्या खोया है ? इस पर लोगों का ध्यान शायद बहुत कम ही जाता है. मेरे अनुसार सबसे महत्वपूर्ण पांच मनुष्यता के आधार मूल्य जो हमने इस विकास यात्रा में गवाएं हैं, वे इस उपलब्धि को बौना बनाने के लिए पर्याप्त हैं. 

1. संतोष : हमारे मनीषीयों ने संतोष को परम धन की संज्ञा दी है. किन्तु प्रबंधन विशेषज्ञों ने प्रगति के लिए इसे बाधक बतलाकर लोगों को भौतिकवाद की ओर इस प्रकार दौड़ने के लिए मजबूर कर दिया कि इतना कुछ पा लेने के पश्चात् भी और पाने की लालसा खत्म ही नहीं होती. इस अतृप्त लालसा का ही परिणाम है कि लोगों का सुख चैन गायब हो गया है. पहले जहाँ एक सब्जी रोटी खाकर मन तृप्त हो जाता था, आज कुछ भी खाने से पहले यह सोचना पड़ता है कि इसका सेहत पर क्या असर होगा. अधिक कमाने के फेर में आज लोग मिलावट, बेईमानी, लूट, धोखेबाजी, भ्रष्टाचार आदि को जायज मानने लगे हैं. वैसे देखा जाए तो हम बाजारवाद के मायाजाल में जकड़ दिए गए हैं. परिणाम स्वरुप अधिकतर लोग मानसिक तनाव से जनित बीमारियों जैसे रक्तचाप व मधुमेह से जूझ रहे हैं. संक्षेप में कहा जाए तो हम आज पहले की अपेक्षा अधिक गरीब ही हुये हैं, क्योंकि आज हम पैसों की भूख ज्यादा महसूस करते हैं. 

2. समाज : मनुष्य खुद को सामाजिक प्राणी मानकर गर्व महसूस करता है. सामाजिक होने का मतलब समाज के अन्य लोगों के प्रति संवेदनशील होना है. मुझे अच्छी तरह याद है कि बचपन में पूरा मोहल्ला एक परिवार की तरह रहता था. सभी परिवारों में एक पारदर्शिता व अपनापन था. हम बच्चे लोग आसपास के सभी लोगों को भैया, दीदी, काकाजी, ताईजी आदि संबोधनों से ना सिर्फ बुलाते थे बल्कि मान भी देते थे. हम बच्चों से कभी कोई गलती हो जाती थी तो मोहल्ले का कोई भी बड़ा व्यक्ति अधिकार से डांट देता था. डांट में छुपे स्नेह के कारण बुरा मानने का तो सवाल ही पैदा नहीं था. यह अपनापन सिर्फ मोहल्ले तक ही सीमित नहीं था बल्कि उस समय के सामाजिक बंधन का स्थानीय प्रतिरूप था. इस मजबूत सामाजिक बंधन का ही परिणाम था कि लोग गलत काम करने से डरते थे. अपनी समस्या को बांटने के लिए कई विकल्प थे इसलिए मानसिक तनाव जनित बीमारी कभी सुनने में नहीं आती थी. बढ़ते भोगवाद व सीमित परिवार की सोच ने इस सामजिक बंधन को आज इतना कमजोर कर दिया है कि बाहरी व्यक्ति तो दूर घर के किसी बड़े व्यक्ति को भी आज किसी को टोकने में डर लगता है कि बुरा ना मान जाए. सामाजिक बंधन के कमजोर होने के साथ ही लोगों के व्यवहार में आज एक स्वच्छंदता व उच्श्रंखलता दिखाई देती है. निंदनीय कार्य व दुष्कर्म भी आज लोग नि:सहाय से देखकर चुप रह जाते हैं. 

3. सच्चाई : हमारे मनीषीयों ने सच्चाई को सबसे अधिक महत्त्व दिया है. सीधे शब्दों में सच्चाई अंतरात्मा की आवाज़ है. सच्चाई का पालन करने वाले सरल ह्रदय लोग होते हैं. आजकल हर कोई एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा में लगा हुआ है, चाहे वह बच्चों की शिक्षा हो, सुख-सुविधा के साधन जुटाने की बात हो अथवा धन कमाने की दौड़. इस प्रतियोगिता में हर कोई सिर्फ आगे निकलना चाहता है. इस चाह में अंतरात्मा को कुचल डाला है. लोग दूसरों से आगे निकलने के लिए कुछ भी कर सकते हैं. विकास की इस चाहत ने समाज में एक ऐसी बीमारी फैला दी है, जिसका इलाज फ़िलहाल किसी के पास नहीं है. 

4. सम्मान : बड़ों व अथितियों का सम्मान करना हमारी संस्कृति का एक गौरवशाली अंग रहा है. बचपन से ही बच्चों को सवेरे उठकर घर में बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना सिखाया जाता था. आशीर्वाद लेते समय पूरा झुककर पैरों को छूना पड़ता था. यह एक प्रकार के व्यायाम से कम नहीं था. साथ ही बड़े लोग जो सहज भाव से आशीष वचन बोलते थे वे मनोबल को बढ़ाने वाले होते थे. प्यार व सम्मान की यही डोर परिवार व समाज को बांधे रखती थी. बिखरते परिवार व जीवन की व्यस्तता ने इस परंपरा को लगभग समाप्त ही कर दिया है. ऐसा नहीं है कि बच्चे आजकल बड़ों के पैर नहीं छूते हैं. लेकिन झुकने में कष्ट अधिक सम्मान कम झलकता है. यह प्रथा आज सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गयी है वह भी सिर्फ गिनेचुने लोगों तक सीमित. अथिति तो आजकल पहले से सूचित करके ही आ सकते हैं. कई अवसरों पर बोझ समझकर झेल लिए जाते हैं व कई अवसरों पर बहाने बनाकर टाल दिए जाते हैं. अनजान व्यक्ति को तो आजकल घर में बैठाकर पानी पिलाने से भी डर लगता है. भरोसे की इस कमी ने समाज में एक बिखराव पैदा कर दिया है. जिसके दुष्परिणाम हम सभी जानते हैं. 

5. संवेदना : दूसरों के प्रति संवेदनशील होना एक स्वस्थ समाज की पहचान है. मुझे बचपन की बातें आज तक अच्छी तरह याद हैं. दया, ममता, स्नेह आदि भावनाओं को हमारे मनीषियों ने मानवता का अभिन्न अंग माना है. ऐसा नहीं है कि आज ये भावनाएं लोगों में नहीं है. हम आज भी लोगों में ये भावनाएं देख सकते हैं. किन्तु इनका दायरा प्राय: अपने परिवार, नजदीकी मित्रों और सम्बन्धियों तक ही सीमित रह गया है. इन भावनाओं को डर, अविश्वास, असुरक्षा और स्वार्थ ने काफ़ी हद तक दबा दिया है. किसी अपरिचित व्यक्ति की मुसीबत में सहायता करने से हम लोग सामान्यतः कतराने लगे हैं. शायद यही कारण है कि जो अपराध पहले रात में चोरी छिपे किये जाते थे, आजकल खुलेआम दिन-दहाड़े हो रहे हैं. 

मैं यह बिल्कुल नहीं कहना चाह रहा हूँ कि आजकल सब कुछ गलत हो रहा है. आज का युवा अधिक बुद्धिमान, सृजनशील, मेहनती व खुली मानसिकता वाला है. किन्तु वृहद परिप्रेक्ष्य में मानव मूल्यों में गिरावट साफ़ नज़र आती है. ऐसा भी नहीं है कि ये मूल्य लुप्तप्राय: ही हो गए हैं, किन्तु इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि पहले की अपेक्षा बहुत अल्प मात्रा में देखने को मिलते हैं. इस पर हमारे आर्थिक विकास का कितना योगदान है इस पर बहस की जा सकती है. 

By Devendra Joshi 

Thank you Mr. Devendra Joshi for sharing such a thought provoking article. 

How is this essay on development of India on the cost of lost human and moral values ? 

Saturday, April 26, 2014

Essay on Eve Teasing in Hindi


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Don’t Ignore Eve Teasing 

इसे मेरी बेफिक्री कहूँ, बेवकूफ़ी, मासूमियत या फिर बहादुरी ये तो नहीं पता पर बचपन से मेरे दिमाग में ये कभी नहीं आया कि मैं लड़की हूँ इसलिए मुझे अँधेरे में अकेले बाहर नहीं निकलना चाहिए. यहाँ नहीं जाना चाहिए, वहां नहीं जाना चाहिए, इस टाइम नहीं जाना चाहिए या फिर किसी ना किसी का साथ होना चाहिए. 

घर से दूर किसी अजनबी शहर में रहते हुए भी मैं किसी भी वक्त अकेले ही बाहर निकल जाया करती थी. अंधेरों से मुझे कभी डर लगा ही नहीं. रास्ते मुझे याद नहीं रहते थे इसलिए 2-3 बार ऐसा हुआ जब मुझे पहुंचना कहीं और था और पहुँच गयी कहीं और. एक बार वक्त था सुबह के 6 बजे का और एक बार वक्त था रात के 10 बजे. पर डर कभी नहीं लगा. 

एक बार लाइट चली गयी थी. बारिश हो रही थी. रात के दस बजे थे. बाहर एक दम भयंकर अँधेरा था. अगले दिन एग्जाम था और मैं अकेले ही कैंडल लेने के लिए एक शॉप पर चली गयी. रात के दो-तीन बजे भी मुझे अकेले बाहर जाने को कह दिया जाए तो भी मुझे डर नहीं लगता था, और यह वह एरिया था जहाँ पर ज्यादातर कॉलेज के स्टूडेंट्स रहते थे. जिनमें कई बिगड़े हुए शहजादे भी थे. जब छोटी थी तब भी परीक्षाओं के समय अक्सर रात के 2:30 - 3 बजे तक खुले छत पर अकेले पढ़ती थी जब सब घर वाले सो जाते थे. चोरों का भी डर नहीं लगता था :p

शायद वो मासूमियत और बचपना था जिसकी वजह से मैंने दुनिया और दुनिया वालों को हमेशा सकारात्मक नजरिये से देखा. अनिष्ट की आशंका कभी हुई ही नहीं. और भाग्य से कभी कुछ बुरा हुआ भी नहीं. 

आज भी ऐसी ही हूँ. प्रतिबन्ध आज भी पसंद नहीं. अकेले कहीं भी जाने से डर नहीं लगता लेकिन अब थोड़ी बेवकूफ़ी वाली बहादुरी कम हो गयी है. 

पहले हद से ज्यादा इंट्रोवर्ट थी इसलिए राह चलते बिगड़े हुए लड़कों की फब्तियां, जानकार टकराने की कोशिश, कहीं भी छू कर निकल जाना आदि को बस इग्नोर कर देती थी. जब मैं 5th क्लास में पढ़ती थी तो किसी लड़के ने उल्टी सीधी बातें लिखकर एक लैटर मेरे बैग में डाल दिया था. मैंने किसी को भी नहीं बताया और छत पर जाकर रोने लगी और चुपचाप उस लैटर के बारीक-बारीक टुकड़े करके फैंक दिए. यह सबसे बड़ी बेवकूफ़ी थी. पर तब इतनी समझ नहीं थी. कुछ दिनों बाद फिर से लैटर मिला. इस बार मैंने घर पे बता दिया. प्रिंसिपल मेम को शिकायत कर दी गयी और वह हरकत फिर कभी नहीं हुई. 

कुछ सालों से एक अच्छा परिवर्तन आया है. अब तो सरे बाजार किसी को भी लेक्चर सुनाने का मादा रखती हूँ. कईयों को सुना भी चुकी हूँ. सच बहुत मजा आता है :p एक बार रात का समय था. मैं अकेली अपने रूम पे आ रही थी. पीछे 10-12 आवारा लड़कों का ग्रुप चल रहा था. कुछ बोलते जा रहे थे. अचानक किसी चीज ने मुझे छुआ. शायद कुछ फैंका गया था. मैं पीछे पलटी और तेज आवाज़ में उन्हें कुछ सुनाया, क्या सुनाया वो तो याद नहीं पर मेरे बोलने के बाद उन्होंने वैसी हरकत दुबारा नहीं की. ऐसे ही एक बार दशहरा फेयर में भीड़ का फायदा उठाते हुए लड़कों की टोली ने हमारे ग्रुप की लड़कियों को बुरे इरादे से छूने की कोशिश की. भीड़ की वजह से पता तो नहीं चला कौन है पर मैंने फिर भी तेज आवाज़ में विरोध प्रकट किया और वहां भी वह हरकत दुबारा नहीं हुई. 

यहाँ मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि लड़कियों ! छेड़खानी, फब्तियों और लड़कों की उल्टी सीधी हरकतों को बिल्कुल भी नज़रंदाज़ मत करो. जब हम इग्नोर करते हैं तो ऐसी हरकते हमारे साथ बार-बार होगी और अगर हम दुनिया, समाज की परवाह किये बगैर तुरंत अपना विरोध प्रकट करते हैं तो यकीन मानिए ना केवल हम अपना भला कर रहे हैं बल्कि कई और लड़कियों का भी भला कर रहे हैं. और हाँ बेवकूफ़ी वाली बहादुरी नहीं दिखानी है. सावधान हमेशा रहना है. :)

Feel free to tell your views on Eve Teasing.

Wednesday, April 23, 2014

Story on Donation in Hindi


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सर्वश्रेष्ठ दान 

एक गाँव में दो भाई रहते थे : रत्न और प्रयत्न. दोनों में बहुत अनुराग था. उनका काम मछलियाँ पकड़कर बाज़ार में बेचना था. 

एक दिन जब वे अपना कार्य समाप्त करके घर पर आये तो कुछ देर बाद किसी ने दरवाजा खटखटाया. रत्न ने दरवाजा खोला तो देखा एक भिखारी खड़ा था.रत्न ने उसे कुछ मछलियाँ देकर विदा किया. 

दुसरे दिन वही भिखारी फिर से आया. इस बार दरवाजा प्रयत्न ने खोला. भिखारी को देखकर वह अन्दर गया और मछली पकड़ने का काँटा लेकर आया. भिखारी को लेकर वह तालाब के किनारे पर आया. उसने मछली पकड़ने की छड़ और आटे की कुछ गोलियां भिखारी को दी और उसे मछली पकड़ना सिखाया और कहा, ‘ अब तुम भीख मांगने की बजाय मछलियाँ पकड़कर अपना जीवनयापन करो. ‘ यह कहकर प्रयत्न अपने घर आ गया. 

कई सालों बाद उस गाँव में एक धनी व्यापारी आया. उसे देखने के लिए गाँव के कई लोग इकट्ठे हो गए. रत्न और प्रयत्न भी वहीँ थे. वह व्यापारी अपने रथ से नीचे उतरा और प्रयत्न के पास आया और बोला, ‘ आपने मुझे पहचाना ?’

प्रयत्न ने कहा, ‘ नहीं, मैं तो जीवन में पहली बार इतने धनी व्यक्ति को देख रहा हूँ. ‘

व्यापारी मुस्कुराते हुए बोला, ‘मैं आपको जानता हूँ. आपने कई सालों पहले मुझे मछली पकड़ना सिखाया था. आपके उस सहयोग ने मेरा जीवन ही बदल दिया. आज मैं जो कुछ भी हूँ आपकी ही वजह से हूँ. यह छोटा सा उपहार स्वीकार कीजिये.’ 

व्यापारी ने एक बहुमूल्य रत्नों से भरी हुई थैली प्रयत्न को दी. प्रयत्न को सारा वृतांत याद आ गया. तभी रत्न ने कहा, ‘ आप मुझे तो भूल ही गए. पहली बार मैंने ही आपको भोजन के लिए मछलियाँ दी थी.‘ 

यह सुनकर व्यापारी हंसने लगा और बोला, ‘ भाई, आप को भी नहीं भूला हूँ. पर हाँ आपने एक दिन के भोजन की व्यवस्था की और आपके भाई ने जीवन भर के भोजन का प्रबंध कर दिया. आपके लिए भी उपहार है.’ यह कहकर व्यापारी ने एक सोने की चेन रत्न को दी और दोनों भाइयों को धन्यवाद कहकर वह लौट गया.

रत्न को समझ आ गया कि प्रयत्न का दान उससे अधिक मूल्यवान था. दोनों ख़ुशी-ख़ुशी घर चले गए और अपने उपहार एक ही जगह पर रख दिए क्योंकि दोनों में कुछ भी अलग नहीं था. 

Note : The above story on donation is not my own creation. This is a famous folktale. I read it somewhere and sharing it here. Feel free to tell how is this story on best charity and donation ?


Saturday, April 19, 2014

Story on Courage in Hindi


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(1)

साहस की शक्ति 

एक सेनापति बहुत चिंतित और उदास बैठा था. पत्नी ने उसे चिंतातुर देखा तो पूछा, ‘ आज आप इतने परेशान क्यों नज़र आ रहे हैं ?’ 

सेनापति ने कहा, ‘ बहुत ही बुरा समाचार मिला है. मेरी सेना युद्ध में हारती जा रही है. ‘ 

पत्नी ने कहा, ‘ मुझे इससे भी बुरा समाचार मिला है.’ 

सेनापति ने जिज्ञासा के साथ पूछा, ‘ तुम्हें कौनसा बुरा समाचार मिला है ?’ 

पत्नी ने कहा, ‘ मेरे पति का साहस टूट रहा है. इससे बुरा समाचार और क्या हो सकता है ?’ 

सेनापति तत्काल खड़ा हो गया. पत्नी के इन शब्दों ने उस पर तीव्र प्रहार किया. अब वह युद्ध के मैदान में जाकर इतनी वीरता से लड़ा कि विजय प्राप्त करके ही वापस लौटा. 

(2)

भागो नहीं सामना करो 

एक बार एक जंगली भैंसा अपने बच्चे को लेकर पहली बार जंगल में निकला. वह अपने बच्चे को जीवन से जुड़ी कई जरुरी बातें सीखा रहा था. 

बच्चे ने पिता से पूछा, ‘ मुझे किससे सावधान रहना होगा ?’ 

पिता ने कहा, ‘ तुम्हें शेर से बचकर रहना चाहिए.’ 

बच्चा शेर के नाम से डर गया और बोला, ‘ मुझे अगर कभी भी शेर दिखाई देगा तो मैं वहां से भाग जाऊँगा.’ 

पिता ने कहा, ‘ अगर तुम भागोगे तो वह तुम्हारा पीछा करके तुम्हें पकड़ लेगा और तुम्हारी गर्दन को दबोच लेगा. फिर तो तुम्हारा जीवित रहना असंभव हो जाएगा.‘

बच्चे ने कहा, ‘पिताजी, तो मुझे क्या करना चाहिए ?’ 

पिता ने कहा, ‘ सबसे पहले तो अपनी जगह पर ही खड़े रहना और उसे यह जताना कि तुम उससे बिल्कुल भी नहीं डरे हो. अगर वह वापस ना लौटे तो उसे अपने सींग दिखाना और खुरो को जमीन पर पटकना. फिर भी वह ना लौटे तो उसकी तरफ धीरे-धीरे बढ़ना और वह ना जाए तो उस पर हमला करके उसे चोट पहुँचाने की कोशिश करना. ‘ 

बच्चा घबरा कर बोला, ‘ आप यह क्या कह रहे हैं ? ऐसे तो डर के मारे मेरी जान ही निकल जायेगी और वह मुझ पर हमला कर देगा. ‘ 

पिता ने कहा, ‘ घबराना नहीं है तुम्हें. अपने पीछे देखो.’

बच्चे ने देखा कई ताकतवर भैंसे कुछ दूर खड़े थे. 

पिता ने कहा, ‘ बेटा, डर लगे तो हमेशा ये याद रखना कि हम आसपास ही हैं. अगर तुम भाग गए तो हम भी तुम्हें नहीं बचा पायेंगे. इसलिए तुम्हें शेर का मुकाबला करना है. हम तुम्हारी मदद के लिए तुम्हारे साथ ही रहेंगे. ‘

बच्चे को पिता की बात समझ आ गयी और साथ ही जीवन की एक महत्वपूर्ण शिक्षा भी मिल गयी. 

These above stories of courage are not my own creation. I read it somewhere and sharing it here. How are these hindi stories about courage ?

Sunday, April 13, 2014

Story on Determination in Hindi


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(1)

प्रतिक्रिया 

एक व्यक्ति ने नया-नया ही संन्यास लिया था. वह अपने गाँव के बाहर एक तालाब के किनारे रहता था. एक दिन वह सिरहाने पर ईंट लगाकर आराम कर रहा था. तभी कुछ औरतें तालाब पर पानी भरने के लिए आई. एक स्त्री ने संन्यासी को देखकर कहा, ‘ संन्यासी हुआ तो क्या, अभी भी सिरहाना लगाने का मोह है.’ 

संन्यासी ने जब यह सुना तो ईंट हटाकर रख दी और अपने हाथ का ही सिरहाना बनाकर लेट गया. तभी दूसरी स्त्री ने कहा, ‘ ये संन्यासी कितना आलसी है. पास में ईंट रखी है तो भी उसका उपयोग नहीं कर रहा और ऐसे ही सो गया.’ 

संन्यासी ने जब यह सुना तो उसने फिर से ईंट सिरहाने लगा ली. 

तब स्त्रियों ने कहा, ‘यह संन्यासी कितना कमजोर है. इसकी संकल्प शक्ति कितनी क्षीण है. हमारे कहने से ईंट लगाता है और हमारे कहने से ईंट निकालता है. यह संन्यासी कैसे बनेगा.’

Courtesy : Swadhyay Sandesh 

(2)

दृढ़ संकल्प 

एक बार अमरकंका के राजा पद्मनाभ ने द्रौपदी का अपहरण कर लिया था. श्री कृष्ण ने पांडवों से युद्ध करने को कहा. पांडव पराक्रमी व शक्तिशाली थे. पर पांडवों ने सोचा, ‘ आज ऐसा भयंकर युद्ध होगा कि या तो हम जीवित रहेंगे या फिर यह पद्मनाभ.’ 

युद्ध हुआ और उसमें पद्मनाभ जीत गया. पांडवों की हार हुई क्योंकि उनकी संकल्प शक्ति शिथिल थी. 

श्री कृष्ण आगे आये और संकल्प लेकर बोले, ‘ अम्हे न पउमनाहे’ अर्थात ‘ मैं रहूँगा, यह पद्मनाभ नहीं रहेगा.’

फिर से युद्ध हुआ और पद्मनाभ हार गया. 

यह दृढ़ संकल्प की शक्ति थी जिसने श्री कृष्ण को विजय दिलाई. दृढ़ संकल्पित व्यक्ति सफलता के रास्ते में आने वाली हर मुसीबत का डंट कर सामना करता है और विजय को प्राप्त करता है. यह संकल्प शक्ति ही सफलता का आधार है. 

Note : The above stories on determination are not my own creations. I read it somewhere and sharing it here. Did you like the story on determination ? 

Monday, April 7, 2014

Feminist Poem in Hindi


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छद्म नारीवादी

तुम क्यों भूल जाती हो 
वह प्यार का नहीं
है नफरत का सौदागर 
और उससे स्नेह की आकांक्षा 
है जलते अंगारों में ढूंढना सागर. 

तुम क्यों भूल जाती हो 
वह विश्वास का नहीं 
है झूठ का पुलिंदा 
जब वो कहता है खुद को सच्चा 
खुद झूठ हो जाता है शर्मिंदा. 

तुम क्यों भूल जाती हो 
स्त्री उसके लिए स्त्री नहीं 
बस देह है एक करारी 
रेशमी जुल्फ़े, नशीली आँखें, दहकते होठ 
छरहरी काया, और मादक उभारों से ज्यादा 
कुछ भी नहीं है उसके लिए एक नारी. 

तुम क्यों भूल जाती हो 
वह है स्वार्थ से भरा एक घड़ा 
तुम्हारे प्यार, विश्वास और समर्पण के 
नहीं है कोई भी मायने 
क्योंकि उसका अहंकार और मतलब है 
उसके लिए सबसे बड़ा. 

तुम क्यों भूल जाती हो 
उसकी मासूम, मोहक मुस्कान के पीछे 
छिपे हैं ख़तरनाक इरादे 
खुद चल कर आये शिकार पिंजरे में 
बस इसलिए वो करता है मीठी-मीठी बातें.

तुम क्यों भूल जाती हो 
उसका नारीवादी भाषण 
है महज एक ढ़कोसला
केवल मासूमों को ही नहीं 
तेज तर्रार स्त्रियों को भी 
उसने है छला. 

उसके दिमाग में छिपी अश्लीलता जानती हो ना 
एक छद्म नारीवादी है वो पहचानती हो ना 
उसके झूठे प्यार में हर बार तुम बस छली ही जाओगी 
वह है देह का भूखा, ना मिटाओगी उसकी प्यास 
तो उसकी नफ़रत की आग में जलायी जाओगी. 

दिल को जरा अपने आराम दो 
और दिमाग को अपने ये काम दो 
प्यार की भाषा नहीं समझते हैं ऐसे जानवर 
इसलिए सुधरेंगे वो, ऐसी उम्मीद कभी ना कर
छोड़ दो उन्हें उनके हाल पर 
वक्त लिख रहा है उनके भी अपराध 
फिरेगा पानी उनकी हर चाल पर. 

Monika Jain ‘पंछी’ 

How is this hindi poem on pseudo feminist ? 

Wednesday, April 2, 2014

Short Story in Hindi with Moral


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(1)

विवेक से करें श्रम का उपयोग 

एक आदमी को सिंचाई के लिए एक कुएं की आवश्यकता थी. एक जानकार व्यक्ति ने उसे बताया कि इसके लिए साठ हाथ की खुदाई करनी होगी. जिसे कुएं की आवश्यकता थी उसने दस-दस हाथ के छह गड्डे खोद डाले लेकिन पानी कहीं नहीं दिखा. 

वह व्यक्ति उस जानकार आदमी के पास गया और उसे समस्या बताई. जानकार आदमी ने पूछा, ‘क्या तुमने साठ हाथ की खुदाई कर ली ? ‘ 

व्यक्ति ने कहा, ‘हाँ कर ली.’ 

जानकार आदमी को आश्चर्य हुआ. वह खुद उस स्थान को देखने गया जहाँ खुदाई की गयी थी. दस-दस हाथ की गहराई के छह गड्डे खुदे हुए देखकर उसे खुदाई करने वाले की अज्ञानता समझते देर ना लगी. 

उसने खुदाई करने वाले से कहा, ‘ ऐसे छह क्या छह हजार गड्डे भी खोद दोगे तब भी पानी मिलना संभव नहीं है. जो ऊर्जा तुमने छह गड्डे खोदने में लगाई अगर वह एक कुआँ खोदने में लगाई होती तो पानी कभी का मिल चुका होता. अब एक काम करो. इनमें से किसी भी एक गड्डे को पचास हाथ और खोद दो फिर पानी मिल जाएगा.’

व्यक्ति ने वैसा ही किया और सचमुच पानी निकल आया. 

Moral : शक्ति और श्रम का उपयोग अपने विवेक से करें. विवेक से रहित श्रम के सार्थक परिणाम नहीं मिलते. 

(2)

सम्मान के अधिकारी 

एक बार एक गुरु अपने शिष्य के साथ कहीं जा रहे थे. एक व्यक्ति ने उन्हें सामने आता देख अभिवादन किया. गुरु ने शिष्य से कहा, ‘ इस व्यक्ति ने मेरे चरित्र, अनुभव और मेरी वयोवृद्धता से प्रभावित होकर मेरा अभिवादन किया है.’ 

शिष्य ने कहा, ‘ नहीं, आप भ्रम में हैं, छलावे में हैं. इस व्यक्ति ने युवावस्था में भी मेरे ऐसे चरित्र और जीवन को देखकर मुझे वंदन किया है.’ 

दोनों में बहस छिड़ गयी. गुरु कहे कि मेरा सम्मान किया है और शिष्य कहे कि मेरा. उन्होंने इसका एक हल निकाला और निर्णय लिया कि हम उस व्यक्ति से ही चल कर पूछ लेते हैं कि उसने किसे नमन किया है. 

दोनों उस व्यक्ति के पास गए और पूछा कि तुमने हम दोनों में से किसे वंदन किया था. व्यक्ति बहुत आश्चर्यचकित हुआ और कुछ सोचने लगा. कुछ देर सोचकर वह बोला, ‘ जो सम्मान पाने पर घमंड नहीं करते और सम्मान ना मिलने पर हीन भावना भी नहीं लाते मैंने उन्हीं को नमस्कार किया है.’

Note : The above short hindi moral stories are not my own creation. I read it somewhere and sharing it here.