Saturday, June 21, 2014

Romantic Love Poem in Hindi


Romantic Love Poem in Hindi Language for Him, Husband, Boyfriend, Romance, Feelings, Girlfriend, Wife, Pyar, Her Poetry, Prem Kavita, Shayari, Lines, Slogans, Sms, Messages, Rhymes, Quotes, Thoughts, Proverbs, Sayings, Words, रोमानी हिंदी प्रेम कविता, रूमानी शायरी 

तुम मिले 

तुम मिले तो लगा जैसे
सोया ख़्वाब मेरी पलकों में फिर से जागा है 
दम तोड़ चुका मेरे होने का अहसास फिर से जागा है 
जागे हैं अधूरे सपने पूरे होने की ख्वाइश में 
चलने लगी हैं साँसे तुझसे मिलने की चाहत में.

तुम मिले तो मिल गया मुझे मझधार में एक किनारा 
अरमां मेरे यूँ थामने तू आया है बन सहारा 
मुस्कुराहटें तेरी मेरे होठों पर खिलने लगी 
रोशन तेरी ये आँखें मेरी आँखों में मिलने लगी.

ख़्वाब जो सोये थे अब तक पलकों में जगने लगे हैं 
अरमान जैसे बनके घुंघरू पैरों में बजने लगे हैं 
अब ना रोक पायेगा कोई भी हमारा मिलन 
इस आस में ये फूल देखो सेज पर सजने लगे हैं. 

तेरे हाथों की छुअन से महकते मेरे लोम है 
पंख मेरे जी उठे तेरी बाहों में जो व्योम है 
तेरे स्नेह के बादल की बारिश में भीग जाने को 
खिल उठा, पुलकित हुआ मेरे तन-मन का रोम-रोम है. 

शाम जैसे बन गयी है सुरमई सुहानी 
गा रही है कोकिला तेरी मेरी कहानी
बदली-बदली सी निशायें, बदला मेरा व्यवहार है 
खुशियों की जैसे बारिश हो, ऐसा तेरा ये प्यार है. 

टिकते नहीं हैं पाँव मेरे इस जमीं पर आजकल 
तेरे नशे में उड़ रही हूँ हर घड़ी मैं हर पल 
तितलियाँ और फूल, भँवरें अब मुझे भाने लगे हैं 
गम, उदासी और आंसू दूर अब जाने लगे हैं. 

बन गया हर दिन मेरा जैसे कोई त्योंहार है 
बसंत ही बसंत है, बहार ही बहार है 
चांदनी बिखरी पड़ी जिस ओर भी नज़रे उठे 
तू चाँद मेरा बन गया ये तारों की पुकार है. 

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this romantic love poem ? 

Romantic Poem in Hindi


Romantic Poem in Hindi Language for Him, Beautiful Love Poetry, Prem Kavita, Missing Boyfriend, Girlfriend Memories, Miss You Shayari, Her Lines, Lover, Romance, Slogans, Heart Touching Rhymes, Sms, Messages, Quotes, Thoughts, Sayings, Proverbs, Words, रोमानी हिंदी प्रेम कविता, रूमानी शायरी 

तुम याद आते हो

रिमझिम बारिश की बूँदें
जब छूती है मेरी पलकें
अश्क बनकर मेरी आँखों से 
तुम बह जाते हो.

भीगी मिट्टी की ख़ुशबूं
जब महकाती मेरी साँसें
बन ख़ुशबूं मेरी साँसों में 
तुम महक जाते हो.

सूरज की पहली किरण 
जब दस्तक देती मेरे द्वारे
बन सवेरा हर तरफ 
बस तुम ही छा जाते हो.

कोयल की कूँ-कूँ 
और मयूरे की पीहूं
बन सरगम मेरे दिल के 
तार छेड़ जाते हो.

सांझ के सूरज को 
जब तकती है मेरी आँखें
बन झोंका हवा का 
मेरी जुल्फें बिखराते हो.

चांदनी रातों में 
ज़ब टूटता है कोई तारा
बंद आँखों में तुम मेरी 
ख्वाइश बन जाते हो.

गरजते हैं बादल 
जब कड़कती हैं बिजलियाँ
काँपते मेरे दिल की 
तुम धड़कन बन जाते हो.

नींद जब लेती है 
आग़ोश में मेरी आँखों को
बन सपना मेरी आँखों में 
तुम ही बस जाते हो.

जब भी उठती है कलम 
कुछ लिखने की चाहत में
बन शब्द तुम ही मेरी 
कविता सजाते हो.

जब भी पढ़ती है 
कोई कविता मेरी आँखें
हर शब्द में बस मुझे 
तुम ही नज़र आते हो

हर पल, हर घड़ी, 
हर लम्हा मेरी यादों को
बस तुम याद आते हो
बस तुम याद आते हो.

By Monika Jain 'पंछी'

Love for your sweetheart is that feeling like someone who owns all the world. When you are away from your beloved, you feel his/her presence in each and everything around you. Nature plays a crucial role for the feeling of attachment with your lover. Sun, moon, rain, rivers, wet soil, birds chirping, cool breeze, clouds all add flavour to love. How is this romantic hindi poem ?

 

Wednesday, June 4, 2014

Poem on Rape in Hindi


Poem on Rape Case in Hindi Language, Stop Accusing and Blaming Rape Victims, Balatkar, Gang Raped Women, Girls, Sexual Assualt, Abuse, Harassment, Exploitation, Rapist, Kavita, Poetry, Shayari, Sms, Slogans, Lines, Messages, Words, Proverbs, Quotes, Thoughts, Sayings, हिंदी कविता, यौन उत्पीड़न, बलात्कार पीड़िता, यौन शोषण की शिकार 

मैं अकेली चल सकती हूँ

एक अजीब सी उलझन है मन में
मन को निरंतर कुरेदता, ये कैसा सिलसिला है ?
अब तो ना दिन में सुकून है 
ना चैन रातों में मिला है.
मन को निरंतर कुरेदता, ये कैसा सिलसिला है ?

क्यों खुद से लाख बार सवाल करती हूँ ?
ये कैसी असमंजस है
क्यों खुद से ही लड़ती हूँ ?
हर बार जब खुद को आईने में देखती हूँ
उन खरोंचो से झांकती, अपनी बेबसी टटोलती हूँ.
फिर चीख-चीख कर खुद से बार-बार पूछती हूँ
‘क्या मेरी गलती थी’ ?

समाज के ऊट-पटांग सवालों में 
शर्म से बंद होते बेपरवाह तालों में 
ज़िन्दगी से रोज़ मिलते दर्द में
दुःख में और सर्द मे
हर जगह ढूँढती-खोजती हूँ
हर बार हारती हूँ फिर मैं सोचती हूँ
‘आखिर कहाँ है मेरी गलती’ ?

किसी के पाप का दंश मैं क्यों सहूँ ?
गलती उसने की तो चुप मैं क्यों रहूँ ?
जब खता नहीं मेरी कोई 
तो समाज के ताने क्यों मुझ पर रुके ?
क्यों सर मेरे माँ-बाप का शर्म से झुके ?

क्यों मैं ये सोचूं की मेरी इज्ज़त खो गई ?
क्या ऐसा दुष्कर्म करके उसकी इज्ज़त बढ़ गई ?
क्यों उसके नीच कर्म से मैं जीना छोड़ दूँ ?
क्यों ना अपनी ज़िन्दगी को एक नया मोड़ दूँ.

किसी के नापाक इरादों से 
मेरी ज़िन्दगी नहीं रूक सकती 
समाज के लाख झुकाने से भी 
मेरी हस्ती नहीं झुक सकती.
मैं नारी हूँ, बेचारी नहीं
कोमल हूँ, मैं निर्बल नहीं.

आज मैं लक्ष्मी-सरस्वती की काया हूँ 
जलती धूप में मैं शीतल छाया हूँ
पर वक्त आने पर दुर्गा-काली भी बन सकती हूँ
किसी के आसरे की नहीं ज़रूरत 
अपने न्याय के लिए खुद लड़ सकती हूँ.

डर नहीं लगता अब मुझे 
अब भी मैं अकेली चल सकती हूँ
डर नहीं लगता मुझे 
अब भी मैं अकेली चल सकती हूँ.

By Rishabh Goyal 
Kotdwar, Uttarakhand

Thank you ‘Rishabh’ for sharing such a thought provoking poem to favor ‘stop accusing rape victims’.


Tuesday, June 3, 2014

Essay on Religious Extremism in Hindi


Essay on Religious Extremism in Hindi Language, Extremist, Fanaticism, Orthodoxy, Intolerance, Hypocrisy, Bigotry, Dharmik Kattarta, Adambar, Article, Nibandh, Lekh, Anuched, Paragraph, Write Up, Thoughts, Content, Matter, Speech, धार्मिक कट्टरता, पाखण्ड, ढोंग, निबंध, लेख, अनुच्छेद 

धर्म के रक्षक ही बन रहे हैं धर्म के भक्षक 

कल पहली बार इनबॉक्स में किसी पोस्ट को हटाने की धमकी मिली :p 

पोस्ट कुछ इस तरह से थी : 

‘ ये धार्मिक आस्था भी बड़े कमाल की चीज है..लोग निम्न समझी जाने वाली जातियों के घरों का पानी तक नहीं पीते पर कूड़े-करकट, मल-मूत्र से भरी नदियों में स्नान करने से परहेज नहीं करते, चरणामृत के नाम पर पता नहीं कितने गंदे पानी का आचमन कर जाते हैं. है ना कितनी अजब-गज़ब की बात’ 

अब धमकी मिली है तो एक पोस्ट तो और बनती ही है :D

सबसे पहले तो मैं ये बता देना चाहती हूँ कि मुझे किसी भी धर्म या जाति विशेष से पहचाना जाना पसंद नहीं है. मैं सबसे पहले एक मानव हूँ और मेरा धर्म मनुष्यता है. ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं ये बात मुझे कभी परेशान नहीं करती. क्योंकि मेरे लिए अच्छाई ही ईश्वर का रूप है, और अच्छाई कि ओर कदम बढ़ाने के लिए बुराई और बुरे लोग मेरे लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं. 

धर्म के नाम पर मार-पीट, गाली-गलौच, धमकियों पर उतर आने वाले, आस्था-आस्था का ढोल पीटकर उल्टी-फुल्टी, गलत-सलत सभी बातों को सही ठहराने वाले और उन्हें दूसरों पर थोपने वाले ये बात अच्छी तरह से समझ लें कि ऐसा करके वे खुद अपने ही धर्म के सबसे बड़े दुश्मन बन रहे हैं. आप भले ही इस भ्रम में जीते रहें कि आपके ये कृत्य आपको धर्म का रक्षक कहलवायेंगे, पर सच सिर्फ इतना है कि आपके ऐसे कार्यों से धर्म के प्रति बस घृणा ही उपजती है. आप आतंकवादियों से जरा भी कम नज़र नहीं आते. 

कितनी अजीब बात हैं ना, लोग धर्म के लिए जान दे देते हैं, खून की नदियाँ बहा देते हैं, तलवारें उठा लेते हैं, गोलियां चला देते हैं, बस कुछ नहीं करते तो वह है धर्म का अनुसरण. उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने धर्म का तमगा प्यारा है. सिर्फ अपने हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई (अभी तो इनके भी बहुत सारे डिवीज़न हैं) होने पर गर्व है, और नीचता की सारी हदें पार कर लेने पर भी उनका ये नाम, तमगा और गर्व शर्मसार नहीं होता. जिसे कभी देखा तक नहीं उस अदृश्य भगवान् के लिए वे अपने भाई-बहनों का खून तक करने को तैयार हो जाते हैं. धर्म की आड़ में बलात्कार होते हैं. क्या यही सिखाता है आपका धर्म ? इसी से खुश होते हैं आपके ईश्वर ? 

धर्म का मतलब आप जैसे ढोंगी कभी नहीं जान सकते, कभी भी नहीं. आप या तो धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि देंगे या फिर प्रतिमाओं का विसर्जन कर जल को प्रदूषित करेंगे, अपनी बुराइयों का विसर्जन आपसे कभी नहीं होगा. दया, करुणा, ममता, सहिष्णुता, समानता ये सब क्या होता है, ये आप नहीं जान सकते. धर्म का पालन करना है तो सबसे पहले दूसरों के साथ वही व्यवहार करना सीखिए जैसा आप खुद के लिए चाहते हैं. 

दशहरे पर आप बुराई के प्रतीक रावण को जलाएंगे, होली पर होलिका दहन करेंगे, पर अपने मन की बुराइयों के दाह का उत्सव ? क्या कभी वो मनाया जाएगा ? ईद पर बकरों की बलि के बारे में आप कुतर्क देंगे कि अल्लाह को अपने प्रिय का अर्पण करना होता है. ये क़ुरबानी है. अरे भाई ! अल्लाह को खुश ही करना है तो खुद की बलि क्यों नहीं दे देते ? खुद के प्राणों से भी प्रिय भला कुछ होता है ? अब अगर मैं हिन्दू धर्म की बलि की चर्चा नहीं करुँगी तो आप मेरी बलि देने को भी तैयार हो जायेंगे, तो बता दूँ कि बलि तो बलि ही रहेगी. धर्म का तमगा बदलने भर से उसका अर्थ कभी नहीं बदलेगा. ये कौनसे ईश्वर हैं जो किसी के खून से प्रसन्न होते हैं ? और अगर ये ईश्वर है तो फिर दानव कौन होते हैं ? 

और तो और कुछ लोग कहते हैं ईश्वर की मर्जी से पत्ता तक नहीं हिलता. वाह! कमाल के भगवान् हैं आपके जो अपने मनोरंजन के लिए हत्याएं, बलात्कार, लूटपाट, चोरी, डकैती सब करवाते रहते हैं. क्यों ईश्वर को इतना बदनाम कर रहे हैं आप ? अपने किये धरे को क्यों हमेशा ईश्वर पर मढ़ते रहते हैं ? रहम करिए अब ईश्वर पर भी और हम पर भी और ये धर्म का झूठा चौला उतार फेंकिये, गिन्न आती है आपके दोहरे आचरण से. 

By Monika Jain ‘पंछी’ 

How is this article about religious extremism ? 


Essay on Hypocrisy in Hindi


Essay on Religious Hypocrisy in Hindi Language, Religion, Hypocrites, Blind Faith, Fetishism, Hindu Dharma Shastra, Jain Agam Granth, Uttaradhyayana Sutra, Paragraph, Nibandh, Article, Speech, Write Up, Thoughts, Lekh, Anuched, Content, Matter, हिन्दू धर्म शास्त्र, जैन आगम ग्रन्थ, धार्मिक आडम्बर, पाखंड, ढोंग, उत्तराध्ययन सुत्र, निबंध, लेख, अनुच्छेद 

ये कैसा धर्म है भाई ?

मेरे जीवन के संघर्ष को देखते हुए.. कई लोग कई तरह की सलाहें देते हैं. उन्हीने में से एक सलाह धर्म शास्त्रों का अध्ययन भी है. एक बार जैन धर्म के आगम ग्रंथों को पढने की उत्सुकता हुई. कहा जाता है कि केवलज्ञान और केवल दर्शन के पश्चात् तीर्थंकर भगवान् जो देशना देते हैं उसे ही गणधर भगवान् सुत्र रूप में लिखते हैं. इन सूत्रों को ही आगम कहा जाता है. इसमें कुल 32 आगम ग्रन्थ हैं जिनमें से मैंने उत्तराध्ययन सुत्र का ग्रन्थ किसी से पढने के लिए लिया. यह भगवान् महावीर की अंतिम देशना (निर्वाण से पूर्व का उपदेश) है. इस सुत्र में मनुष्य जन्म की दुर्लभता और महत्त्व को जानते हुए धर्म का अनुसरण करने, जीवन की क्षण भंगुरता को समझते हुए व्यर्थ कार्यों में समय बर्बाद ना करने, जीवन जीने की कला के साथ-साथ मृत्यु को भी हँसते- हँसते स्वीकार करने, अनासक्ति, लोभ, मोह, क्रोध, झूठ, छल, कपट आदि ग्रंथियों से मुक्त होने, कई सुन्दर संस्मरण, घटनाओं और मोक्ष प्राप्ति के मार्गों का उल्लेख है. 

यहाँ जैन ग्रंथों का प्रचार प्रसार मेरा उद्देश्य नहीं है. सभी धर्मों की अच्छी बातों का हमेशा स्वागत है और खोखली और आडम्बर युक्त बातों को दूर से ही नमस्ते हैं. मेरा धर्म तो हमेशा मानवता रहा है और वही रहेगा. पर यहाँ मैं कुछ और बताना चाहती हूँ. यह सुत्र मूल रूप से प्राकृत भाषा में है और इस पुस्तक में मूल गाथा के साथ-साथ उसका हिंदी अनुवाद दिया हुआ है. मेरा स्वभाव है जब भी मुझे कोई भी धर्म ग्रन्थ या पुस्तक जो संस्कृत या प्राकृत भाषा में लिखी हुई होती है देता है तो सीधे मैं हिंदी अनुवाद ही पढ़ती हूँ. इस शास्त्र के अनुवाद में बहुत ही उच्च स्तरीय, पूर्णतः शुद्ध और क्लिष्ट हिंदी भाषा का उपयोग किया गया था इसलिए कुछ-कुछ जगह पर हिंदी में समझने में भी मुझे मुश्किल आई. जिनसे मैंने उत्तराध्ययन सुत्र का ग्रन्थ पढने के लिए लिया था, उनकी पुत्री को भी वह सुत्र पढना था. उन्हें वह सुत्र देते समय मैंने यही कहा कि अनुवाद में बहुत कठिन शब्दों का प्रयोग है. इसलिए कहीं-कहीं कुछ बातें समझ नहीं आई. 

मेरे यह कहने पर उनका जवाब था - शास्त्र को हिंदी में थोड़े न पढ़ते हैं. इसमें मूल भाषा में जो अध्याय दिए हुए हैं उनका रोज पाठ करना चाहिए. धर्म तो उससे ही होगा. उनकी यह बात मेरे समझ से परे थी. उनका स्वभाव जानती थी. ज्यादा कुछ तर्क वितर्क करना करना महाभारत को जन्म देना था इसलिए मैंने बस इतना ही कहा कि जिसका मुझे अर्थ ही नहीं पता वह मेरे लिए उपयोगी कैसे हो सकता है ? यह कहकर मैं अपने काम में लग गयी. 

हालांकि जिन्होंने मुझसे ये कहा था वो खुद M Tech डिग्री धारी हैं. एक शिक्षित और अति धार्मिक कहलाये जाने वाले परिवार से सम्बन्ध रखती है जिन्होंने शादी के तुरंत बाद अपने पति को उनके माता-पिता से बिल्कुल अलग करके अपनी अलग आज़ाद दुनिया बसा ली है जहाँ वे अपने तथाकथित धर्म और अपने पति के साथ रहती हैं और पति के परिवार से कर्तव्यों के नाम पर सारे सम्बन्ध विच्छेद कर चुकी हैं. हाँ अधिकारों के नाम पर सम्बन्ध हमेशा बरक़रार रहेंगे. खेर यहाँ मेरा विषय यह नहीं है. यह सिर्फ इतना ही बताने के लिए बताया कि अति धार्मिक कहे जाने वाले लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में कैसे हो सकते हैं. और उनके लिए धर्म की परिभाषा कितनी संकीर्ण हो सकती है. 

अब बात करना चाहती हूँ मैं आप सभी से. यहाँ जिस धर्म ग्रन्थ का मैंने उल्लेख किया है उसमें जीवन को सार्थक बनाने की बातें बताई गयी है. यह बहुत बड़ी पुस्तक है कोई मंत्र मात्र नहीं है जिसके लिए यह तर्क दिया जाए कि अर्थ ना जानते हुए भी सस्वर मंत्र का वाचन करने ध्वनि के सकारात्मक प्रभाव की वजह से लाभ होता है. हालांकि इस तर्क से भी मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूँ. 

जो हम पढ़ रहें हैं, हमें उसका अर्थ ही नहीं पता, उन शब्दों को हम महसूस ही नहीं कर सकते. अर्थ नहीं पता तो निश्चित रूप से अपने जीवन में उतार भी नहीं सकते..उन्हें पढना धर्म कैसे हो सकता है ? यह तो काला अक्षर भैंस बराबर होगा. मुंह लगातार कुछ न कुछ बोले जा रहा है पर मन और मस्तिष्क को यह पता ही नहीं कि मुंह बोल क्या रहा है और कान सुन क्या रहें हैं ? यह कौनसे ज़माने का धर्म है भाई ? 

मैं तो हमेशा यह सोचती थी कि सब धर्म ग्रन्थ आज से हजारों लाखों वर्षों पहले लिखे गए हैं. उस समय संस्कृत और प्राकृत भाषा ही प्रचलन में थी. वही सभी को समझ आती थी इसलिए उसी भाषा में ग्रन्थ लिखे गए हैं. पर आज हमारी भाषाएँ बदल चुकी है. हम हिंदी, इंग्लिश और हिंगलिश बोलते हैं. ऐसे मैं धर्म की बातें भी हमें इन्हीं भाषाओँ में समझ में आएगी. कहीं ऐसा तो नहीं कि भगवान् महावीर, कृष्ण, राम आदि बस प्राकृत और संस्कृत भाषा ही समझते हैं और हमें तो बस उन्हें ही पटाना है इसलिए हमारे समझ में ना आते हुए भी हमें उसी भाषा में बोलना है. अगर ऐसा कुछ है तो कृपया ज्ञानी जन मेरा अज्ञान दूर करें. क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद भी हम वह पढ़ और बोल नहीं पाते जिसका अर्थ हमें नहीं पता :( 

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this hindi essay on Religious Hypocrisy ?