Thursday, July 31, 2014

Essay on Society Today in Hindi


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दोहरा चरित्र 

सम्मान पाने की चाह तो हर किसी की होती है, पर सबसे पहले जरुरी है, हम खुद अपनी नज़रों में सम्मानित बनें. पर अपने अन्दर झाँकने की फुर्सत कहाँ हैं किसी के पास. अपने माता-पिता का हालचाल जानने का भी जिनके पास समय नहीं, जिन्हें अपने माता-पिता की उपस्थिति अपनी स्वतंत्रता में बाधा लगती है, जो उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं, या उम्र के आखिरी पड़ाव में भी अकेले रहने को मजबूर कर देते हैं, वे लोग फादर्स डे, मदर्स डे पर इतनी मर्मस्पर्शी कविताएँ लिख देते हैं, जैसे कि उनसे ज्यादा दुनिया में कोई भी अपने माता-पिता को प्यार नहीं करता. 

जिन लोगों के लिए प्यार शब्द का मतलब सिर्फ और सिर्फ शारीरिक संतुष्टि है, जिन्हें किसी की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं, वे लोग प्रेम पर इतनी बड़ी-बड़ी बातें लिख लेते हैं कि पढ़ने वाला उनके सामने खुद को बोना समझने लगे. 

यहाँ जो नारीवाद पर भाषण देते हैं, नारी स्वतंत्रता और अधिकारों की बातें करते हैं, उनमें से कई लोग खुद नारी पर शासन करना चाहते हैं. अपने घरों में अपनी पत्नी पर हाथ उठाते हैं. असल में उनकी नज़र में नारी उनकी कामेच्छाओं को पूरा करने वाले हाड़-मांस के शरीर से ज्यादा कुछ भी नहीं. 

टीवी पर घोटाले की ख़बरें सुनते समय, सोफे और कुर्सी पर बैठे-बैठे नेताओं को कोसने वाले, फेसबुक पर लम्बे-चौड़े स्टेटस डालकर खुद को राष्ट्रवादी समझने लगते हैं. पर इनमें से कई लोग ऐसे हैं जो चुनाव के समय स्वार्थवश या रिश्वत लेकर आपराधिक प्रवृति के लोगों को वोट डाल आते हैं. 

गैंग रेप के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आते हैं. कड़कड़ाती ठण्ड और पुलिस के डंडे भी उन्हें नहीं रोक पाते. लेकिन राह चलते जब किसी लड़की को मदद की जरुरत होती है, तब वे नहीं रुकते. क्योंकि शायद तब उनके पास समय नहीं होता, या उन्हें कवर करने वाला कोई कैमरा नहीं होता, या फिर कोई शाबासी देने वाला नहीं होता. 

वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करने वाले कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अपने जीवन में एक पेड़ भी नहीं लगाया. जो हर रोज नहाने, कपड़े धोने में ढेर सारा पानी व्यर्थ बहा देते हैं. जो सड़क पर चलते हुए कहीं भी कूड़ा-कचरा फेंक देते हैं. 

अशिक्षा को कई समस्याओं की जड़ बताने वाले कितने लोगों ने कभी किसी अनपढ़ को पढ़ाया या पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया ? बिजली, गैस की बढ़ती कीमतों पर चिंता करने वालों के घर में भी पानी, बिजली की बर्बादी नहीं रूकती. जिन्होंने खुद बारह बच्चों की फ़ौज खड़ी कर रखी है, वे परिवार नियोजन पर भाषण देते नज़र आते हैं. अहिंसा, जीवदया, नशाबंदी की बातें करने वाले अगर कत्लखानों और नए बार के उद्घाटन पर जाते दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं. 

माना कि लिखना और बोलना एक कला है, पर हम जो लिख-बोल रहे हैं उसका हमारी सोच और हमारे व्यवहार से कुछ तो तालमेल होना चाहिए ? संवेदना से रहित लोगों के मुंह से संवेदनशीलता के फूल झरते देखना मेरी समझ से तो परे है. ऐसा शायद सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जिन्होंने खुद से अकेले में कभी भी साक्षात्कार नहीं किया.

By Monika Jain ‘पंछी’ 

How is this essay about society today and its double standards ? 

Tuesday, July 29, 2014

Poem on Communal Riots in Hindi


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क्या खुश होगा, तेरा अल्लाह, तेरा राम ?

हिंसा की आग में जल जाते हैं 
कितने ही मासूम आशियाने
कभी धर्म की ज्वाला 
कभी आग जाति के नाम पर
कभी क्षेत्रवाद की अग्नि ने जला दिए 
कितने ही घर.

क्या तेरा जला 
क्या तूने जलाया
अंत में तो हमने बस 
मौत का मंज़र ही पाया.

बस चीखें सुनाइ दी एक सी
क्या हिन्दू, क्या मुस्लमान
खून भी था एक सा
हुई जिससे धरती लहुलुहान.

अब रुक और सोच
क्या तुझसे यही धर्म कहता है
निर्बल की हत्या 
आखिर कैसे तू सहता है?

क्या गीता, क्या रामायण-कुरान
सब में एक ही प्रभु, एक सा है ज्ञान.
कि एक ही हैं बन्दे, उसके बस नाम अलग है
इबादत है एक सी ही, बस जाप अलग है.

अब रुक तू, ज़रा सोच 
क्या यही है तेरा इन्तकाम?
इस दर्द से, इस मंज़र से
क्या खुश होगा, तेरा अल्लाह, तेरा राम?
क्या खुश होगा, तेरा अल्लाह, तेरा राम?

By Rishabh Goyal 
Kotdwar, Uttarakhand

Inspite of the concept of secularism there are religion, caste, color and language intolerance in India. The virus of communalism has engulfed many people in our country. Since independence we are witnessing frequent hindu muslim riots. Earlier the british rulers and now the politicians are following the policy of ‘divide and rule’. No sincere efforts have ever made to fill the gap between these two major religious communities. 

Thank you Rishabh for sharing this poem on communal riots depicting it’s ugly face and the need of communal harmony.


Saturday, July 26, 2014

Sad Love Poem in Hindi


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सूखा गुलाब 

डायरी के पन्नों में रखा वह गुलाब
सूख गया है हमारे रिश्ते की तरह
पर उसमे से आती भीनी खुशबूँ
आज भी जिंदा है तेरी यादों की तरह.

कितनी रोई, कितनी चिल्लाई 
नामंजूर थी मुझे तेरी ज़ुदाई
हर पल तड़पाती रही मुझे तन्हाई
पर कम्बख़्त मौत फिर भी न आई.

धीरे-धीरे कोशिश की जीने की 
तेरी याद में आया हर आँसू
बिना बहाएँ पीने की
मनाया दिल को
प्यार सभी का ना पूरा होता है
इसका तो पहला अक्षर ही अधूरा होता है.

नहीं बहते अश्क अब मेरी आँखों से
जीवन नहीं रुकता
रह-रह कर याद आती तेरी यादों से
रोना भूलने का एक बड़ा दाम जो चुकाया है
मुस्कान को भी सदा के लिए
मेरे होठों ने भुलाया है.

आज जब देखा उस सूखे गुलाब को
धीरे-धीरे दम तोड़ते, मेरे हर ख़्वाब को 
आँसू का एक मोती, जाने कहाँ से बह आया
शायद बरसों के इंतज़ार में बहने से रुक ना पाया. 

By Monika Jain 'पंछी' 

Separation is very painful. It is one of the greatest source of pain and suffering. It is the lose of shared dreams and commitments. When we go through a breakup we experience disappointment, grief, sadness, anger, confusion, frustration and stress. Sometimes it is shocking for us. We are completely crushed and broken. The pain can seem unbearable. Higher the level of attachment and good memories lesser the chances of starting a new life without him/her we loved the most. Above poem reflect the same pain after the separation. 


How is this sad love poem about separation ? Feel free to tell via comments.

Friday, July 11, 2014

Essay on Patriotism in Hindi


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देशभक्ति के मायने 

यह भिन्न-भिन्न प्रकार के दिवस मनाने का चलन जबसे चला है तब से ही हमारे जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण लोग और चीजें सभी एक दिन विशेष में सिमटते जा रहे हैं. फिर चाहे वह फादर्स डे हो, मदर्स डे हो, वैलेंटाइन्स डे हो, वाटर डे हो, इंडिपेंडेंस डे हो या फिर रिपब्लिक डे. 

बस दिन आता है, थोड़ी कवितायेँ लिखी जाती है, भाषण दिए जाते हैं, पोस्टर्स और बैनर्स लगाये जाते हैं, स्कूलों और कॉलेजों में प्रतियोगिताएं होती है, सभाएं होती है, नाश्ता-पानी होता है और मन जाता है कोई भी दिवस. 

आजकल हमारी देशभक्ति और देशप्रेम भी तो कुछ दिनों में ही सिमट कर रह गया है. पर क्या देशभक्ति का मतलब सिर्फ तिरंगा झंडा गाड़ना या नारे लगाना भर है ? क्या बस स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर वन्दे मातरम् या जन-गण-मन गाकर हमारे कर्तव्यों की इति श्री हो जाती है ? क्या देशप्रेम से ओतप्रोत फिल्में देखकर कुछ पलों के लिए भावुक हो जाना, 2-4 आंसू बहा देना देशभक्ति है ? क्या अपने वाहनों पर तिरंगा लहराना, अपने मोबाइल में देशभक्ति की हैलो ट्यून बजाना, अपने स्क्रीन सेवर, वॉलपेपर सबको देशपभक्ति के रंग में रंग देना मात्र है देशप्रेम ? क्या आई लव माय इंडिया के स्टेटस फेसबुक पर डालना और क्रिकेट मैच के दौरान पूरे शरीर को तिरंगे के रंगों से भर लेना है देशभक्ति ? क्या चीन और पाकिस्तान पर गालियों की बौछारें कर देना है देशप्रेम ?

नहीं, बिल्कुल नहीं. देशभक्ति तो मातृभूमि के प्रति सम्मान, स्वाभिमान और वफ़ादारी की निरंतर रहने वाली भावना है. जो सिर्फ हमारी बातों और विचारों से ही नहीं छलकती बल्कि हमारे कार्यों और रुचियों से भी झलकती चाहिए. लेकिन आजकल राष्ट्रप्रेम एक क्षणिक आवेग बन गया है जो समय के साथ धुंधला जाता है. 

बेशक हर किसी के लिए सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देना संभव नहीं है. देशभक्ति का दायरा केवल बाहरी शत्रुओं से लड़ना भर भी नहीं है. आज जब देश के भीतर ही देश के कई शत्रु विद्यमान है ऐसे में देशभक्ति का दायरा बहुत विस्तृत हो जाता है. एक स्वस्थ, सुन्दर, संपन्न, विकसित, शिक्षित, खुशहाल, अपराध मुक्त, नैतिक मूल्यों से युक्त राष्ट्र के निर्माण में योगदान करके भी हम सच्चे अर्थों में देशभक्त कहला सकते हैं. 

अपने घर के साथ-साथ अपने मौहल्ले, शहर, देश, प्राकृतिक धरोहरों, पर्वत, नदियाँ, वन, झरने, तालाब सबसे प्यार करना और उन्हें स्वच्छ और सुन्दर बनाये रखना है देशभक्ति. आप जिस भी पेशे में हैं, ईमानदारी से उसे निभाना, निरंतर सुधार और बेहतरी की ओर बढ़ना है देशभक्ति. फ़िल्मी हीरो हीरोइन के प्रेम प्रसंग के बारे में बातें करने की बजाय देश, समाज और राजनीति में आ रहे परिवर्तनों पर नज़र रखना और सरकार के गलत रवैये और गलत नीतियों के खिलाफ़ सीना तानकर खड़े रहना है देशभक्ति. अपनी मातृभाषा का सम्मान करना, उसका प्रचार-प्रसार और विकास करना है देशभक्ति. 

हम अपने देश से प्यार करते हैं तो हमें आज और अभी से नशा करना छोड़ना है. नारी का सम्मान करना है. अपने काम बनवाने के लिए रिश्वत देना और लेना बंद करना है. देशहित से जुड़े मुद्दे पर आन्दोलन करते समय आवेग में आकर सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुँचाना है. स्वदेशी वस्तुओं का अधिकाधिक प्रयोग करना है. हमें जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा जैसे संकीर्ण मुद्दों से ऊपर उठकर संगठित बनना है. निजी स्वार्थों और भय के चलते किसी भी गलत नेता को वोट नहीं देना है. सड़क पर चलते समय हमें सड़क के नियमों का पालन करना है. हमें देशभक्ति को महज एक किताबी लफ्ज़ नहीं बनने देना है. हमें सही मायनों में देशभक्त बनना है. 

By Monika Jain ‘पंछी’ 

How is this hindi essay about patriotism ?

Saturday, July 5, 2014

Motivational Article in Hindi


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मुश्किलों से करें प्यार 

कल फेसबुक पर एक बहुत ही ज्यादा निराशा से भरी पोस्ट पढ़ी. दुःख ज्यादा होता है जब कोई बहुत हिम्मत वाला इंसान, जिसके कई फॉलोअर्स हो इतनी निराशाजनक बातें करें. क्योंकि वह कई लोगों का प्रेरणा स्त्रोत है और उसकी बातें एक बड़े समूह को प्रभावित करने वाली है. 

हम जीवन में भयंकर संघर्ष से गुजर रहे हैं. मुश्किलों का दूर-दूर तक कोई हल नहीं नज़र आता. हमारा साथ देने वाला कोई नहीं है. परिवार, दोस्तों में भी ऐसा कोई नहीं जिसे हम अपने दर्द का, अपने दुःख का सहारा कह सकें. इतना ही नहीं बल्कि 'कंगाली में आटा गीला' वाली कहावत को चरितार्थ करने के लिए कुछ लोग हमारे जीवन में सहारा बनने की उम्मीद जिन्दा करने आयेंगे भी और हमें पहले से भी अधिक तन्हा करके चले जायेंगे. अकेलापन हमें काटने को दौड़ेगा. हमारे संघर्ष को कई गुना बोझिल बना देगा. भविष्य में क्या होगा इस डर से रातों की नींदें उड़ सकती है. हम गहरे अवसाद में जा सकते हैं. यह या इससे भी ज्यादा बुरा हो सकता है. हम आत्महत्या के बारे में सोच सकते हैं बल्कि आत्महत्या कर भी सकते हैं. 

लेकिन आखिरी कदम उठाने से पहले एक बार हमें सोचना है. क्या हम सच में इतने कमजोर हैं ? क्या हम सच में इतने डरपोक हैं ? क्या सच में हमारी मुश्किलें सारी दुनिया के लोगों से बड़ी है ? क्या सच में किसी के सहारे के बिना हम जी नहीं सकते ? क्या सच में हमारी ज़िन्दगी इतनी ज्यादा सस्ती है ? 

हर सवाल का जवाब सिर्फ और सिर्फ 'नहीं' है. बहुत कुछ बदल जाएगा अगर हमने अपना नज़रियाँ थोड़ा सा बदल लिया तो. 

हाँ, हमें बहुत मुश्किलें मिली हैं, बहुत ज्यादा. पर हो सकता हैं ना कि हमें इतनी मुश्किलें इसलिए मिली हो क्योंकि हमसा बहादुर दूसरा और कोई नहीं जो उनका सामना कर सकें. हाँ, हमें प्रोत्साहित करने वाला कोई भी नहीं. पर क्या हम जानते हैं कि सेल्फ मोटिवेशन से ज्यादा अच्छा और बेहतर कोई प्रोत्साहन होता ही नहीं. लोग सहारा बनने आये और हमें और भी ज्यादा तोड़ कर चले गए. शायद ये इसलिए हुआ हो ताकि हम मजबूत बन सकें और ना केवल खुद अपना बल्कि दूसरों का भी सहारा बन सकें. भविष्य के बारे में सोच-सोच कर हम क्यों अपनी नींदें ख़राब करें जबकि हम किसी के लिए ये दावा भी नहीं कर सकते कि वह अगली सुबह देख पायेगा भी या नहीं. 

तो क्यों ना ये रात हम सुकून से सोकर गुजारें. क्यों ना हम सबसे पहले अपने दोस्त बन जाएँ. क्यों ना हम उन लोगों को माफ़ कर दें जिन्होंने हमें दुःख पहुँचाया. क्यों ना हम प्रकृति और इसके साये में पलने वाले निर्दोष और जरूरतमंद लोगों से प्यार करें. क्यों ना हम खुद से प्यार करें. क्यों ना हम ज़िन्दगी से प्यार करें. क्यों ना हम मुश्किलों से प्यार करें. करेंगे ना ? 

Monika Jain ‘पंछी’ 

How is this motivational hindi article about life struggles ?