Tuesday, September 30, 2014

Poem on Natural Disaster


It Might Be Too Late 

In this murk night
Between the whirling blizzards 
Every voice is lost 
Somewhere in the desert.

Those who has growled
Or ever roared 
Today they are missing 
Between these windstorms.

I see a light is far away 
Perhaps there is a shelter
Preferable to walk in the morning fog
Since this night is hauling the storm.

The cool breezes
Seem grumbling something
Something is depressing them
And it turned them into deadly weapon.

Storms are like hungry from centuries
And an anger inside the nature 
Today it wants to get everything out 
Perhaps that's why the ice sheet is laid on all.

The truth is
We do not even learn from our mistakes
Even after of nature's repeatedly warnings 
We do not realize our mistakes
Until we face our death.

Today I am missing my family 
And I'm battling for my life 
Maybe this is my last night 
But I do not think nature is incorrect in anyway.

Some people will mourn 
Also ask for forgiveness with folded hands to God 
But after a few days, they will be carrying on 
Human effigy of mistakes and they will make mistakes again.

By Chetan K Dheer

Today climate is changing very fast. Greenhouse gases we are producing having a dangerous impact on environment. Nature is giving all the warning signs in form of frequent flood, windstorm, earthquakes, tsunami, volcanic eruptions, hurricanes, landslides, tornadoes, droughts, famines, cyclones, etc. Mother earth is warning us at an alarming rate. Something needs to be done about it as soon as possible. Otherwise it might be too late leaving us only with regret. 

Thank you Chetan Ji for sharing such a thought provoking poem about this crucial issue. 

Monday, September 29, 2014

Poem on Attraction in Hindi


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कशिश 

इस कशिश को बस कशिश ही रहने दो 
ना तुम कुछ कहो 
ना मुझे कुछ कहने दो. 
कि अहसासों की स्वीकारोक्ति 
खत्म कर देगी तिलिस्म 
उन खुबसूरत पलों का 
जो जन्म ले रहे हैं 
तेरी-मेरी बातों के बीच. 
कि आगे बढ़ने की चाहत 
कर देगी हमें बहुत दूर 
जहाँ से नामुमकिन होगा वह सामीप्य 
जो दूर रहकर भी 
अब तक होता रहा महसूस. 
कि जिस सुकून की तलाश में 
बढ़ना चाहते हैं कदम 
वह है मृग मरीचिका सा 
जो सिर्फ बढ़ाएगा हमारी बेचेनियाँ 
और भर देगा हमारे बीच 
सदा का खालीपन. 
कि कैसे बताऊँ तुम्हें 
कि इन रंगीन ख्वाबों और अक्सों को 
छूने को जैसे ही बढ़ेंगे हाथ 
बुलबुलों से हो जायेंगे ये अदृश्य 
और रह जायेगी 
फकत बेरंग, उदासीन खामोशियाँ.
मैं नहीं चाहती उस मुस्कुराहट को खोना 
जो रहती है मेरे होठों पर 
जब महसूस होते हो तुम आसपास.
मैं नहीं चाहती उस मीठे इंतजार का कत्ल 
जिसे रहती है हमेशा 
तुम्हारे कुछ कहने की आस. 
मैं नहीं चाहती 
जन्म लें वे अपेक्षाएँ 
जिन्हें पूरा ना कर पाने की मजबूरी 
बिखेर दे हर ओर शिकायतों से भरी एक चुप्पी. 
मैं नहीं चाहती 
कि एक दूसरे को पाने की चाहत में 
हम खो दें सदा के लिए
ये खूबसूरत से अहसास भी 
जो ले आते हैं तुम्हें मेरे दिल के पास. 
कि रहने दो मुझे इस नशे में चूर 
जीने दो बनकर सिर्फ तुम्हारे ख्वाबों की हूर 
कि होती है ख्वाबों की दुनिया अक्सर 
हकीकत से बेहत सुन्दर 
कि झूठ ही सही 
कम से कम यहाँ 
मैं महसूस तो सकती हूँ तुम्हें 
अपनी रूह के अन्दर.

By Monika Jain ‘पंछी’ 

How this poem about attraction ? Feel free to share your views. 


Sunday, September 28, 2014

Essay on Navratri in Hindi



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नवरात्रा के नौ संकल्प 

नवरात्रा शुरू हो गए हैं. इन नौ दिनों में आप नारी शक्ति और देवी के नौ रूपों की पूजा करेंगे, नौ दिनों तक अखंड ज्योत जलाएंगे, अच्छी बात. माँ के सम्मान में नौ दिनों तक गरबा, आरती, डांडिया करेंगे, अच्छी बात. नौ दिनों तक उपवास, व्रत, फलाहार आदि करेंगे, नंगे पाँव रहेंगे, अच्छी बात. नौ ही दिन माँ को नए-नए प्रसादों का भोग लगायेंगे, ज्वारे उगायेंगे, प्रतिदिन मंदिर जायेंगे, जल चढ़ाएंगे, माँ का विशेष श्रृंगार करेंगे, कन्यायों की पूजा करेंगे, उन्हें भोजन कराएँगे, नए-नए उपहार देंगे, वह भी अच्छी बात. जप, तप, पूजा, पाठ, भक्ति, आराधना जो कुछ भी आप करेंगे, सब कुछ अच्छी बात. 

बस मेरे कुछ सवालों का जवाब दीजिये. पूजा हम उन्हीं की करते हैं ना जिनका हम आदर और सम्मान करते हैं. तो फिर अपनी हर समस्या के लिए देवी की उपासना करने वाले इस भारतीय समाज में कन्या के जन्म को अभिशाप क्यों माना जाता है ? क्यों शक्ति के उस अंश को कोख में ही मार डाला जाता है ? क्यों एक ओर आप शक्ति के जिस स्वरुप की पूजा करते हैं वहीँ दूसरी ओर उसे सम्मान, अधिकार और बराबरी का दर्जा भी नहीं दे पाते ? क्यों हर रोज अख़बार हाथ में उठाते ही ना जाने कितनी मासूमों की चीखों और चीत्कारों से घर गूंजने लगता है ? क्यों नारी को संकीर्ण सोच, कुप्रथाओं, भेदभाव, अपमान, दूसरे दर्जे का मनुष्य समझे जाने, तिरस्कार, तानों, छेड़छाड़, मार-पिटाई जैसे क्रूर व्यवहार से रूबरू होना पड़ता है ? दहेज़, शिक्षा और नौकरी पर मनमाने प्रतिबन्ध, बलात्कार, तेजाब डालना, डायन घोषित कर मारना-पीटना, मासिक चक्र के समय अपवित्र समझा जाना, सिर्फ देह समझा जाना, पराया धन मानना, गालियाँ, भद्दे-फुहड़ मजाक, और भी ना जाने क्या-क्या. कितना कहूँ, क्या-क्या बताऊँ ?

अगर हम सच में नवरात्रा मनाना चाहते हैं तो आज से और अभी से ये नौ संकल्प लें, हमारा नवरात्रा मनाना सार्थक हो जाएगा, और इससे अच्छी बात और कोई होगी नहीं. 
  • पहला संकल्प कन्या भ्रूण हत्या जैसे क्रूर विचार की हत्या का. कोख में बेटी की हत्या जैसे महापाप के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कभी भी भागीदार नहीं बनने का. अपने बेटे और बेटी में भेदभाव नहीं करने का. समय की मांग भी यही है कि बेटे और बेटी की परवरिश एक जैसे की जाए. समान प्यार, समान अधिकारों के साथ ही घर और बाहर की सभी जिम्मेदारियों में उन्हें समान रूप से भागीदार बनाया जाए. 
  • दूसरा संकल्प दहेज़ ना देने और ना लेने का. बेटियों को अपनी संपत्ति में बराबर का भागीदार बनाने का, और विवाह को व्यापार और सौदे में ना बदलने का. 
  • तीसरा संकल्प अपनी झूठी शान, इज्जत और अहम् के त्याग का. जिसकी वजह से बेटी को प्यार करने की इजाजत नहीं. अपना मनपसंद जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं. 
  • चौथा संकल्प अपनी माँ और पत्नी को सम्मान और बराबरी का दर्जा देने का. स्वार्थ वश, मोह वश या किसी भी कारण से किसी एक की उपेक्षा ना हो इसका खयाल होना चाहिए. 
  • पाँचवा संकल्प हर ऐसे कार्य की तिलांजलि का जिसमें अंधविश्वासों के नाम पर कभी नारी को अपवित्र समझा जाता है तो कभी अकेली, विधवा, परितक्यता को चुड़ैल या डायन बताकर उसका बलात्कार और मारपीट की जाती है. 
  • छठा संकल्प नारी को सिर्फ देह समझकर यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, बलात्कार, फूहड़ टिप्पणियाँ, तंज, अश्लील इशारों, तेजाब डालना जैसी कलुषित मानसिकता और वृतियों के त्याग का. नारी को एक इंसान समझकर उसके साथ इंसानों से व्यवहार का. 
  • सातवाँ संकल्प नारी को आज़ादी देने का. पर्दा प्रथा, बुरका, सिन्दूर, बिछिया, मंगल सूत्र जैसे प्रतिबन्ध और विवाह के प्रतीक सिर्फ नारी के लिए ही क्यों ? 
  • आठवाँ संकल्प नारी को वह सहजता भरा वातावरण उपलब्ध करवाने का जिसमें वह दिन हो या रात, किसी के साथ हो या अकेले बेफिक्र होकर कहीं भी आ जा सकें. अपने कार्य स्थल पर बिना किसी भय के काम कर सके. 
  • नौवां संकल्प नारी के प्रति प्यार और सम्मान का. उसके त्याग, समर्पण, सहनशीलता, ममत्व और स्नेह का मूल्य समझने का. उसके प्रति किसी भी तरह के शोषण, अत्याचार और हिंसा के परित्याग का, और इन सभी संकल्पों को याद रखने का. 
नवरात्रा के इन दिनों में माँ के प्रति श्रद्धा और सम्मान का इससे अच्छा और क्या तरीका हो सकता है ? हमें देवी नहीं बनना है, हमें बस एक इंसान समझकर इंसानों की तरह बराबरी और न्यायोचित व्यवहार चाहिए. क्या ले सकते हैं आप ये संकल्प ? क्या दे सकते हैं हमें अपनी पहचान, आज़ादी और अस्तित्व ?

Monika Jain 'पंछी' 

How is this essay about Navratri Festival and Durga Pooja in India ?

Wednesday, September 24, 2014

Potato Health Benefits in Hindi


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Potato Health Benefits / आलू के फायदे
  • आलू को सब्जियों का राजा कहा जाता है. यह महज एक सब्जी नहीं बल्कि पौष्टिक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ है. इसे वंडर फूड के नाम से भी जाना जाता है. यह एक सम्पूर्ण आहार है. 
  • आलू में स्टार्च, सोडा, पोटाश, कैल्शियम, फोस्फोरस, विटामिन ए और डी अच्छी मात्रा में होते हैं. 
  • आलू में अन्य सब्जियों की तुलना में ज्यादा मिनरल सेलेनियम पाया जाता है. यह प्रोटीन के साथ मिलकर एंटीऑक्सिडेंट एंजाइम का निर्माण करता है, जो शरीर की कई रोगों से रक्षा करता है.
  • आलू में विटामिन बी-9 और लौह तथा मैग्नीशियम आदि खनिज भी विद्यमान होते हैं. 
  • दूध के समान ही आलू भी ट्रिप्टोफेन का अच्छा स्त्रोत है. ट्रिप्टोफेन नींद बढ़ाने वाला हार्मोन है. 
  • आलू को छिलके सहित पकाना चाहिए क्योंकि आलू का सबसे अधिक पौष्टिक भाग छिलके के एकदम नीचे होता है. इसमें विटामिन, घुलनशील फाइबर और खनिज तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. एक आलू के छिलके में संतरे की तुलना में अधिक विटामिन सी होता है. 
  • आलू को उबालकर या भूनकर खाया जा सकता है. 
  • आलू के सेवन से रक्त वाहनियाँ लम्बी आयु तक लचकदार बनी रहती है. आलू के सेवन से ब्लड प्रेशर की समस्या में आराम मिलता है.
  • कच्चे आलू को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर, उसके वजन से दोगुना पानी लेकर उबालें. जब पानी आधा रह जाए तब इस पानी से चोट लगने से उत्पन्न हुई सूजन वाले अंग को धोने और सेंकने से आराम मिलता है. 
  • गर्म राख में सिके हुए आलूओं का छिलका उतारकर नमक-मिर्च लगाकर रोज खाने से गठिया रोग में फायदा पहुँचता है. 
  • जब चोट लगने से शरीर के किसी भाग पर नील (नीला निशान ) जम जाती है, तो उस स्थान पर कच्चा आलू पीसकर लगाने से राहत मिलती है. 
  • गर्म तवे या बर्तन से स्पर्श हो जाने या किसी भी कारण से शरीर का कोई हिस्सा जल जाने पर कच्चा आलू पीसकर लगाने से आराम मिलता है. 
  • आलू में पोटेशियम होता है जिसकी वजह से अम्लपित्त में भी सिका हुआ आलू खाने से लाभ होता है.
  • सिर दर्द में आलू के बीज का सेवन करने से लाभ पहुँचता है. 
  • चेहरे की रंगत को निखारने में भी आलू उपयोगी है. आलू पीसकर चेहरे पर लगाने से निखार आता है. 
  • एलर्जी और त्वचा रोगों में कच्चे आलु का रस लगाने से राहत मिलती है. 
  • झुर्रियां होने पर भी यदि कच्चे आलू को पीसकर लगाया जाए तो झुर्रिया कम होने लगती है. 
  • गुर्दे की पथरी में भी आलू का सेवन करने और बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीने से पथरी निकल जाती है.
  • आलू के हरे भाग और अंकुरित हिस्से का प्रयोग नहीं करना चाहिए. आलू के हरे भाग में सोलेमाइन नामक विषैला पदार्थ होता है जो हमारे शरीर के लिए नुकसानदायक होता है. 
Note : किसी भी तरह का उपचार / उपाय अपनाने से पहले चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें. बिना चिकित्सीय सलाह के किसी भी औषधि का सेवन ना करें. 

If you are also aware about some other health benefits of potato then feel free to submit here.

Friday, September 19, 2014

Poem on Teacher in English


Let’s be a learner forever

I've always been looking for a true teacher
But as I couldn't find
I made an assumption 
that It’s not easy to find a good mentor
in the present time.

But so ignorant I was 
I didn't knew that everyday 
I am meeting with so many teachers
Who are familiarizing me 
with the untouched aspects of life.

My failures !
Aren't they my teacher ?
They always showed me my drawbacks
Where by improvement 
I can climb the ladders of success. 

The nature ! 
It is the greatest master 
Links of knowledge are scattered 
in each of its particle
Adding these together 
make a new world of light and glare. 

Every person connected to our life is our mentor
Truth is shown to us even by a traitor
Every living being we encounter
contribute to our education 
We learn something new 
even by every situation.

Today my search is over
I don’t need a single teacher
As I can get knowledge 
even by observing myself and others 
and I can learn lessons from each particle of nature.

By Monika Jain ‘Panchi’ 

Children, our coworkers, friends,animals, plants, each and everything is offering us something to learn. Everyone who enters in our life either for few moments or for life time, he/she has at least one lesson we need to learn in our life. So we should stop, look, hear or pay attention to all these lessons. Whether something goes wrong or it goes right, we always have opportunity to learn something new that is surely very useful for our life. So let’s be a learner forever. 

How is this poem about teachers ? Feel free to share your view. 

Thursday, September 18, 2014

Essay on Teachers Day in Hindi


Essay on Happy Teachers Day in Hindi Language for Kids, Student, Shikshak Diwas par Nibandh, Guru Poornima, 5th September, Best Ideal Teacher, Adarsh Adhyapak, Information About Master, Mentor, Educator, Sir, Paragraph, Speech, Short Article, Quotes, Lines, Slogans, Thoughts, Message, Bhashan, Matter, Content, Write Up, Lekh, Anuched, शिक्षक दिवस पर निबंध, गुरु पूर्णिमा, आदर्श अध्यापक, लेख, अनुच्छेद, भाषण

कैसे हो हमारे शिक्षक 

यूँ तो हमेशा स्कूल और डिस्ट्रिक्ट टॉपर रहने और सभी गतिविधियों में सबसे अच्छी परफॉरमेंस की वजह से मैं हमेशा प्रिंसिपल सहित लगभग सभी टीचर्स की चहेती स्टूडेंट रही हूँ. हाँ, अपवाद स्वरुप एकाध ऐसे टीचर्स भी मिले हैं जिनकी वजह से कुछ कड़वे अनुभव भी रहे हैं. लेकिन मोटे तौर पर मैं यही कहूँगी कि ज्यादातर टीचर्स से हमेशा मुझे प्यार और सम्मान ही मिला है. पर फिर भी मैं यह नहीं कह सकती कि मुझे अच्छे शिक्षक मिलें. क्योंकि टीचर्स का फेवरेट होना आपके अपने गुणों की वजह से होता है. पर टीचर्स आपके फेवरेट बने इसके लिए उनमें वैसे गुण होने चाहिए जो उन्हें एक आदर्श शिक्षक के तौर पर स्थापित करे. वैसे ये मेरे निजी अनुभव है. मैं अच्छी तरह से जानती हूँ कि कुछ शिक्षक बहुत अच्छे होते हैं, जो आपके जीवन की दशा और दिशा दोनों को बदल देते हैं, जिनका आपके जीवन निर्माण में बहुत योगदान होता है, और जिन्हें आप अपनी सफलताओं का मुख्य श्रेय दे सकते हैं. ऐसे अध्यापक जिन्हें मिलते हैं वे सचमुच बहुत भाग्यशाली होते हैं. पर ये भी सच है कि ऐसे शिक्षक कुछ ही होते हैं. 

आज इस विषय पर लिखने की वजह एक खबर थी जिसमें एक 9 वीं क्लास के बच्चे ने अपने एक टीचर की रोज-रोज की डांट और पिटाई से परेशान होकर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. यह खबर पढ़ते ही मुझे बचपन की एक घटना याद आ गई. बात तब की है जब मैं पहली कक्षा में पढ़ती थी. अपने शर्मीले स्वभाव के कारण मैं ज्यादा बात नहीं करती थी. एक दिन स्कूल में प्रवेश करते समय एक अध्यापिका पास में ही बैठी थी. मुझे ध्यान नहीं रहा और मैं बिना नमस्ते किये आगे बढ़ गयी. आगे जाने पर उन्होंने मुझे वापस बुलाया और एक जोरदार तमाचा मेरे गालों पर पड़ा. मैं कुछ भी समझ नहीं पायी. बाद में पता चला तमाचे का कारण था मेरा नमस्ते ना करना. यूँ तो किसी भी घटना के लिए कई कारक जिम्मेदार होते हैं. छात्र, अभिभावक, शिक्षक सबकी अपनी-अपनी भूमिकाएँ और कर्तव्य है. इन सबके बारे में भी लिखूंगी. लेकिन आज यहाँ बस शिक्षकों के बारे में बात करना चाहती हूँ.

शिक्षकों का छात्रों को पीटना, इसे मैं किसी भी तरह से उचित नहीं ठहरा सकती. अनुशासन और गलती करने पर दंड देने के कई और तरीके हैं. पर यहाँ-वहाँ बेवजह बिना सोचे समझे हाथ उठाना और अपनी भड़ास निकालना बिल्कुल गलत है. अध्यापक का किसी छात्र से द्वेष रखना और बार-बार उसे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देना भी एक बहुत बड़ा अपराध है, जिस पर अक्सर किसी का ध्यान नहीं जाता. कई ख़बरें सुनने को मिलती है, जिसमें शिक्षक की पिटाई की वजह से कोई स्टूडेंट बेहोश हो जाता है, किसी के कान का पर्दा फट जाता है, किसी को बुखार आ जाता है, तो कोई आत्महत्या तक कर लेता है. मैं यह नहीं कह रही कि छात्रों की गलती नहीं होती. बेशक उनकी गलती होती है. लेकिन सुधारने के ये तरीके अमानवीय है, क्रूर है, अनैतिक है. 

मैंने ज्यादातर शिक्षकों में पक्षपाती रवैया देखा है. जाति, पारिवारिक संबंधों, सुन्दरता, बौद्धिकता, व्यक्तिगत स्वार्थ, ट्यूशन आदि ऐसे कई कारण हमेशा महसूस किये हैं जिनकी वजह से कुछ स्टूडेंट्स टीचर्स के लिए खास होते हैं और कुछ उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाते. मुझे याद है 11 वीं और 12 वीं कक्षा में गणित के एक सर हमेशा बच्चों को ट्यूशन पढ़ने के लिए फाॅर्स करते रहते थे, और जो उनके पास पढ़ने नहीं जाता था, वे पूरे साल उनके पीछे पड़े रहते, उनके मार्क्स काट लेते, उन्हें अपमानित करने और पीटने का कोई मौका नहीं छोड़ते. और यह बात आज भी कई स्टूडेंट्स से कई टीचर्स के लिए सुनने को मिलती है. जब मैं 9 वीं कक्षा में थी तो जिला स्तरीय किसी प्रतियोगिता के लिए मुझसे एक विषय पर 20-30 पन्नों का निबंध तैयार करवाया गया. जिसे मैंने कड़ी मेहनत करके तैयार किया, और फिर वह निबंध मुझसे लेकर उन अध्यापिका ने बड़ी क्लास की अपनी कुछ प्रिय स्टूडेंट्स को यह कहकर दे दिया कि उनका आखिरी साल है इसलिए उन्हें प्रतियोगिता में जाने देना चाहिए. यही बात बेस्ट स्टूडेंट अवार्ड के लिए भी हुई. ऐसे ही क्लास के कई बच्चों के साथ पक्षपाती व्यवहार देखा है. कई बार अच्छी स्टूडेंट होने की वजह से मुझे भी इस पक्षपाती रवैये का लाभ मिला है. लेकिन मैं इसे सही नहीं मानती. एक शिक्षक के लिए उसके सभी स्टूडेंट्स बराबर होने चाहिए. उसका व्यवहार सभी के प्रति न्याय वाला होना चाहिए पक्षपात पूर्ण नहीं. हाँ बस कमजोर, गरीब विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान शिक्षा की दृष्टि से दिया जाना चाहिए और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए. 

मुझे याद है बचपन में टीचर्स कुछ इंटेलीजेंट बच्चों को चुनते और उनसे बाकी सारे बच्चों की कॉपीज चेक करवाते. कई बार इस तरह कॉपीज चेक की है. यहाँ तक कि पासबुक्स पकड़ा दी जाती और पूरे साल ब्लैकबोर्ड पर उस पासबुक से बाकी बच्चों के लिए आंसर लिखने पड़ते. अपनी पढ़ाई को छोड़कर ये सब काम करना कितना थकाऊ और नीरस होता था इसका अंदाजा है मुझे. इसके अलावा कुछ बच्चों से टीचर्स अपने कई पर्सनल काम भी करवाती थी. यहाँ तक कि कभी-कभी बच्चों से अपना बैग उठवाना, अपनी चेयर्स, ब्लैकबोर्ड आदि साफ करवाना और अपने चाय-नाश्ते वाले कप-प्लेट भी धुलवाये जाते. आज भी यह सब होता है. प्रतिभावान छात्रों द्वारा कमजोर बच्चों की मदद करना गलत नहीं है, स्कूल की साफ़-सफाई में योगदान देना भी गलत नहीं है, लेकिन शिक्षकों द्वारा इस तरह अपनी जिम्मेदारियाँ बच्चों पर थोप देना बिल्कुल गलत है. यह सिर्फ शिक्षकों के आलसी और लापरवाही भरे व्यवहार को दर्शाता है. 

कॉलेज में अच्छे टीचर्स मिले हैं लेकिन बचपन में ज्यादातर ऐसे ही शिक्षक मिले जिन्हें अपने विषय का आधा अधुरा ज्ञान होता था. कुछ टीचर्स किसी स्टूडेंट से रीडिंग करवाकर तो कुछ पासबुक से आंसर लिखवाकर अपने कर्तव्यों की इति श्री समझ लेते थे. एग्जाम की कॉपीज में सही आंसर को गलत, गलत को सही कर देते थे. विरोध तो दूर की बात इस ओर ध्यान दिलाना भी बड़े साहस का काम था. कब टीचर बिगड़ जाए, कब तमाचे पड़ जाए, कब पूरे साल का पंगा हो जाए कुछ पता नहीं. आपसी गप्पों, स्वेटर बुनने, नाश्ते-खाने की बातों से ही टीचर्स को फुर्सत नहीं मिलती थी. हाँ कुछ अपवाद थे, जो अच्छा पढ़ाते थे. पर ऐसे टीचर्स बस अपवादस्वरूप एकाध ही थे. 

शिक्षक की अपने विषय पर अच्छी पकड़, कुशाग्रता और निपुणता होना जरुरी है, ताकि वह छात्रों की समस्याओं और जिज्ञासाओं का निदान कर सके. जरुरी नहीं कि शिक्षक के पास हर जिज्ञासा का तुरंत समाधान हो, लेकिन उसे नया सीखने, सिखाने और विषय के गहन अध्ययन के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए. टालने और जिज्ञासाओं को दबाने वाली प्रवृति नहीं होनी चाहिए. अपनी बात सरल, रोचक और प्रभावी तरीके से कहने का हुनर होना चाहिए. सदियों से चले आ रहे एक ही ढर्रे पर चलने के बजाय शिक्षकों को बच्चों को पढ़ाने के नए-नए रचनात्मक तरीकों पर विचार करना चाहिए. ऐसे तरीके अपनाएं जाने चाहिए जो स्टूडेंट्स में पढ़ाई के प्रति रूचि उत्पन्न करें, उनमें नया सीखने की ललक और उत्साह पैदा करें. कुल मिलकर कक्षा का माहौल उबाऊ और नींद लाने वाला नहीं होना चाहिए. 

कई शिक्षक शुरू में बहुत धीरे-धीरे पाठ्यक्रम करवाते हैं और एग्जाम आने पर धड़ाधड़ पढ़ाना शुरू कर देते हैं. इसके लिए एक्स्ट्रा क्लासेज लेते हैं. किसी को समझ आ रहा है या नहीं, इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं होता. बच्चे बेचारे एग्जाम्स की तैयारी करें, ट्यूशन करें, अपना होमवर्क पूरा करें या 2-3 घंटे की एक्स्ट्रा क्लासेज अटेंड करें. इसलिए एक अध्यापक को समय का पाबन्द होना बहुत जरुरी है. समय के साथ उन्हें अपना पाठ्यक्रम पूरा करवाना चाहिए और विद्यार्थियों पर होमवर्क का अनावश्यक भार नहीं डालना चाहिए.

गुरु अगर नम्र है, मृदु भाषी है, बच्चों के प्रति स्नेह रखने वाला है, अपने विषय में पारंगत है, अनुशासन की पालना करने और करवाने वाला है, समय का पाबन्द है, निष्पक्ष है, मार्गदर्शक है, अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार है तो वह स्वतः ही अपने शिष्यों से सम्मान और आदर पायेगा. सम्मान माँगा नहीं जाता, अर्जित किया जाता है, यह बात एक शिक्षक पर भी लागू होती है. शिक्षक की भूमिका हर एक व्यक्ति के जीवन में महत्पूर्ण है, चाहे वह किसी भी पद पर हो. इसलिए शिक्षकों के कर्तव्य और जिम्मेदारियों का दायरा और भी ज्यादा बढ़ जाता है. एक अच्छा शिक्षक ही देश को अच्छा नागरिक दे सकता है. यह बात शिक्षक को कभी नहीं भूलनी चाहिए और अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को बखूबी निभाना चाहिए. 

Monika Jain ‘पंछी’

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Tuesday, September 16, 2014

Poem on Winter Season in Hindi


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जाड़े की धूप

जाड़े की धूप 
टमाटर का सूप 
मूंगफली के दाने 
छुट्टी के बहाने 
तबीयत नरम 
पकौड़े गरम 
ठंडी हवा 
मुँह से धुँआ 
फटे हुए गाल 
सर्दी से बेहाल 
तन पर पड़े 
ऊनी कपड़े 
दुबले भी लगते 
मोटे तगड़े 
किटकिटाते दांत 
ठिठुरते ये हाथ 
जलता अलाव 
हाथों का सिकाव 
गुदगुदा बिछौना 
रजाई में सोना 
सुबह का होना 
सपनो में खोना. 

By Monika Jain 'पंछी'

Every season comes with a beauty of its own and has its own charm. Winter, one of the most important season of India comes after the rainy season. It starts from november and lasts till the end of february. Basking in the warm sunshine, wearing different colored woolen clothes, sitting around the fire and chatting with friends and neighbours, eating dry fruits, peanuts, jalebis, sleeping on soft bed, using quilts and blankets, all add beauty to this season. We get variety of fruits and vegetables in this season, such as peas, carrots, brinjals, beans, cauliflowers, cabbages, guavas, oranges, grapes, apples etc. Dew drops on leaves look like pearls. Winter flowers like rose, sunflower, marigold, dahlia etc with their dazzling colors look beautiful. Falling snow covering the trees, mountains and rooftops, foggy sky all looks amazing. It is a pleasant and healthy season to eat, to work hard, to harvest and to enjoy many festivals and fairs. Its a good time for students to play cricket, hockey, football, badminton etc. Dusshera, Diwali, Karwa Chauth, Lohri, Christmas, Pongal all are winter festivals. Lets welcome the winter. 

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Thursday, September 11, 2014

Sad Poetry in English


Silent Cry 

(1)

Neither overflow through tears
nor written on papers 
There are some pains 
that only resides within heart veins. 

(2)

Tell the happiness not to knock my doors 
I can’t even welcome them 
Tell the dreams to search someone else eyes 
My eyes are moist can’t dare to weave them. 

(3)

Your desires, I wish ! 
could see my difficulties 
But in front of your ambitions 
you can’t see anything else
Your game of making alive which is dead 
and killing that again 
How much my soul suffers
do you have any guess ? 

(4)

My efforts are continued to smile all the time 
but these eyes are deceiving them 
My efforts are continued to hide my wounds 
but this world is digging into them. 

(5)

Every night sleeps in your thoughts
Every morning begins with your dreams 
You have given me so much pain 
that my soul cries even during sleep. 

(6)

Neither by thundering clouds
nor by sparkling lights 
I startled when there is a silent noise 
In spite of denying my breath hear it 
In this silence 
A heart cries loud making no voice. 

(7)

No destination, no desire, not a dream anymore
I am simply doing that gives peace to my heart 
There would be a reason why i am breathing 
Just because of that I am moving on the path. 

(8)

If you stayed a stranger 
so much would survive within me 
The cost of knowing you
I paid losing myself 
How to forgive you 
How to forget everything
You character is still of disloyalty 
wrapped in selfishness. 

By Monika Jain ‘Panchi’ 

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Tuesday, September 9, 2014

Essay on Hindi Diwas in Hindi


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हिंदी को बनाएँ रोजगार की भाषा 

हिंदी दिवस आने वाला है. सच पूछो तो कभी याद नहीं रहता. रोज हिंदी में लिखते-पढ़ते हिंदी इस कदर दिलोदिमाग में रच बस गयी है कि इससे अलग अपना कोई अस्तित्व नज़र नहीं आता. प्यार तो हिंदी से बचपन से ही रहा है, पर पिछले दो-तीन सालों से लिखना शुरू किया है, तो हिंदी से ये दिल्लगी बढ़ती ही जा रही है. अपना तो हर दिन हिंदी दिवस ही है. पर अब चूँकि घोषित हिंदी दिवस आने वाला है तो कुछ विशेष मुद्दों पर बात करना चाहूँगी.

बहुत सी बातें हैं जो बहुत अजीब लगती है. कल की ही बात है, अंग्रेजी माध्यम के कुछ बच्चों से हिंदी में गिनती के बारे में पूछा, तो बड़े फक्र और गर्व से जवाब मिला कि बस 20 तक आती है. आगे सीखने के बारे में कहा तो ऐसे नाक भौहें सिकोड़ी जैसे उनकी शान पर बट्टा लगाने की बात कह दी हो.

‘मात्र 30 दिनों में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलिए’ इस तरह के विज्ञापन बोर्ड आज हर गली-मोहल्ले की शोभा बढ़ा रहे हैं. पैदा होते ही बच्चे को तुतला-तुतलाकर अंग्रेजी सिखाते माँ-बाप आज हर घर में देखे जा सकते हैं. खरपतवार की तरह उग आये अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में हिंदी में बोले जाने पर शुल्क लगाया जाता है. अपने ही देश में अपनी ही भाषा में बात करने पर शुल्क लगाना. अंग्रेज चले गए पर अंग्रेजी मानसिकता से मुक्ति अब मिलती नज़र नहीं आती. 

एक और विचित्र बात, अधिकांश लोग जो अंग्रेजी वक्तव्य में कुशल होते हैं, वे अंग्रेजी ना जानने वालों को हेय दृष्टि से देखते हैं. शुद्ध हिंदी भाषा बोलने वालों का मजाक उड़ाया जाता है. इससे बुरी बात और क्या होगी कि एक विदेशी भाषा हमारे यहाँ विभाजक का कार्य कर रही है. यह एक प्रकार का नस्ल भेद ही है जो समाज में भाषा के आधार पर दरार डाल रहा है. 

वैसे इन सबके लिए सरकारी नीतियाँ काफी हद तक जिम्मेदार है. अगर बिना किसी प्रतिबन्ध या मजबूरी के हमें अख़बारों या टीवी चैनल्स पर भाषा चुनने का अधिकार दिया जाए तो हममें से अधिकांश लोग अपनी मातृ भाषा को ही चुनेंगे. फिर भी अंग्रेजी को विशेष दर्जा दिया जाता है. हिंदी दिल की भाषा तो बन गयी पर रोजगार की भाषा नहीं बन पायी. चीन, जर्मनी, जापान और दक्षिणी कोरिया जैसे कई देश हैं जिन्होंने अपनी स्वयं की भाषा के बल पर अपार सफलता हासिल की है. अंग्रेजी वहाँ सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की भाषा है. पर भारत की सफलता तो अभी भी विदेशी भाषा पर टिकी हुई है. 

हमें अगर हिंदी को जिंदा रखना है, इसे जन-जन की भाषा बनाना है तो इसे केवल साहित्य के दायरे से बाहर लाना होगा. हिंदी भाषा में सरल, सहज, बोधगामी, गुणवत्ता युक्त साहित्य जो ज्ञान का विशाल भंडार हो, उसकी जरुरत तो है ही, लेकिन साथ-साथ बहुत जरुरी है विज्ञान, दर्शन, समाज शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि सभी विषयों पर भी अच्छी पठनीय सामग्री भी हो. क्योंकि सिर्फ साहित्य पर केन्द्रित भाषा समूचे राष्ट्र की भाषा नहीं बन सकती. उसका भविष्य अच्छा नहीं हो सकता. वह विकास की सीढ़ी नहीं बन सकती. 

बहुत जरुरी है हिंदी को रोजगार की भाषा बनाना. इसके लिए चिकित्सा, अभियांत्रिकी और रोजगार के सभी क्षेत्रों के पाठ्यक्रम हिंदी में होने चाहिए. अन्य भाषाओं का अध्ययन बिल्कुल गलत नहीं है, पर हमारी मूल शिक्षा प्रणाली और कार्य प्रणाली हिंदी आधारित होनी चाहिए. 

जो अंग्रेजी के शब्दों के हिंदी में लम्बे चौड़े अर्थ निकाल कर हिंदी का मजाक उड़ाते फिरते हैं, उनसे यही कहूँगी कि जैसे हिंदी के कई शब्दों के अंग्रेजी में समानार्थक शब्द नहीं होते, वैसे ही हिंदी में भी हर अंग्रेजी शब्द का समानार्थक शब्द होना जरुरी नहीं है. वैसे भी हिंदी का दिल तो इतना बड़ा है कि उसमें सभी भाषाओँ के जरुरी शब्दों के लिए स्थान है. ऐसे में ये बेवजह का मजाक उड़ाना अपनी मातृ भाषा का अपमान है. भावी पीढ़ियों पर इसका नकारात्मक असर ही पड़ना है.

हिंदी तो सबसे सरल और सहज भाषा है, जिसे सीखना भी आसान है और व्यवहार में लाना भी आसान है. एक अन्तराष्ट्रीय भाषा बनने के सारे गुण इसमें विद्यमान है. तो आईये हिंदी को हम अपने सपनों, अपने चिंतन, अपने प्रतिरोध, अपने समर्थन, अपने संपर्क, अपने पठन-पाठन और अपने रोजगार की भाषा बनाने की ओर कदम बढ़ाएँ. 

मोनिका जैन ‘पंछी’

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Wednesday, September 3, 2014

Tenali Raman Stories in Hindi


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(1)

राजा की तरकीब और तेनालीराम की बुद्धिमता 

एक बार तेनालीराम और राजा कृष्णदेवराय में किसी बात को लेकर अनबन हो गयी. तेनालीराम ने दरबार में आना बंद कर दिया. कई दिन बीत गए. राजा ने सेवकों से तेनालीराम को बुलाकर लाने के लिए कहा. सेवकों ने बहुत खोजा पर तेनालीराम कहीं नहीं मिले. 

राजा ने एक तरकीब सोची. उन्होंने पूरे गाँव में यह खबर फैला दी कि राजा अपने राजकीय कुएँ का विवाह कर रहे हैं. सभी प्रधानों को अपने-अपने गाँव के कुएँ लेकर विवाह में शामिल होना अनिवार्य है. जो ऐसा नहीं करेगा, उसे जुर्माने में पांच हजार स्वर्ण मुद्राएँ देनी होगी. इस आदेश ने सभी को परेशान कर दिया कि वे कुओं को कैसे ले जायेंगे ? 

तेनालीराम एक गाँव में भेष बदलकर रह रहे थे. उस गाँव के मुखिया को उन्होंने परेशान देखा तो कहा, ‘ प्रधान जी, आप चिंता ना करें. आप आसपास के प्रधानों को लेकर राजधानी पहुँचे. ‘

सभी राजधानी पहुँच गए. तेनालीराम उनके साथ ही थे. एक व्यक्ति उनका सन्देश लेकर राजदरबार पहुँचा और राजा से कहा, ‘ महाराज, हमारे कुएँ विवाह में शामिल होने के लिए राजधानी के बाहर पहुँच चुके हैं. आप कृपया राजकीय कुएँ को उनकी अगवानी के लिए भेजने का कष्ट करें, ताकि वे विवाह समारोह में शामिल हो सके. 

राजा ने उस व्यक्ति से पूछा, ‘ तुम्हें ऐसा कहने के लिए किसने कहा.’ व्यक्ति ने कहा बताया, ‘ कुछ दिनों से हमारे गाँव में एक व्यक्ति आकर रहने लगा है. उसी ने यह सुझाव हमें दिया है. ‘ यह सुनकर राजा खुद राजधानी से बाहर आये. उन्होंने तेनालीराम को गले से लगाया और ससम्मान राजदरबार में ले आये. 

(2)

ईमानदारी और भलमनसाहत का प्रमाण 

राजा कृष्णदेव राय के दरबार में तेनालीराम से ईर्ष्या करने वाले राज दरबारियों की कमी नहीं थी. दरबारी तेनालीराम के विरुद्ध राजा के कान भरते रहते थे. एक दिन राजा ने गुस्से में तेनालीराम से कहा, ‘ मैं तुम्हारी शिकायतें सुनते-सुनते परेशान हो गया हूँ. तुम दो दिन के भीतर स्वयं को ईमानदार और भला सिद्ध करो, अन्यथा राज्य छोड़कर चले जाओ.’ 

तेनालीराम पर मुसीबत आ गयी. वह दो दिन तक दरबार गया ही नही. तीसरे दिन राजा ने कोतवाल को बुलाकर कहा, ‘ तेनालीराम को दिया गया दो दिन का समय समाप्त हो गया है. उसे राज्य से बाहर निकाल दो.’ यह सुनकर दरबारी प्रसन्न हो गए. 

कोतवाल सिपाहियों के साथ तेनालीराम के घर पहुँचा. वहाँ पर रोना-पीटना मचा था. किसी ने बताया कि दुर्दशा से बचने के लिए तेनालीराम कल नदी में डूब गए. राजा को जब यह पता चला तो उनका सिर चकरा गया. दरबार में तुरंत शोक सभा बुलवाई गयी. दरबारियों ने आँसू बहा-बहाकर तेनालीराम का गुणगान किया. राजा ने भी कहा, ‘ तेनालीराम जैसा भला और ईमानदार आदमी मिलना मुश्किल है.’ 

राजा के ऐसा कहते ही एक अजनबी उठा, जिसने लबादा ओढा हुआ था. वह बोला, ‘ महाराज , तेनालीराम की ईमानदारी और भलमनसाहत का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है ? सारे दरबारियों और स्वयं राजा ने उसे एक स्वर में अच्छा बताया है.’ यह कहकर उस अजनबी ने अपना लबादा उतार दिया. वह तेनालीराम ही था. 

तेनालीराम को जीवित देखकर सभी दरबारी भौचक्के रह गए. राजा ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘ तेनालीराम, तुमसे कोई नहीं जीत सकता.’ 


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