Sunday, January 11, 2015

Makar Sankranti Story in Hindi


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हरी पतंग और लाल दुपट्टा  (राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित)

पतंगों का मौसम आ चुका था. आकाश में लाल, नीली, पीली, हरी, नारंगी ढेर सारे रंगों की पतंगें उड़ते हुए ऐसी लग रही थी, मानो इन्द्रधनुष के सारे रंग आकर आकाश में बिखर गए हों. इन रंगों की सोहबत में सारा आकाश खिलखिलाता सा नज़र आ रहा था. रेवड़ी, तिलपट्टी, मूंगफली, तिल के लड्डू सब थाली में लिए मैं भी छत पर पड़ौस के बच्चों के साथ पतंग उड़ाने पहुँच गयी. तभी छत से नीचे सड़क पर कई दिनों बाद एक चबूतरे पर बैठी रेवती नज़र आई. बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से कभी वो आकाश में उड़ती पतंगों को देखती तो कभी मायूस होकर शून्य में ताकने लगती. 

रेवती घर से थोड़ी दूर बने आधे कच्चे आधे पक्के घर में रहती थी. कुछ महीनों पहले तक तो जब उसकी माँ झाड़ू-बर्तन करने आती थी, अक्सर उसका घर में आना-जाना होता था. पर पिछले ही महीने उसकी माँ चल बसी. आसपास के लोग बताते हैं कि उसके शराबी पति ने एक रात उसे इतनी बेरहमी से पीटा कि अगली सुबह उसकी आँखें ही ना खुली और वह उस 12-13 साल की बच्ची को अकेला छोड़कर सदा के लिए चली गयी. 

रेवती की माँ रेवती से बहुत प्यार करती थी. अक्सर उसकी ही बातें करती रहती थी. रेवती उसकी इकलौती संतान थी. मैं जब भी रेवती की पढ़ाई के बारे में पूछती तो वह बड़े उत्साह से कहती, ‘ दीदी जी, रेवती को तो खूब पढ़ा लिखाकर बड़ी अफसरानी बनाना है. उसे ना मांजने पड़ेंगे यूँ घर-घर जाकर बर्तन. समझदार बड़े अफसर से ही उसका ब्याह भी रचाऊँगी. बेटी के जीवन में किसी बात की कमी ना होने दूँगी. चाहे उसके लिए दस घर और क्यों ना पकड़ने पड़े.’ 

रेवती की माँ का उत्साह देखकर बड़ा अच्छा लगता था. एक अनपढ़ गरीब औरत के दिल में अपनी बच्ची के लिए ऐसे सपने पलते देखकर दिल ख़ुशी से भर जाता. साथ ही ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले उन तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों पर गुस्सा भी आता जो आज भी लड़की के जन्म पर उदास हो जाते हैं और कुछ तो जन्म से पहले ही उसे मृत्यु की गोद में सुला आते हैं. 

रेवती पढ़ने में बहुत होशियार थी. मैं भी अक्सर रेवती को गणित और अन्य विषयों के प्रश्न हल करने में मदद करने लगी. दिल से यही चाहती थी कि रेवती की माँ की आँखों की जो चमक है, वह कभी फीकी ना पड़े. उसके सारे सपने सच हो. पर नियति को जाने क्या मंजूर था जो वो चमक भरी आँखें ही सदा के लिए मूँद गयी और उसके साथ ही रेवती को लेकर देखे सारे सपने भी सो गए. 

रेवती की माँ के गुजरने के बाद उसके शराबी पिता ने उसकी स्कूल छुड़वा दी और उसे भी घर-घर जाकर बर्तन मांजने के काम में लगा दिया ताकि उसकी शराब के पैसे जुटाए जा सके. यह सब जानकर मुझे बड़ा दुःख हुआ. एक दिन मैंने रेवती से उसकी सभी कॉपी-किताबें घर मंगवा ली और उसे कहा कि काम के बीच में वह 1 घंटा यहाँ पढ़ने आ जाया करे और किसी को यह बात ना बताये. इससे पिता को शक नहीं होगा, वह यही समझेगा कि यहाँ भी काम करने ही आती है. कुछ दिन तो यह चलता रहा पर एक दिन अचानक उसके पिता को जाने कैसे ख़बर लग गयी और वह जब रेवती पढ़ रही थी तब आया और उसका हाथ पकड़कर पीटते हुए ले जाने लगा. मैंने रोकने की कोशिश की तो उसने रेवती की सारी कॉपी किताबें मुझे घूरते हुए मेरी आँखों के सामने ही माचिस की एक तीली लगाकर जला दी. मानो मुझे कह रहा हो, अब ना करना ऐसी जुर्रत. 

उस घटना के कई दिन बाद तक रेवती नज़र नहीं आई. आज अचानक जब रेवती को चबूतरे पर अकेले बैठे देखा तो मन किया उससे बात करने का, उसका हाल पूछने का. यह सोचते हुए मैं कुछ तिल के लड्डू और रेवड़ियाँ एक अख़बार में लपेटकर नीचे आई और रेवती को अपने पास बुलाया. रेवती ने पहले डरते-डरते चारों ओर देखा और फिर दौड़कर मेरे पास आ गयी. मैंने उससे पूछा, ‘कैसी है रेवती ? सुबह से कुछ खाया या नहीं ?’ रेवती कुछ नहीं बोली. वह तो बार-बार बस आसमान में उड़ती पतंगों को देखे जा रही थी. मैंने उससे पूछा, ‘ तुझे पतंग चाहिए ?’ उसने बस सहमति में सर हिला दिया. मैंने उसे अख़बार में बंधे लड्डू और रेवड़ियाँ पकड़ाई और कहा, ‘ तू पहले इसे खा ले. तब तक मैं लेकर आती हूँ पतंग.’ यह सुनकर रेवती लड्डू-रेवड़ियाँ लेकर तुरंत वापस उसी चबूतरे पर चली गयी और वहां बैठकर मेरे वापस आने का इंतजार करने लगी. मैं छत पर रखी पतंगों में से एक हरी रंग की पतंग और मांझा ले आई और रेवती को दे दिया. मैंने देखा रेवती ने तो अख़बार खोला तक नहीं था. वह तो बस पतंग के ही इंतजार में बैठी थी. मुझे लगा कुछ देर बाद खा लेगी और यह सोचकर मैं भीतर आ गयी. 

करीब 1-2 घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई. मैंने देखा रेवती खड़ी थी. हाथ में वही पतंग और मांझा लिए हुए. मैंने कहा ये तेरे लिए ही है, तू इसे वापस क्यों लेकर आई है ? तब रेवती बोली, ‘ दीदीजी मुझे पतंग उड़ाना नहीं आता. आप प्लीज इसे उड़ा देना और मेरी माँ तक पहुँचा देना. सब कहते हैं कि मरने के बाद लोग ऊपर आसमान में चले जाते हैं. माँ भी तो वहीँ होंगी ना. आप बस उन तक ये पतंग पहुँचा दो’ और यह कहकर वह पतंग मेरे हाथ में थमाकर दौड़ी-दौड़ी चली गयी. मैं हैरत से कुछ देर उसे देखती रही, फिर अचानक पतंग पर मेरी नज़र पड़ी. जिस पर बहुत कुछ लिखा था. 

अरे ! यह तो रेवती की लिखावट है. यह देखकर मैं उन शब्दों को पढ़ने लगी. ‘ माँ ! तू मुझे छोड़कर क्यों चली गयी ? माँ तेरी बहुत याद आती है. सुबह जब बापू मार-मार कर उठाता है चाय बनाने के लिए तब चाय के हर एक उबाल के नीचे बैठने के साथ तू बहुत याद आती है. जब सुबह-सुबह आसपास के बच्चे स्कूल ड्रेस पहनकर बैग लेकर पढ़ने जाते हैं तो उनके हर एक बढ़ते कदम के साथ तू बहुत याद आती है. माँ, बापू जो भी मैं बनाती हूँ सब खा जाता है. मुझे हमेशा सूखी-ठंडी रोटियाँ खानी पड़ती है. तब हर एक कौर के गले में चुभने के साथ तू बहुत याद आती है. रात को बापू जब शराब पीकर लौटता है तब डर के मारे मैं गुसलखाने में छिप जाती हूँ. तब भी नल से टपकती हर बूँद के साथ तू बहुत याद आती है. माँ तेरे बिना नींद नहीं आती. हर बदलती करवट के साथ तू बहुत याद आती है. माँ तू वापस आ जा ना. या फिर मुझे ही अपने पास बुला ले. तेरे बिना एक दिन भी काटना बहुत मुश्किल है. तू बस वापस आ जा माँ.’ 

और यह सब पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखों से आंसू बहने लगे. विश्वास नहीं हो रहा था यह 12-13 साल की उस मासूम बच्ची के शब्द थे, जो थोड़ी देर पहले मेरे सामने खड़ी थी. मैं दौड़कर बाहर गयी कि शायद रेवती बाहर ही हो. पर वह नज़र नहीं आई. तब मैं पतंग को लेकर छत पर गयी और जाने किस विश्वास में उसे उड़ाने लगी. देखते ही देखते पतंग दूर आसमान में पहुँच कर एक बिंदु की तरह चमकने लगी. डोर का आखिरी सिरा जो हाथ में था वह मैंने छोड़ दिया. कुछ देर पतंग को देखती रही और फिर बुझे मन के साथ नीचे आ गयी. 

सुबह अचानक रेवती के घर के पास भीड़ देखी. पता चला रेवती का शराबी पिता बाहर मरा पड़ा था. एक के बाद एक यह सब घटनाएँ मुझे बहुत बैचेन कर रही थी. थोड़ी देर बाद छत पर कपड़े लेने गयी तो देखा शाम को जो पतंग उड़ाई थी उसकी डोर पास ही सूख रहे मेरे लाल दुपट्टे में अटकी हुई थी और पतंग अभी भी वैसे ही उड़ रही थी. 

शायद यह रेवती की माँ या ईश्वर का संकेत था कि मुझे अब रेवती के लिए बहुत कुछ करना था. और यही सोचकर वह लाल दुपट्टा मैंने गले में डाला और रेवती के घर की ओर चल पड़ी. 

By Monika Jain ‘पंछी’ 

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