Saturday, January 3, 2015

Poem on Clouds in Hindi


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एक बेवफा बादल

वो बादल बनकर आया और बोला 
‘प्रेम से भरा हूँ मैं 
तुझ पर बरसना चाहता हूँ
बनकर प्रेम की धारा 
तुझ संग बहना चाहता हूँ.’ 

मेरी ना 
और उसकी गुजारिश चलती रही 
उसके प्रेम को सच मान 
धीरे-धीरे मैं पिघलती गयी. 

एक मासूम नदी सी मैं, 
उसके प्रेम की फुहारों को समेट
चल दी उसके संग. 
जहाँ-जहाँ उसने मुझे मोड़ा 
मैं बहती गयी उसके प्रेम और विश्वास में रंग.

राह में मिलती रही उसे 
एक नहीं हजारों नदियाँ 
हर नदी से उसने की 
बिल्कुल वैसी ही 
प्रेम की मीठी-मीठी बतिया. 

ना जाने कितनी नदियों के संग बहकर 
वह फिर मेरे पास आता रहा 
हर नदी ने उसे ठुकराया 
और वह बस मुझे बहलाता रहा. 

मेरा कुछ कहना 
उसके नजरिये में मेरा अविश्वास था 
क्या सही क्या गलत मैं समझ ना पायी 
पर उसकी कथनी और करनी में बड़ा विरोधाभास था. 

जरा से सूरज के ताप से 
वह भाप बन उड़ जाता था 
फिर किसी और नदी की तलाश कर 
वह उस पर भी बरसना चाहता था. 

ना मिलता जब उसे कहीं भी 
वैसा प्यार और समर्पण 
तो मेरी भावनाओं को छल कहता 
तुझको ही है मेरा सर्वस्व अर्पण. 

मेरी ना अब ना ही है 
उस बादल को मंजूर नहीं 
बार-बार उड़ कर आना 
ना छूटा उसका फितूर कहीं. 

पर ये मासूम नदी 
अब पत्थरों से टकराकर 
मजबूत बन चुकी है. 
अपनी दिशा खुद तय करना 
अब ये बखूबी सीख चुकी है. 

By Monika Jain ‘पंछी’ 

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