Saturday, February 14, 2015

Essay on Social Media in Hindi


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सोशल मीडिया और महिलाएँ
(आधी आबादी में प्रकाशित) 

तुर्क के उपप्रधानमंत्री बुलेंट एरिंक का एक भाषण में कहना ‘शालीनता बहुत महत्वपूर्ण है, महिलाओं को सार्वजनिक रूप से नहीं हँसना चाहिए’, और इस बेतुके बयान के बाद से ही तुर्की महिलाओं द्वारा बड़ी संख्या में सोशल मीडिया पर अपनी हँसती हुई तस्वीरें पोस्ट करना और ‘कहकहा’ हेशटैग के अंतर्गत लाखों ट्वीट करना यह अहसास दिलाने के लिए काफी है कि सोशल मीडिया ने ‘व्हाट्स ऑन योर माइंड’ के जरिये महिलाओं को अपनी घुटन, भावनाओं, आक्रोश, गुस्से, समर्थन और विरोध सभी को खुल कर व्यक्त करने का एक नया आसमान दिया है, जिसके जरिये वह सदियों से अपनी दासता के विरुद्ध चली आ रही जंग को मुकाम तक पहुँचाने के लिए नयी ऊर्जा दे सकती है. 

गौरतबल है कि तुर्क में ट्विटर का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है और इससे पूर्व भी तुर्क में बस और ट्रेन में जानबूझकर पैर पसारकर बैठने और पास बैठी महिला को सिकुड़कर बैठने को मजबूर करने वाले पुरुषों के विरुद्ध सोशल मीडिया पर ‘डॉन्ट ऑक्यूपाई माई स्पेस’ कैंपेन चलाया जा चुका है, जिसमें ऐसे पुरुषों की फोटोज शेयर कर समूचे विश्व को इस समस्या के प्रति जागरूक किया गया था.

भारत में लगभग 11.2 करोड़ फेसबुक यूजर्स हैं और संचार क्रांति के इस युग में सोशल मीडिया परिवर्तन के एक बहुत बड़े कारक के तौर पर उभरा है. और स्वाभाविक है कि घर बैठे ही सारी दुनिया से जुड़ने के इस उपक्रम का महिलाओं के जीवन पर भी एक व्यापक प्रभाव परिलक्षित होता है. हालाँकि भारत में पुरुष और महिला यूजर्स का अनुपात 75:25 ही है पर फिर भी घरेलु महिलाओं के लिए घर बैठे ही दुनिया के कई अच्छे लोगों से जुड़ने, अपने विचारों और अपनी कला को अभिव्यक्त करने, नयी-नयी जानकारियां प्राप्त करने और अपनी समस्यायों के समाधान ढूंढने की दिशा में सोशल मीडिया बेहद कारगर सिद्ध हो रहा है.

शादी के बाद महिलाओं के बचपन और कॉलेज के लगभग सभी दोस्त छूट जाते हैं, पर उन बिछड़े दोस्तों को मिलाने और उनसे संपर्क साधने में फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की अहम् भूमिका है. महिलाएं घर से शुरू अपने छोटे-छोटे बिज़नस या आर्टवर्क के लिए भी सोशल मीडिया के जरिये सही ग्राहकों तक पहुँच सकती है. 

पुलिस और प्रशासन से न्याय पाने में असफल महिलाओं के लिए भी न्याय प्रक्रिया को त्वरित करने में सोशल मीडिया एक उपयोगी हथियार के रूप में उभरा है. देहली के चर्चित निर्भया केस में समूचे देश में बलात्कारियों के विरुद्ध क्रांति की अलख जगाने में सोशल मीडिया की प्रमुख भागीदारी रही, जिसने प्रशासन को महिलाओं की सुरक्षा हेतु नए कानून बनाने की दिशा में सोचने पर विवश किया. 

उत्तर प्रदेश में एक महिला सब इंस्पेक्टर का जब उसके ही सीनियर अधिकारी ने यौन उत्पीड़न किया और जब मामले पर सुनवाई ना हुई तो महिला पुलिसकर्मी ने फेसबुक पर एक पेज बनाया, जिसे जबरदस्त समर्थन मिला और अधिकारियों को शिकायत की जांच करने के लिए मजबूर होना पड़ा. आरुषी मर्डर, जेसिका लाल हत्याकांड और ऐसे ही कई और मामलें हैं जिनमें सोशल मीडिया जनाक्रोश की अभिव्यक्ति का एक सशक्त और प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है. इनमें से कई मामलों में इन्साफ भी मिला है. 

कुछ लड़कियों द्वारा राह चलते छेड़छाड़ करने वाले शरारती तत्वों के वीडियो बनाकर भी यूट्यूब और फेसबुक पर अपलोड किये जा रहे हैं और इन शरारती तत्वों की जबरदस्त किरकरी हो रही है, और पुलिस पर भी त्वरित कार्यवाही का दबाव पड़ रहा है. 

कुल मिलाकर सोशल मीडिया महिलाओं की अभिव्यक्ति, अस्तित्व, मुक्ति, यौन शोषण, पितृ सत्ता और अन्य सभी सामाजिक अन्यायों के विरुद्ध लड़ाई को नए आयाम दे रहा है, जिसका व्यापक असर निश्चित रूप से आने वाले दिनों में देखा जा सकता है.

पर सकारात्मक प्रभावों के साथ ही फेसबुक व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स के नकारात्मक प्रभाव भी बड़े पैमाने पर नज़र आने लगे हैं. इन दिनों तो महिलाओं से सम्बंधित साइबर क्राइम्स की बाढ़ सी आ गयी है. सच कहा जाए तो महिलाओं का जीवन आसान नहीं है, फिर चाहे वह वास्तविक दुनिया हो या फिर फेसबुक व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वर्चुअल दुनिया. 

जिस तरह महिलाएँ आज सड़क, कार्यस्थल, कॉलेज, स्कूल यहाँ तक कि अपने घर पर भी सुरक्षित नहीं है, उसी तरह सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी महिलाओं को बहुत ज्यादा सतर्क और संभल कर रहने की जरूरत है. महिलाओं द्वारा बरती गयी जरा सी लापरवाही उन्हें बड़ी भारी पड़ सकती है. 

फेसबुक पर लगभग हर दूसरी महिला को इनबॉक्स और कमेंट बॉक्स में आने वाले अश्लील संदेशों से रूबरू होना पड़ता है. बीते दिनों यूपी में एक कंप्यूटर सेंटर संचालक ने परीक्षा का फॉर्म भरने आई एक बीकॉम छात्रा का ईमेल आईडी बनाकर उसे दिया. उसके जाने के बाद उसके ईमेल आईडी और फोटो का इस्तेमाल कर एक फेसबुक आईडी बनाया और इस आईडी पर अश्लील फोटोज और पोस्ट्स डाल दी. जिसका पता छात्रा को अपना ईमेल अकाउंट चेक करने पर लगा. इसी तरह नोएडा में रहने वाली एक युवती के हैदराबाद में इंजीनियरिंग के दौरान उसके साथ पढ़ने वाले एक सहपाठी ने एकतरफा प्रेम के चलते इग्नोर किये जाने पर फेसबुक पर एक फर्जी आईडी बनाकर उसके मोबाइल नंबर और अश्लील तस्वीर डाल दी. जब लड़की को कई अजनबी लड़कों के फोन आने लगे तो उसके पैरों तले जमीन ही खिसक गयी. 

फेसबुक पर अपनी अच्छी से अच्छी सेल्फीज और पिक्स शेयर कर ज्यादा से ज्यादा लाइक पाने का जूनून इस कदर हावी है कि इसके चलते कॉलेज गर्ल्स अपनी बॉडी इमेज को लेकर बहुत कांशस होती जा रही है और वजन कम करने के फेर में ईटिंग डिसऑर्डर का शिकार हो रही है. एलबम्स या अपने कंप्यूटर में पिक्स को कैद करने की तुलना में उनका शेयर किया जाना बेहतर है पर ये देखना बहुत जरुरी है कि हम उन्हें जिन लोगों के बीच शेयर कर रहे हैं वे कितने विश्वसनीय हैं और उनकी सोच का स्तर क्या है. 

सोशल मीडिया के के जरिये दुनिया भर में क्राइम और वेश्यावृत्ति को भी बढ़ावा मिल रहा है. तहकीकात में पता चला है कि फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स का उपयोग युवतियों और महिलाओं को फंसाने में किया जा रहा है. मानव तस्करी करने वाले माफिया सोशल मीडिया के माध्यम से काम देने के बहाने युवतियों और महिलाओं को फंसाते हैं और उन्हें कैद कर वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करते हैं. पहले इन लोगों को खुद जाकर महिलाओं और ग्राहकों से मिलना पड़ता था, पर सोशल मीडिया ने इनका काम आसान कर दिया है. और पुलिस के लिए इन अपराधियों को पकड़ना और भी मशक्कत भरा काम हो गया है. 

पटना में तो एक आईपीएस पुलिस अधिकारी का ही एक व्यक्ति ने फर्जी अकाउंट बना लिया और लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाने के साथ-साथ ट्रस्ट में दान करने के नाम पर भी लाखों रुपये ऐंठ लिए. 

फेसबुक पर अनजान लोगों से दोस्ती बढ़ाना और प्यार कर बैठना भी कई मामलों में खतरनाक साबित हो रहा है. किशोर-किशोरियों के भटकने में भी सोशल मीडिया की नकारात्मक भूमिका देखी जा सकती है. वर्चुअल दुनिया के खुलेपन और आज़ादी से प्रभावित हो किशोरियां और युवतियां जाने-अनजाने ही कई समस्याओं को आमंत्रित कर रही है.

पुणे में फेसबुक पर चैटिंग के दौरान एक युवती को एक युवक से प्यार हो गया. चैटिंग से बातें फ़ोन तक और फिर मुलाकात तक पहुँची. युवक ने युवती को अपने घर ले जाकर उसका कई दिनों तक यौन शोषण किया. युवती के वापस जाने पर युवक ने उसकी सोने की अंगूठी भी छीन ली. युवती जब गर्भवती हो गयी तो उसने युवक से संपर्क करने की कोशिश की पर उसे बदसलूकी का सामना करना पड़ा.

इसी तरह बेंगलुरु की एक 20 वर्षीय छात्रा की मुलाकात २ वर्ष पूर्व फेसबुक पर एक लड़के से हुई. दोस्ती प्यार में बदल गयी पर लड़की के घरवालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. जिसके चलते लड़की ने लड़के से रिश्ता तोड़ दिया. इस पर लड़के ने उस लड़की की न्यूड तस्वीरें पोर्न साईट पर डाल दी. लड़की के निजी पलों की ये तस्वीरें उसने छिप-छिप कर खींच ली थी. लड़की को जब अजीबोगरीब फोन कॉल्स आने लगे और एक अनजान लड़के ने जब उसकी ही न्यूड तस्वीर उसे भेजी तब उसे इस बारे में पता चला. 

हालाँकि फेसबुक से शुरू होने वाले प्यार के सभी मामलों का सिर्फ दु:खद अंत ही नहीं होता. फेसबुक के जरिये मिले कई युवक-युवतियों ने प्रेम और शादी की अनूठी मिसाल भी पेश की है. अमेरिका के इंडियाना प्रांत की युवती ने जो कि वहाँ एक होटल में मैनेजर है, गुजरात के एक कम पढ़े-लिखे किसान से अपने प्रेम प्रसंग को शादी में परिणित किया. वह भारतीय संस्कृति से बहुत प्रभावित हुई और दोनों ने हिन्दू रीति-रिवाज से विवाह किया. पर वहीँ दूसरी और कुछ दम्पत्तियों के बीच फेसबुक अविश्वास उत्पन्न कर तलाक का कारण भी बन रहा है. 

कुल मिलाकर सोशल मीडिया की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस तरह से इस्तेमाल किया जाए. निजी स्तर पर सावधानीपूर्वक इसके इस्तेमाल के साथ ही बड़े पैमाने पर इसे सामाजिक सरोकारों से जोड़ने पर ही इसकी सकारात्मक शक्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है.

फेसबुक एडिक्शन सिंड्रोम, आसपास के लोगों से दूर होना, सामाजिक गतिविधियों में कम भागीदारी, इन्टरनेट उपलब्ध ना होने पर बेचैनी, लाइक्स कम होने पर चिड़चिड़ापन, प्रसिद्धि बढ़ने पर आत्ममुग्धता, दूसरों के लाइक्स और कमेंट देखकर ईर्ष्या ये सब भी फेसबुक और सोशल मीडिया के साइड इफेक्ट्स हैं जिनसे बचना बेहद जरुरी है. सोशल मीडिया तनाव, वैमनस्य और अफवाहों के प्रसार का माध्यम नहीं बनना चाहिए. 

इन सबसे इतर अपनी आवाज़ को मुखर करने, अपराधियों के विरुद्ध दबाव निर्मित कर न्याय की लड़ाई लड़ने, आर्थिक मदद जुटाने, अपनी समस्यायों से दुनिया को अवगत कराने और उनका समाधान पाने की दिशा में आधी आबादी के लिए सोशल मीडिया एक अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. इसके जरिये ना केवल न्याय की दिशा में देशव्यापी आन्दोलन किये जा सकते हैं बल्कि पुलिस, प्रशासन और सरकार को भी न्याय के पक्ष में अपनी कार्यवाही के लिए मजबूर किया जा सकता है. जरूरत बस यह है कि महिलाओं को सोशल मीडिया को इस्तेमाल करने के कारगर तरीके सीखने होंगे, क्योंकि सोशल मीडिया के इन साधनों से जुड़े जोखिम कम नहीं है. जरुरत सकारात्मक और संतुलित उपयोग की है.

By Monika Jain 'पंछी' 

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