Thursday, February 19, 2015

Poem on Wind in Hindi


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हवा की सरगोशियाँ 

आजकल हवाएँ क्यों अपनों सी लगती है 
और ये दुनिया कुछ रंगीन सपनों सी लगती है
दिल की जमीं पर उतरा है फ़रिश्ता कोई 
जिसकी धड़कनें मेरी धड़कनों सी लगती है. 

करती हैं हवाएँ जब कानों में सरगोशियाँ 
तो लगता है जैसे तूने कुछ कहा है 
साँसें तेरी खुशबूं पहचान लेती है 
कुछ ऐसा तेरा असर हो रहा है. 

जुल्फें उड़ाते हवाओं के झोंके 
तेरी अंगुलियाँ सुलझने से रोके 
सर-सर सरकता दुपट्टा चला है 
ह्रदय हो झंकृत तुझसे मिला है. 

साँसों में उठती लहरों को थाम 
चली है हवाएँ मुझको भिगाने 
भीगेंगे इनसे मेरे होंठ जब 
ये चूमेगी उनको तुझ तक पहुँचाने. 

रात में देती है थपकी हवाएँ 
तेरी गोद में जैसे झपकी सी आये 
मीठे से सपनों में मीठा सा तू 
मुझे और पास जैसे अपने बुलाये. 

सूरज की रश्मि लिए जो हवा 
आती है जैसे कि तूने हो छेड़ा 
अलसाई आँखों पे उसकी छुअन 
होता है तुझ संग मेरा हर सवेरा. 

By Monika Jain ‘पंछी’ 

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