Monday, June 1, 2015

Maharana Pratap Biography in Hindi



Biography / Hindi Essay / Jeevan Parichay : Maharana Pratap Singh

महाराणा प्रताप की जीवनी / Rana Pratap Ki Jivani 

“भगवान एकलिंग की शपथ है, प्रताप के इस मुख से अकबर तुर्क ही कहलायेगा. मैं शरीर रहते उसकी अधीनता स्वीकार करके उसे बादशाह नहीं कहूँगा. सूर्य जहाँ उगता है, वहाँ पूर्व में ही उगेगा. सूर्य के पश्चिम में उगने के समान प्रताप के मुख से अकबर को बादशाह निकलना असंभव है. “

ये हैं वीरता, शौर्य, बुद्धिमता और दृढ़ प्रतिज्ञा के प्रतीक महाराणा प्रताप के शब्द जिनका जन्म 9 मई, 1540 ई. में राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह व रानी जीवत कँवर के यहाँ हुआ था. ये वहीँ उदयसिंह हैं जिनके प्राणों की रक्षा पन्नाधाय ने अपने पुत्र की बलि देकर की थी. महाराणा प्रताप एकमात्र ऐसे हिन्दू राजा थे जिन्होंने कभी भी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की. 

कहते हैं पूत के पाँव पालने में ही दिखाई देने लगते हैं. बचपन में ‘कीका’ नाम से पुकारे जाने वाले महाराणा प्रताप साधारण शिक्षा की बजाय खेलकूद और हथियार बनाने की कला में अधिक रूचि लेते थे. वे बचपन से ही स्वाभिमानी, बहादुर और धार्मिक आचरण वाले थे. 

महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक 1 मार्च 1573 ई. को गोगुन्दा में हुआ था. उस समय दिल्ली पर मुग़ल बादशाह अकबर का शासन था. सम्राट अकबर ने राजपूत राजाओं से संधि व वैवाहिक संबंधों के जरिये अपने राज्य का निर्भय विस्तार किया. मारवाड़, आमेर, बीकानेर और बूंदी के नरेश अकबर के सामने झुक चुके थे. यहाँ तक की महाराणा प्रताप के सगे भाई ने भी अकबर से मिलकर अपने कुल की राजधानी प्राप्त कर ली. अकबर महाराणा प्रताप को अपने अधीन आधे हिंदुस्तान का वारिस बनाने को तैयार था. प्रताप को मनाने के लिए उसने जलाल सिंह, मानसिंह, भगवानदास और टोडरमल को शांति दूत बनाकर भेजा पर महाराणा प्रताप जिनके पास न अपनी राजधानी थी न ही वित्तीय साधन, ऐसी विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने स्वाभिमान को जिन्दा रखा और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए साहस पूर्वक संघर्ष किया. 30 वर्षों के लम्बे समय में भी अकबर जैसा शक्तिशाली सम्राट महाराणा प्रताप को ना झुका पाया और ना बंदी बना पाया. 

शोलापुर की विजय के पश्चात् हिंदुस्तान लौटते हुए मानसिंह ने राणा प्रताप से मिलने की इच्छा प्रकट की. प्रताप ने उसका स्वागत किया लेकिन भोजन के समय स्वयं उपस्थित ना होकर अपने पुत्र अमरसिंह को भेज दिया. मानसिंह अकबर के अधीन था और उसकी बुआ जोधाबाई का विवाह अकबर के साथ किया गया था. इसलिए प्रताप मानसिंह के साथ भोजन करना उचित नहीं समझते थे. मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और भोजन गृहण नहीं किया. मानसिंह के साथ राणा प्रताप के इस व्यवहार से अकबर को मेवाड़ पर आक्रमण का अवसर मिल गया और इस अपमान का बदला लेने के लिए मानसिंह व आसफ़ खां के नेतृत्व में मुग़ल सेना ने 18 जून, 1576 को मेवाड़ पर आक्रमण किया. यह युद्ध इतिहास प्रसिद्द हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जाना जाता है. एक ही दिन चले इस युद्ध में करीब 17000 लोग मारे गए. एक अजब संयोग यह था कि इस युद्ध में मुग़ल सेना के अग्रिम दल में राजपूत राजा जगन्नाथ के नेतृत्व में राजपूत सैनिक थे और महाराणा प्रताप के अग्रिम दल में मुस्लिम सरदार हकीम खां सूरी के नेतृत्व में पठान सैनिक थे.

हल्दीघाटी सरीखा विश्व में अन्य कोई बलिदान स्थल नहीं होगा. युद्ध के दौरान वहां की मिट्टी रक्त रंजित हो गयी . हल्दीघाटी का कण-कण आज भी मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के पराक्रम, साहस, भीलों और राजपूतों के अपने राजा के लिए बलिदान और त्याग की अमर गाथा कहता है. 20000 राजपूत एवं भील सैनिकों (जिनके मुख्य हथियार भाले, तलवार, धनुष बाण और गुलेल थी) के साथ मुगलों के 80000 सैनिकों (जो मैदानी तोपों और बंदूकों से सुसज्जित थे) का सामना आसान नहीं था. पर शाही सेना पहले ही हमले में भाग निकली थी. यह राणा की जीत थी पर जब किसी ने अफवाह फैलाई कि बादशाह खुद आ रहा है तो शाही सेना का मनोबल बढ़ गया और बराबर की टक्कर होने लगी. 

प्रताप ने अद्भुत वीरता का परिचय दिया. राणा प्रताप जब मानसिंह से युद्ध कर रहे थे तब असंख्य मुग़ल सैनिकों ने उन्हें घेर लिया. इसी समय चेतक ने जब अपने दोनों पाँव हाथी पर चढ़ाये तब हाथी की सूंड पर बंधी तलवार से चेतक का एक पैर कट गया. महाराणा प्रताप भी घायल हो गए. महाराणा को संकट में देखकर झाला सरदार ने स्वामिभक्ति की अनूठी मिसाल पेश की. झाला सरदार मन्नाजी ने तेजी से महाराणा प्रताप के पास जाकर उनका मुकुट और छत्र स्वयं धारण कर लिया और महाराणा प्रताप को युद्ध भूमि से बाहर निकल जाने को विवश किया और स्वयं थोड़ा दूर जाकर युद्ध करने लगे. मुग़ल सैनिक उन्हें प्रताप समझकर उन पर वार करने लगे. और अंतत: झाला सरदार वीर गति को प्राप्त हुए. इस बीच महाराणा प्रताप को युद्ध भूमि से बाहर निकलने का अवसर मिला. 

दो मुग़ल सैनिक प्रताप का पीछा कर रहे थे. बीच में एक पहाड़ी नाला आया जो 26 फीट चौड़ा था. जिसे चेतक ने एक टांग टूटी हुई होने के बावजूद भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर लाँघ लिया. सैनिक पीछे रह गये. पर अब चेतक की गति भी धीमी पड़ गयी थी. तभी प्रताप को पीछे से अपनी मातृभाषा में सुनाई पड़ा ‘हो, नीला घोड़ा रा असवार,’ प्रताप ने पीछे मुड़कर देखा तो वहां उनका भाई शक्तिसिंह था. प्रताप से व्यक्तिगत विरोध के चलते वह मुग़ल पक्ष की ओर से लड़ रहा था. पर आज उसका मन बदल गया और उसने दोनों मुग़ल सैनिकों को मारकर महाराणा प्रताप की रक्षा की. दोनों भाई एक दूसरे से गले मिले. इसी बीच चेतक भी जमीन पर घिर पड़ा. चेतक ने अपने प्राण त्याग दिए. दोनों भाइयों ने उसे श्रृद्धांजलि दी. शक्तिसिंह ने अपना घोड़ा महाराणा प्रताप को दिया और वापस लौट आया. जिस स्थान पर चेतक घायल होकर गिरा था वहां आज भी चेतक की याद में बनाया गया चबूतरा स्थित है. यह स्थान हल्दीघाटी से 2 मील की दूरी पर बलीचा नामक गाँव में है.

महाराणा ने अरावली की गुफाओं, वनों और पर्वतों में आश्रय लिया. अपनी जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर उन्होंने सारे भोगविलास त्याग दिए. उन्होंने अपने सरदारों और सैनिकों के साथ प्रतिज्ञा की कि जब तक अपनी राजधानी चित्तौड़ को मुगलों से मुक्त नहीं करवा लेंगे तब तक महलों की कोमल शय्या को छोड़कर तृण शय्या का प्रयोग करेंगे और सोने-चांदी के बर्तनों की बजाय वृक्षों के पत्तों में भोजन करेंगे और राजभोग की बजाय जंगल के कंद-मूल-फल आदि का आहार लेंगे. समय गुजरता रहा पर प्रताप की कठिनाइयाँ और भी बढ़ती गयी. पर्वत के जितने भी स्थान जो राणा और उनके परिवार को आश्रय प्रदान कर सकते थे मुगलों के अधिकार में हो गए. स्वामिभक्त भीलों ने राणा और उनके परिवार की रक्षा के लिए जी जान से सहयोग दिया. वे राणा के बच्चों को टोकरों में छिपाकर जावरा की खानों में ले गए और वहां कई दिनों तक उनका पालन-पोषण किया. वे स्वयं भूखे रहकर राणा और उनके परिवार के लिए खाद्य सामग्री जुटाते थे. जावरा और चावंड के घने वनों में आज भी वे लोहे के बड़े-बड़े कीले गढ़े हुए मिलते हैं जिन पर बेतों के बड़े-बड़े टोकरे टांगकर भील राणा के बच्चों को छिपाकर मुग़ल सेनिकों और जंगली जानवरों से रक्षा करते थे. 

अकबर के गुप्तचर ने एक बार आँखों देखा हाल सुनाया. जिसके अनुसार राणा और उनके सरदार घने जंगल में एक वृक्ष के नीचे भोजन कर रहे थे. भोजन में मात्र जंगली फल, जड़े और पत्तियां थी जिसे भी वे सभी ख़ुशी-ख़ुशी संतोष से खा रहे थे. किसी के चेहरे पर उदासी नहीं थी. यह सब सुनकर अकबर भी दरबार में महाराणा प्रताप के त्याग और बलिदान की प्रशंसा किये बिना नहीं रह पाया. 

अकबर के विश्वास पात्र सरदार अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना के शब्दों में, ‘इस संसार में सभी नाशवान हैं. राज्य और धन किसी भी समय नष्ट हो सकता है, परन्तु महान व्यक्तियों की ख्याति कभी नष्ट नहीं हो सकती. पुत्तों ने धन और भूमि को छोड़ दिया, परन्तु उसने कभी अपना सिर नहीं झुकाया. हिन्द के राजाओं में वही एकमात्र ऐसा राजा है, जिसने अपनी जाति के गौरव को बनाए रखा है.’

पर कई बार ऐसे भी अवसर आये जब अपने परिवार की सुरक्षा और भूख से बिलखते बच्चों को देखकर प्रताप भाव विभोर हुए. मुग़ल सैनिक इस कदर उनके पीछे पड़े थे कि कई बार उन्हें तैयार भोजन छोड़कर दूसरी जगह प्रस्थान करना पड़ता था. एक दिन पांच बार भोजन पकाया गया और पाँचों ही बार भोजन छोड़कर जाना पड़ा. इसी तरह एक बार घास के बीजों को पीसकर बनायीं रोटी जो उनकी पुत्री के लिए बचाकर रखी थी उसे एक जंगली बिलाव छीनकर भाग गया. पुत्री को रोते बिलखते देखकर प्रताप का ह्रदय पसीज गया. विषम परिस्थितयों में अच्छे-अच्छों का धैर्य टूट जाता है. राणा प्रताप भी कुछ समय के लिए विचलित हो गए और एक पत्र के द्वारा अकबर से मिलने की इच्छा प्रकट की. 

राणा प्रताप का पत्र पाकर अकबर की ख़ुशी की सीमा ना रही. इसे उन्होंने महाराणा का आत्मसमर्पण समझा और यह पत्र बीकानेर नरेश के छोटे भाई पृथ्वीराज नामक स्वाभिमानी राजपूत को दिखाया. बीकानेर मुग़ल सत्ता के अधीन था. पृथ्वीराज वीर ही नहीं अपितु योग्य कवि भी थे. प्रताप के पत्र को पढ़कर उन्हें बहुत पीड़ा हुई. उन्होंने खुद को नियंत्रित करते हुए अकबर को कहा, ‘यह पत्र प्रताप का नहीं है. किसी शत्रु ने जरुर जालसाजी की है.’ इसके साथ ही पृथ्वीराज ने अकबर से अनुरोध किया कि वह सच्चाई जानने के लिए उसका एक पत्र प्रताप तक भिजवा दे. अकबर ने बात मान ली और पृथ्वीराज ने राजस्थानी शैली में एक पत्र लिखकर प्रताप को भिजवाया. 

पृथ्वीराज ने उस पत्र के द्वारा प्रताप को अपने स्वाभिमान का स्मरण करवाया जिसकी रक्षा के लिए उन्होंने आज तक इतने घनघोर संकटों और विपत्तियों का सामना किया था लेकिन कभी हार नहीं मानी. पृथ्वीराज के ओजस्विता से पूर्ण पत्र को पढ़कर प्रताप में अप्रतिम उत्साह का संचार हुआ और उन्होंने अपना स्वाभिमान बनाये रखने का दृढ़ संकल्प लिया. 

मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने चित्तौड़ और मेवाड़ को छोड़कर सिंध नदी के किनारे स्थित सोगदी राज्य की तरफ बढ़ने की योजना बनायी. ताकि बीच का मरुस्थल शत्रुओं को दूर रखे. लेकिन तभी मेवाड़ का वृद्ध मंत्री भामाशाह अपनी काफी संपत्ति लेकर प्रताप के सम्मुख प्रकट हुआ और मेवाड़ के उद्दार की याचना की. यह संपत्ति 25000 सेनिकों के वर्षों तक भरण-पोषण के लिए पर्याप्त थी. भामाशाह के इस त्याग ने राणा प्रताप को फिर से लौटने पर विवश किया. 

महाराणा प्रताप ने वापस आकर राजपूतों की अच्छी सेना तैयार की और एक-एक करके अपने 32 दुर्गों पर पुनः अधिकार कर लिया. 1530 ई. में चित्तौड़, अजमेर और मांडलगढ़ को छोड़कर सम्पूर्ण मेवाड़ पर राणा प्रताप का अधिकार हो गया. उन्होंने उदयपुर को अपनी राजधानी बनाया. इसके बाद अकबर ने युद्ध बंद कर दिया था. पर राणा ने चित्तौड़ के उद्दार की प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक चित्तौड़ का उद्धार न हो, तब तक सिसोदिया राजपूतों को सभी सुख त्याग देने चाहिए. इसलिए उन्होंने राजमहल को छोड़कर पिछौला तालाब के पास अपने लिए झोपड़ियाँ बनवाई और वर्षों तक वहीँ रहे. 

अकबर के युद्ध बंद कर देने से महाराणा प्रताप को बहुत दुःख हुआ. उन्होंने हजारों कष्ट उठाये पर वे चित्तौड़ को मुक्त ना करा सके. अपने अंतिम समय में एक दिन वे उदास कुटिया में लेते हुए थे. उन्हें उदास देखकर उनके एक सामंत ने उनसे पूछा, ‘महाराज! ऐसा कौनसा दुःख है जो आपके अंतिम समय की शांति को भंग कर रहा है.’ 

महाराणा प्रताप ने कहा, ‘ पुत्र अमरसिंह हमारे पूर्वजों के गौरव की रक्षा नहीं कर सकेगा. वह विलासी प्रवृति का है. वह मुगलों से मातृभूमि की रक्षा नहीं कर पायेगा. केवल आप लोगों से आश्वासन की वाणी सुनकर ही मेरी देह सुखपूर्वक प्राण त्याग सकती है.’ यह सुनकर सभी सरदारों ने उसी वक्त प्रताप के समक्ष प्रतिज्ञा कि जब तक वे जीवित रहेंगे तब तक कोई तुर्क मेवाड़ की भूमि पर अपना अधिकार नहीं कर पायेगा. मेवाड़ भूमि को पूर्ण स्वतंत्रता मिलने तक वे इन्हीं कुटियों में निवास करेंगे. यह सुनकर प्रताप ने निश्चिन्तता पूर्वक अंतिम सांस ली. यह 29 जनवरी, 1597 ई. का दिन था. 

महाराणा प्रताप के निधन के समाचार पर अकबर की आँखों से भी अश्रुधारा बह निकली. वह बोला, ‘हे प्रताप! मुझे तेरे जैसा हठी बैरी नहीं मिलेगा और तुझे भी मेरे जैसा जिद्दी दुश्मन नहीं मिल सका. मैं तुझे सलाम करता हूँ.’ 

महाराणा प्रताप शक्ति, शौर्य, साहस, दृढ़ निश्चय और त्याग की अद्भुत मिसाल थे. कहते हैं उनके भाले और कवच का वजन 80-80 किलो था और तलवारों, ढाल सबको मिलाकर कुल 208 किलो वजन के साथ वे युद्ध भूमि में लड़ते थे. उनका रणकौशल देखकर शत्रु भी दांतों टेल अंगुली दबा लेते थे. स्वतंत्रता के लिए महाराणा प्रताप जैसा अनूठा त्याग कम ही देखने को मिलता है. तभी तो अकबर भी उनकी प्रशंसा करने से खुद को ना रोक पाया. अकबर के दरबार के कवि पृथ्वीराज ने उनके यश के गीत गाये. वनवास के दिनों में भीलों ने अपनी जान की परवाह किये बगैर उनकी सहायता की. अश्व चेतक और रामसिंह हाथी तक उनसे इतना प्यार करते थे कि उनके लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया. हाथी रामसिंह को मानसिंह ने बंदी बनाकर अकबर को भेंट किया. पर स्वामिभक्त रामसिंह ने 18 दिनों तक शत्रु का दिया दाना-पानी गृहण नहीं किया और अपने प्राण त्याग दिए. झाला और भामाशाह का त्याग और बलिदान हम जानते ही हैं. अकबर के सरदार खानखाना ने भी प्रताप की प्रशंसा में पद्यों की रचना की. एक अद्भुत पुरुष थे महाराणा प्रताप जिनका स्वतंत्रता और मातृभूमि के लिए त्याग, बलिदान व प्रेम सदियों तक समूचे विश्व में मिसाल रहेगा. तभी तो जब अब्राहम लिंकन भारत दौरे पर आने वाले थे और उन्होंने अपनी माँ से पूछा कि वे उनके लिए भारत से क्या लायें तो उनकी माँ ने कहा, 

‘उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना’.

इसके अलावा जब वियतमान ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र को हरा दिया था तो एक पत्रकार के पूछने पर वियतमान के राष्ट्राध्यक्ष ने कहा, ‘उन्हें विजय और युद्धनीति के लिए राजस्थान के मेवाड़ प्रदेश के राजा महाराणा प्रताप सिंह की जीवनी से प्रेरणा मिली.’ आगे उन्होंने कहा, ‘अगर ऐसे राजा ने हमारे देश में जन्म लिया होता तो हमने समूचे विश्व पर राज किया होता.’ इसी राष्ट्राध्यक्ष ने मृत्यु के बाद अपनी समाधि पर लिखवाया, ‘यह महाराणा प्रताप के शिष्य की समाधि है.’

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