Tuesday, June 16, 2015

Poem on Evening in Hindi


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यह जीवन की सांझ का दौर है...

यह जीवन की सांझ का दौर है...
ख़ामोशी की सरसराहट पसरी सब ओर है
यह जीवन की सांझ का दौर है...

नैन परिंदे लौट रहे हैं आशाओं के पथ से
नहीं रहा अब कोई सवेरा बस रैन बसेरे अब से.
रंग उधार का लिए बची ये जो थोड़ी सी लाली है
सूने-सूने मन अम्बर में ये भी खोने वाली है.

छोड़ घरौंदे मिट्टी के ज्यों बच्चे घर को जाते हैं
उस मिट्टी में मेरे कुछ सपने भी मिल जाते हैं.
ज्यों छाया बढ़ती जाती है प्राची में अपने को खोने
त्यों-त्यों यह काया भी बढ़ती है तम की कोख में सोने.

निस्तेज, निशब्द, निस्पंदित है आने वाला हर पल
अब ना रहस्य बचा कोई क्या होने वाला है कल.
अंतर्मन के क्रंदन को भी अब ना मिलेगी ओस कहीं
ना है कोई स्नेह यहाँ और ना है कोई रोष कहीं.

रात उगेगा यादों का एक चाँद और कुछ तारें
एकाकीपन के होंगे बस अबसे दोस्त ये सारे.
कभी अमावस लाएगी घनघोर अँधेरी रातें
जब यादों से भी ना कर पायेंगे हम बातें.

प्रश्न यहाँ सब खो जायेंगे, हल भी सारे सो जायेंगे
जो जैसा है सो तैसा है यह भी कह ना पायेंगे.
न विजय बची, न शेष पराजय, भाव खो गए हैं सारे
सांझ कोई ऐसी आएगी, ये तो ना सोचा था प्यारे.
 
By Monika Jain ‘पंछी’

How is this poem about evening of life?