Monday, August 17, 2015

Jainism Santhara Sallekhana in Hindi

 
Santhara Ritual in Hindi. Sallekhana Prayopavesa, Voluntary Sanyasana Samadhi Marana, Jainism Fasting to Death, Jain Religion Fast, Holy Salekhana, Upwas. संथारा, सल्लेखना, मृत्यु तक उपवास, समाधिकरण.
 
संथारा / सल्लेखना
 
हम सभी को बहुत जल्दबाजी मची रहती है चीजों को सही और गलत के तराजू में तौलने की, पर काश! काश सब कुछ इतना आसान होता. अगर सब कुछ इतना ही आसान होता तो तुरंत दुनिया के सारे कामों को सही और गलत के एक्सट्रीम्स पर श्रेणीबद्ध कर दिया जाता और फिर कोई विवाद ही नहीं रहता. पर चीजें सामान्तया द्वैत नहीं होती. अक्सर सही और गलत के बीच कहीं होती है. और फिर जितने भी दुनिया में प्राणी है उतने ही सही और गलत अलग से अस्तित्व में आ जाते हैं.
 
इन दिनों ओशो की 'महावीर वाणी' पढ़ रही हूँ. कल ही 'संथारे' पर रोक की ख़बर सुनी और शाम में ही यह किताब पढ़ते समय 'संथारे' का थोड़ा सा जिक्र आया. सबसे महत्वपूर्ण जो चीज होती है वह होते हैं भाव और दृष्टिकोण. 'आत्महत्या' को हम सामान्यता जीजिविषा का खत्म होना मानते हैं, पर वास्तविकता इससे परे है. आत्महत्या जीजिविषा का खत्म होना नहीं बल्कि कुछ विशेष शर्तों के साथ गहरी जीजिविषा का होना है, जिनके पूरा ना होने पर हम मृत्यु का मार्ग चुन लेते हैं. और यह निर्णय भी बस एक क्षण का आवेश होता है. अगर उस क्षण किसी ने रोक लिया होता तो आत्महत्या भी कोई नहीं करता. बल्कि आत्महत्या की तैयारी करते समय एक सांप आ जाए तब भी मरने को इच्छुक व्यक्ति भाग खड़ा होगा. क्योंकि गहरे में कहीं जीने की इच्छा प्रबल है. मतलब जहाँ-जहाँ मरने की इच्छा है वहां जीने की इच्छा निश्चित रूप से होगी, बस वह कंडीशनल होगी.
 
अब आते हैं 'संथारे' पर. अपने शुद्ध रूप में संथारा वह भाव है जहाँ ना जीने की इच्छा होती है और ना ही मरने की. इसके मूल में भी अहिंसा ही है. क्योंकि हमारी जीने की सारी इच्छा हिंसा पर खड़ी है. हर एक जीवन किसी ना किसी की मृत्यु पर ही संभव है. ऐसे में संथारा अपने आदर्श रूप में अहिंसा के उच्चतम भाव के अलावा और कुछ नहीं है. पल भर में डर कर खुद को खत्म कर लेना बहुत आसान काम है. लेकिन अन्न, जल का त्याग करते हुए 20-30-60-90 दिनों तक जीना किसी कायर या मृत्यु की इच्छा रखने वाले का काम नहीं हो सकता, वह भी तब जबकि हम जानते हैं कि हमारा मन क्षण-क्षण बदलता रहता है.

इसके अलावा जैन धर्म मुक्ति के लिए कर्मों की निर्जरा पर विश्वास करता है. जिसका मुख्य आधार अहिंसा है. अपने अंतिम समय में नए पाप कर्मों के बंध को रोकने के लिए संथारा लिया जाता है. ताकि अपनी सेवा के लिए किसी को कष्ट ना पहुँचाया जाए और आहार-विहार आदि से होने वाली हिंसा से भी बचा जा सके. ऐसे में संथारा आत्महत्या और इच्छामृत्यु दोनों से ही बिल्कुल अलग है.
 
कल किसी ने कहा कि संथारा एक प्राकृतिक मृत्यु नहीं है. संथारे का समर्थन या विरोध बाद में. उससे पहले एक सवाल मेरे दिमाग में घूम रहा है. हम जिस परिवेश में रह रहे हैं उसमें कौनसी मृत्यु प्राकृतिक है? एक शराबी जो रोज शराब पीता है उसकी? एक स्मोकर जो रोज सिगरेट पीता है उसकी? विकास के नाम पर जो करोड़ों टन धुआँ वायुमंडल में छोड़ा जाता है उसमें सांस लेने वालों की? कीटनाशकों और रसायनों के इंजेक्शन का प्रयोग करके जो पेड़ पौधे और पशु-पक्षी हम जबरन पैदा करवा रहे हैं उन्हें खाने वालों की? यहाँ तक की रोज चाय, दूध और कॉफ़ी में घोलकर पी जाने वाली शक्कर को भी धीमा जहर माना जाता है. तो बात ऐसी है कि प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, होश में हो या बेहोशी में हम सभी आत्महत्या और परहत्या करने के अलावा रोज कौनसा काम कर रहे हैं?
 
और कल्पना कीजिये कि अगर पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के भी क़ानून लागू होने शुरू हो जाएँ तो आत्महत्या तो बहुत बाद की बात है, पहले तो परहत्या के मामलों की गिनती ही नामुमकिन हो जायेगी. बात गोलमोल घुमाने वाली नहीं है. बात ऐसी है कि वास्तव में ही सब कुछ गोलमोल ही है. तो कम से कम जो इस गोलमोल से बिना किसी को कष्ट पहुंचाए, बिना कोई गलत सन्देश दिए मुक्त होना चाहते हैं, उनके बारे में सोच समझकर कुछ निर्णय लेना ही उचित होगा.
 
By Monika Jain ‘पंछी’