Friday, September 25, 2015

Article on Selfie Addiction in Hindi


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यह सेल्फी संक्रमित युग है

Article on Selfie Addiction in Hindi

(ललकार टुडे में प्रकाशित )
 
प्रकृति की अनमोल धरोहर को समेटे दूर तक फैले उस हरी मखमली दूब वाले मैदान और बादलों की श्वेत-श्याम नदी को बहाते उस नील परी के आसमान से बेखबर जब सब लोग अपनी-अपनी सेल्फी लेने में व्यस्त थे तो दूर एक झील के किनारे उगे रंग-बिरंगे फूलों से मैं बातें कर रही थी। फूलों को देखकर मैं और मुझे देखकर फूल चहक रहे थे। तभी एक फूल ने कहा, ‘कितना समय हो गया, कितने दिन बीत गए, कितना अच्छा लग रहा है कि इतने दिनों बाद कोई हमसे मिलने आया है।’ और उसके स्वर को निरंतरता देते हुए एक दूसरे फूल ने कहा, ‘यूँ तो यहाँ बहुत भीड़ देखी है हमने। हम पर गिरते-पड़ते झील के किनारे खड़े होकर ये लोग हाथ में जाने क्या लेकर घंटों बटन दबाते रहते हैं। पर आज कितने दिनों बाद किसी ने आकर सहलाया है हमें और बिखेरी है एक चिर परिचित मुस्कान जो अक्सर खो जाती है यहाँ आये पर्यटकों के शोर शराबे, प्रदूषण और खींचातानी के बीच।’ तभी एक तीसरा फूल लहराकर मेरे गालों को छू गया। मेरी आँख खुली और मैंने देखा यह तो एक सपना था।

थोड़े विस्मय से भरी मैं, नींद से जागकर, फ्रेश होकर, लेमन टी की चुस्कियों के साथ जैसे ही अख़बार हाथ में थामती हूँ तो पन्ने पलटते-पलटते नजर पड़ती है एक ख़बर पर : रूस में सिखाये जा रहे हैं सेफ सेल्फी लेने के तरीके। इस ख़बर को पढ़ने के बाद सबसे पहला विचार मन-मस्तिष्क में यही कौंधता है कि हम इंसान प्रकृति के समस्त प्राणियों में से सबसे बेजोड़ नमूने इस मामले में भी हैं कि पहले तो हम लगाते हैं आग और फिर खोदते हैं कुआँ, और इसी विचार के साथ एक विचारों की श्रृंखला दौड़ पड़ती है।

बीते कुछ दिनों की बात है। सऊदी अरब में एक किशोर ने अपने दादा के शव के साथ शरारती मुस्कान और जीभ को बाहर निकालते हुए ‘अलविदा दादा’ कैप्शन के साथ एक सेल्फी पोस्ट की। असंवेदनशीलता की उपज यह मुस्कान सेल्फी पोस्ट कर लाइक पाने के क्रेज का एक उदाहरण मात्र है। ऐसे ना जाने कितने उदाहरण आजकल सुर्ख़ियों में बने हुए हैं।

पाकिस्तान की मशहूर गायिका कोमल रिजवी को ही लिया जाए। एक ओर 90 वर्ष के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सत्तार एधी गंभीर हालत में बिस्तर पर लेते हुए हैं, और दूसरी ओर कोमल रिजवी हँसते हुए उनके साथ सेल्फी लेकर फेसबुक पर पोस्ट कर रही हैं।

यह सब तो कुछ भी नहीं, सेल्फी का फीवर कुछ ऐसा चढ़ा है कि कई लोगों की सेल्फी उनके जीवन का आखिरी क्लिक बनकर रह गयी।

ऑस्कर ओटेरो एगुइलर नाम का एक व्यक्ति अपनी एक ख़ास सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों को इम्प्रेस करना चाहता था। इसके चलते उसने एक गन अपने सर पर तानी और सेल्फी लेने लगा। लेकिन सेल्फी लेने के दौरान गलती से गन का ट्रिगर दब गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गयी।

इसी तरह पुर्तगाल में एक दंपत्ति ऊंची चट्टान के ऊपर जाकर, बैरियर को लांघकर समुद्र के साथ आकर्षक सेल्फी लेने के चक्कर में उल्टे सर फिसले और सीधे चट्टान से समुद्र में समा गए। अपने पीछे वे दो मासूमों को छोड़ गए।

हैदराबाद से मनाली घूमने गए इंजीनियरिंग के उन 25-30 छात्रों को हम कैसे भूल सकते हैं जो व्यास नदी की लहरों से अनजान सेल्फीज और फोटोज क्लिक करने में इतने मस्त और मग्न थे कि कब लहरें उन्हें बहाकर ले गयी पता भी न चला।

सेल्फी लेते समय ध्यान भटक जाने के चलते विमान हादसे और कार एक्सीडेंट जैसी घटनाएँ भी अंजाम लेने लगी है।

कुछ ख़ास क्षणों को कैद करना हुनर होता है, यादों को संजोने के लिए जरुरी भी। पर इतना तो ख़याल हो कि कहीं यादों के एल्बम सजाने के चक्कर में हम खुद ही उस एल्बम की एक याद बनकर ना रह जाएँ।

ऐसी ही घटनाओं के चलते रूस में सेल्फी प्रेमियों के लिए एक गाइडलाइन तैयार की गयी है जिसमें ब्रोशर, वीडियो और वेब कैंपेन के जरिये तेज रफ्तार ट्रेन, पहाड़ों के किनारे, बन्दूक और खतरनाक जानवरो के साथ सेल्फी ना लेने के लिए आगाह किया गया है। सेल्फी स्टिक से हो सकने वाली दुर्घटनाओं की आशंका के चलते विंबलडन टेनिस टूर्नामेंट के दौरान, कई फुटबॉल क्लबों, नेशनल गैलरी, द ऑल इंग्लैंड टेनिस एंड क्रिकेट क्लब आदि में सेल्फी स्टिक के प्रयोग पर पाबंदी है। डिज्नी ने दुनिया भर में अपने थीम पार्कों में सुरक्षा के चलते सेल्फी स्टिक के प्रयोग पर रोक लगा दी है।

लेकिन कहाँ-कहाँ और कैसे-कैसे रोक लगायी जायेगी। आजकल टूरिज्म सिर्फ टूरिज्म नहीं सेल्फी टूरिज्म बनकर रह गया है। बल्कि टूरिज्म क्या अब तो लगभग हर घटना के आगे या पीछे सेल्फी शब्द जोड़ा जा सकता है : भूकम्प सेल्फी, ज्वालामुखी सेल्फी, शमशान सेल्फी, बाथरूम सेल्फी और भी पता नहीं कौन-कौन सी सेल्फी।

सेल्फी का क्रेज नेता, अभिनेता, युवाओं-युवतियों सब पर सर चढ़कर बोल रहा है। वो दिन गए जब सेलिब्रिटीज के ऑटोग्राफ लिए जाते थे। आजकल प्रशंसक अपने स्टार्स को अपने साथ ली गयी सेल्फी में संजो कर रखना चाहते हैं। पर यह सेल्फी मेनिया सेलिब्रिटीज के लिए समस्या भी खड़ी कर रहा है। बीते दिनों युवा ब्रिटिश गायक ज्यान मलिक ने पॉप बैंड ‘वन डायरेक्शन’ को छोड़ने का ऐलान यह कहकर किया कि वे सेल्फी कल्चर के शिकार हुए हैं। कुछ मौकापरस्त लड़कियों ने उनके साथ ली गयी सेल्फीज के आधार पर अफवाहें फैलाई जिसके चलते वे तनाव ग्रस्त हो गए।

सेल्फी के प्रति बढ़ती दीवानगी कई मनोरोगों को आमंत्रित कर रही है। अमेरिका के ओहियो यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों के 800 पुरुषों पर अध्ययन के अनुसार वे पुरुष जो घंटों फोटोशॉप पर एडिटिंग के बाद बहुत ज्यादा सेल्फी पोस्ट करते हैं, ऐसे लोग आत्ममुग्धता के शिकार होते हैं। उनमें स्वार्थ की अधिकता और संवेदनशीलता जैसे गुणों का अभाव होता है। उन्हें गुस्सा भी जल्दी आता है। वे अपने शरीर का एक वस्तु की तरह प्रदर्शन करते हैं, जो कि एक यौन विकृति है। महिलाओं को ऐसे पुरुषों से गंभीर रिश्ते बनाने से बचना चाहिए।

वहीँ एक सर्वे जो 16-25 वर्ष की 2000 युवतियों पर किया गया, जिसके अनुसार युवतियाँ दिन में कम से कम 48 मिनट और सप्ताह में 5-6 घंटे सेल्फी लेने में गुजार देती है। सर्वे में शामिल हर 10 में से एक लड़की के कंप्यूटर या स्मार्ट फ़ोन में स्नानघर, कार और कार्यालय में ली गयी लगभग 150 तस्वीरें पायी गयी। लाइक और कमेंट पाने का जूनून इस कदर हावी है कि कई युवतियाँ अपनी बॉडी इमेज को लेकर बहुत ज्यादा कोंशस होने के चलते ईटिंग डिसऑर्डर का शिकार हो रही है।

अमेरिकी साइकियाट्रिक ऐसोसिएशन की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘सेल्फी’ को ‘आब्सेसिव कम्पलसिव डिजायर’ से जोड़ा गया है, जिसमें व्यक्ति अपनी तस्वीरें खींचना और शेयर करने का आदी हो जाता है। यह लत आत्मविश्वास को कमजोर करती है और नकारात्मकता को बढ़ावा देती है।

हालांकि हर चीज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलु होते हैं। सेल्फी का उपयोग कई सामाजिक आन्दोलनों को सक्रीय बनाने में भी किया जा रहा है। कुछ ही समय पहले ब्रिटेन में कैंसर रोगियों की मदद के लिए कैंसर रिसर्च यूके चैरिटी ने ‘नो मेकअप सेल्फी फॉर कैंसर अवेयरनेस’ नामक एक अभियान चलाया। इस अभियान के जरिये कैंसर रोगियों के लिए करोड़ों रुपयों की मदद जुटाई गयी। इसी तरह का ‘पिंक सेल्फी अभियान’ ओगां कैंसर फाउंडेशन और एले ब्रेस्ट कैंसर कैंपेन की पहल पर बॉलीवुड हस्तियों और फैशन डिज़ाइनर्स की मदद से स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता फ़ैलाने के उद्देश्य से चलाया गया। हमारे देश में चल रहे सेल्फी विथ डॉटर अभियान से हम सब परिचित ही हैं। इसी तरह 5 सितम्बर, 2014 से ही आगाज हुआ ग्लोबल ह्यूमनराइट समूह का ‘सेल्फीज4स्कूल’ अभियान जिसके तहत सेल्फीज पोस्ट कर लड़कियों को स्कूल भेजने का बीड़ा उठाया गया है।

ये सब सकारात्मक पहलु हैं लेकिन जब सामाजिक सरोकारों से इतर यह सेल्फी क्रेज स्टेटस सिंबल बनकर हर पीढ़ी के लोगों पर हावी होता हुआ नजर आता है तो चिंता होना स्वाभाविक है। सेल्फी शब्द सिर्फ ऑक्सफ़ोर्ड ‘वर्ड ऑफ़ द इयर 2013’ ही नहीं बना बल्कि यह सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते, नहाते-गाते हर घटना, हर पल के साथ जुड़ता चला जा रहा है। जिसके घातक परिणाम हम ऊपर देख चुके हैं। नकारात्मकता, आत्मविश्वास की कमी, अकेलापन, दिखावा, क्रोध, चिड़चिड़ाहट, तनाव, आत्महत्या यह सब सेल्फी युग की सौगाते हैं जो हम पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करने वाले हैं। क्योंकि हम कुआँ तो तभी खोदेंगे जब आग लगेगी और वह भी सिर्फ फोरी तौर पर।
 
By Monika Jain ‘पंछी’
 
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