Friday, September 4, 2015

Dr Sarvepalli Radhakrishnan Biography in Hindi


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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : जीवन परिचय

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन उन महान राजनेताओं में से एक थे जिन्हें अपनी संस्कृति एवं कला से लगाव होता है। वे एक आस्थावान हिन्दू थे, साथ ही अन्य समस्त धर्मावलम्बियों के प्रति भी गहरा आदर भाव रखते थे। जो लोग उनसे वैचारिक मतभेद रखते थे, वह उनकी बात भी बड़े सम्मान और धैर्य से सुनते थे।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की दर्शनशास्त्र की अगाध विद्वता और अंग्रेजी भाषा पर बेमिसाल अधिकार को देखकर सभी चकित रह जाते थे। दर्शनशास्त्र भले ही शुष्क विषय है और कम लोग ही उसे समझ पाते हैं, परन्तु उनका विषय को उपस्थित करने का ढंग, प्रभावपूर्ण भाषा और उच्चारण से यही प्रतीत होता था कि इस व्यक्ति ने न जाने कितने वर्ष इंगलैंड के आक्सफोर्ड अथवा कैम्ब्रिज विश्वविघालय में शिक्षा पायी होगी। और एक दिन उनकी विद्वत्ता पर मुग्ध छात्रों ने पूछ ही लिया,

‘सर, आपने कौन-सी विदेशी परीक्षा पास की है, और कौन-सी डिग्री प्राप्त की है?’

प्रो. राधाकृष्णन् ने अपनी शैली में ही उत्तर दिया, ‘मैं इंगलैंड पढ़ने नहीं गया, हां पढ़ाने अवश्य जाऊंगा।’

उनका मुख-मण्डल आत्मविश्वास की अनोखी आभा से दमदमा रहा था और छात्र अपने प्रोफेसर की उक्ति से खुशी में उन्मत हो तालियां बजा रहे थे।

इतना कुछ पढ़ने के पश्चात डॉ. राधाकृष्णन के व्यक्तित्व के संबंध में उत्सुकता का जाग्रत होना स्वाभाविक है। इसका शमन नीचे किया जा रहा है :-
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म तिरूतनी में 5 सितम्बर, 1888 को, एक गरीब बाह्मण-परिवार में हुआ था। दक्षिणात्यों के लिए यह स्थान बहुत पहले से एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल रहा है जो आज के चैन्नई शहर से 64 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है।

डॉ. राधाकृष्णन के नाम के पूर्व सर्वपल्ली लगने का एक महत्वपूर्ण कारण है। 1852-55 के आसपास इनके पूर्वज सर्वपल्ली ग्राम से तिरूतनी तीर्थस्थल में आ बसे थे। उन लोगों ने अपने नामों के पूर्व अपनी जन्मभूमि का नाम संयुक्त रखना उचित समझा, जैसा कि दक्षिण में अक्सर होता है। इनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी और माता का नाम सीताम्मा था। डॉ. राधाकृष्णन पांच भाई और एक बहन थे। भाईयों में इनका स्थान द्वितीय था।

गरीब ब्राह्मण-परिवार के होने के कारण तथा अपेक्षाकृत भाई-बहनों की बड़ी संख्या के फलस्वरूप् डॉ. राधाकृष्णन की आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा तिरूतनी और देश के सर्वश्रेष्ठ तीर्थस्थल तिरूमाला अथवा तिरूपति में हुई।

राधाकृष्णन आरम्भ से ही मेघावी थे। साथ ही परिश्रमी भी। तिरूतनी में अपने आरम्भिक जीवन के आठ वर्ष व्यतीत करने के पश्चात् ही वे विद्याध्ययन के लिए तिरूपति भेजे गए। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर ही आर्थिक दृष्टि से असहाय पिता ने पारम्परिक धार्मिक शिक्षा देने के बदले उन्हें अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित करने का निर्णय लिया।
राधाकृष्णन ने ‘लूथरन मिशन स्कूल’ तिरूपति में पांच वर्ष, वेल्लोर के एक प्रसिद्ध कॉलेज में पांच वर्ष तथा मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पांच वर्ष तक अध्ययन किया।

बालक राधाकृष्णन के इस अध्ययन में केवल पिता का ही आर्थिक सहयोग नहीं था, राधाकृष्णन ने मात्र चौदह वर्ष की अवस्था अर्थात् 1902 में मद्रास विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में उच्च अंक प्राप्त कर मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उर्त्तीण की थी।

स्कूली और महाविद्यालय की पुस्तकों के अतिरिक्त इन्होंने स्वाध्याय के द्वारा भी अपने ज्ञान में अभिवृद्धि की और उसी के बल पर राष्ट्र और विश्व के विशिष्टम विद्वानों में इनकी गिनती हुई। दर्शनशास्त्र में एम. ए. करने के फलस्वरूप इन्हें वेदों, उपनिषदों और गीता में पर्याप्त रूची थी, जिनका उन्होंने गहराई से अध्ययन किया। दूसरे धर्मों के प्रति भी इनकी रूचि थी। ईसाइयों का धर्मग्रन्थ बाईबल पूर्णतया कंठस्थ था।

डॉ. राधाकृष्णन की गांधीजी से पहली मुलकात 1938 में सेवाग्राम में हुई। वैसे वे इससे पहले ही गांधी जी के संपर्क में आ चुके थे। गांधीजी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे, तब मद्रास में श्री नटेसन के घर पर मुलाकात और दिलचस्प वार्तालाप भी हो चुका था। गांधी जी का उन दिनों मूंगफली पर जोर था और वह लोगों को दूध पीने से मना किया करते थे। वह कहा करते थे कि दूध गाय के मांस का ही अतिरक्ति उत्पादन है। यह बात युवा प्रोफेसर से भी हुई, राधाकृष्णन ने उत्तर दिया कि तब तो हमें मां का दूध भी नहीं पीना चाहिए। गांधी जी को पता था कि वह उन दिनों ‘लाजिक’ के प्रोफेसर थे। महात्मा गांधी के प्रति डॉ. राधाकृष्णन् की अगाध श्रद्धा थी। उन्होंने एक जगह उन्हें ‘मानव जाति का अमर स्वर’ बताया था और उन्हें मानवीय प्रयत्नों का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक भी घोषित किया था।

डॉ. राधाकृष्णन को प्रायः सभी ने ‘शिक्षक’ कहा है। अतः उनका जन्म दिन 5 सितम्बर आज भी शिक्षक-दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि उन्होंने जीवन के चालीस वर्ष शिक्षा के क्षेत्र में बिताये, परन्तु वस्तुतः वह इतने प्रभावशाली व्यक्ति रहे कि उन्होंने शिक्षा, लेखन, व्यवस्था, राजनीति और शासन सभी क्षेत्रों में महान् छाप छोड़ी। यह ठीक है कि मूलरूप उनका शिक्षक का ही रहा हो, परन्तु लेखन और दर्शन शास्त्र के व्याख्याता के रूप को शिक्षक से पृथक नहीं किया जा सकता। वह शिक्षक से लेकर शिक्षण संस्थाओं के मूर्धन्य व्यवस्थापक-कुलपति तक रहे और सभी प्रकार के कार्यों को अपनी प्रतिभा से चमत्कृत करते रहे। एक प्रोफेसर के रूप में जहां उनका अपने विषय पर पूरा अधिकार था, वहां उनमें उसे प्रभावशाली भाषा में उपस्थित करने की भी महान दक्षता थी। उसके लिए उन्होंने कितना तप किया होगा, इसे कौन भुलाने को तैयार होगा। वह 12-12, 18-18 घंटे अध्ययन करते रहते थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने जो कार्य किया वह भुलाया नहीं जा सकता।

ऑक्सफोर्ड विश्वविघालय में डॉ. साहब ने काफी समय तक अध्यापन कार्य किया था। इंग्लैंड के कई चर्चों में भी उन्होंने भाषण दिये थे। एक बार पोप ने डॉ. साहब को सम्मानित किया था। उनके भाषणों को सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध रह जाते थे। वस्तुतः उनके प्रवचनों की वास्तविक महत्ता उनके अन्तर में निवास करती थी, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। उनकी यही आध्यात्मिक शक्ति सबको प्रभावित करती थी।

डॉ. राधाकृष्णन बड़े हाजिर जवाब थे। विश्व में उन्हें हिन्दुत्व के परम विद्वान के रूप् में जाना जाता था। एक बार वे इंगलैंड गये, तब देश अंग्रेजों के आधीन था, बड़ी संख्या में लोग उनका भाषण सुनने आये थे। भोजन के दौरान एक अंग्रेज ने उनसे पूछा, ‘क्या हिन्दू नाम का कोई समाज है? कोई संस्कृति है? तुम कितने बिखरे हुए हो, तुम्हारे रंग एक जैसा नहीं है, कोई गोरा, कोई काला, कोई धोती पहनता है, कोई लुंगी, कोई कुर्ता तो कोई कमीज। देखो, हम अंग्रेज सब एक जैसे हैं, सब गोरे लाल-लाल।’ इस पर डॉ. राधाकृष्णन ने तपाक से जवाब दिया, ‘घोड़े सब अलग-अलग रंग-रूप के होते हैं, पर गधे सब एक जैसे होते हैं, अलग-अलग रंग और विविधता विकास के लक्षण हैं।’

सन् 1949 में डॉ. साहब को राजदूत बनाकर मास्को भेजा गया। इससे पहले भारत और महात्मा गांधी के सम्बन्ध में रूस की राय अच्छी नहीं थी। परन्तु डॉ. साहब ने वहां जाते ही अपनी प्रतिभा का सिक्का जमा दिया। एक घटना अत्यनत महत्वपूर्ण रही, जब डॉ. साहब प्रथम बार रूस के लौह पुरूष जैकब स्टालिन से मुलाकात करने पहुंचे, बातचीत के दौरान डॉ. साहब ने कहा, ‘हमारे देश में एक महान सम्राट हुआ है, उसने भीषण युद्ध और विजय के पश्चात अपनी तलवार तोड़ दी थी और अहिंसा का दामन थाम लिया था। आपने शक्ति अर्जित करने के लिए हिंसा का तरीका अपनाया है। किसी को क्या मालुम, हमारे उस महान सम्राट की वह घटना आपके यहां दोहरा दी जाये।’ स्टालिन ने मुस्कुराते हुए कहा ‘हां वास्तव में कभी-कभी ऐसे चमत्कार हो जाते हैं। मैं भी पांच वर्षों तक ब्रह्मज्ञान के शिक्षालय में रह चुका हूं।’

सन् 1952 में डॉ. राधाकृष्णन को भारत का उपराष्ट्रपति चुना गया। साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय का कुलपति, साहित्य अकादमी का उपाध्यक्ष भी बनाया गया। ये दायित्व भी उन्होंने बहुत कुशलता से निभाये।

डॉ. राधाकृष्णन ने 87 वर्ष की आयु प्राप्त की। वे सादा खाना खाने वाले अल्पभाषी व्यक्ति थे। जीवन के अंतिम वर्षों में सामान्य लोग भी इनसे सहजता से मिल लेते थे। एक ऐेसे ही भेंटकर्ता ने उनसे प्रश्न किया - ‘अपने दीर्घ जीवन का राज बताने की कृपा करेंगे?’

डॉ. राधाकृष्णन ने हल्की मुस्कराहट के साथ कहा- ‘कम खाओ।’

दुर्भाग्यवश डॉ. राधाकृष्णन के अंन्तिम कुछेक वर्ष बुरे बीते। कभी का अप्रतिम स्मरण-शक्ति वाला व्यक्ति जो अंग्रेजी और संस्कृत के उद्धरण देते नहीं थकता था, अपनी स्मरण-शक्ति पूर्णतया खो चुका था। उनकी यह दशा देखकर बहुत लोग व्यथित हुए, किन्तु नियति के सामने किसकी चलती है?

अन्ततः भारत का यह महान सपूत 1975 के 17 अप्रैल की प्रातः बेला में अपनी प्राणवायु विसर्जित कर बैठा।

सम्पूर्ण देश की जनता और अखिल विश्व के विद्वान शोक-सन्तप्त हो उठे।

भारत के इतिहास में कोई भी राष्ट्रपति अपनी राजनैतिक कुशलता, चातुर्य एवं अपनी बुद्धिमता के लिए याद किया जाएगा- किन्तु एक विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक एवं बहुआयामी विद्वता के लिए किसी को स्मरण किया जाएगा तो वह होंगे भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन।

By Mukesh Pandit
MotivationalStoriesinHindi.in

Thank you Mukesh Ji for sharing such valuable information about Dr. Sarvepalli Radhakrishnan on the occasion of teachers day.