Tuesday, October 20, 2015

Dussehra Story in Hindi


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मुन्नी का दशहरा
 
मुन्नी बड़ी ख़ुश नजर आ रही थी। आज पहली बार वह अपने कस्बे का दशहरा मेला जो देखने जा रही थी। मेला देखने का यह उत्साह कई दिनों से उसके नन्हें से मन में हिलोरे ले रहा था। कुछ ही दिन पहले उसकी हिंदी की टीचर ने दशहरे के बारे में पढ़ाया था। तबसे उसका इंतजार और भी बढ़ गया। मेले की चाट-पकौड़ी, गुब्बारे, मिट्टी के सेठ-सेठानी, हूपला, झूले ये सब तो उसके आकर्षण का केंद्र थे ही लेकिन कई दिनों से मुन्नी के दिमाग में कुछ और बातें भी चल रही थी।
 
उसकी हिंदी की टीचर ने बताया था कि दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय का त्यौहार है। और रावण को जलाना एक तरह से बुराई को जलाना ही है। उस दिन से ही मुन्नी ने कॉपी के एक पन्ने पर उन सब बातों की लिस्ट बनानी शुरू कर दी जो उसे भली नहीं जान पड़ती थी।
 
मुन्नी के पापा मुन्नी को बहुत प्यार करते हैं, लेकिन कुछ समय से वह देख रही थी कि पापा सिगरेट और शराब पीने लगे हैं जिसकी वजह से आये दिन पापा और मम्मी के बीच झगड़ा होता है। स्कूल में उसके बगल में बैठने वाली सीमा जब-तब उसकी पेंसिल चुरा लेती है और अगले दिन पेंसिल को दोनों और से छीलकर उसकी शक्ल ही बदलकर ले आती है और कहती कि यह तो मेरी ही है। उसकी अंग्रेजी की टीचर छोटी-छोटी सी बातों पर बच्चों को लकड़ी की बेंत से बुरी तरह से पीटती है। उसके पड़ोस में रहने वाला कल्लू जब भी वह घर के बाहर पड़ी काली मिट्टी से खिलौने बनाती है तो सब तहस-नहस करके चला जाता है।
 
पड़ोस में रहने वाली गौमती काकी जो एक अँधेरी कोठरी में रह रही है, हर रोज शहर बस गए अपने बेटे की चिट्ठी का इंतजार करती है पर वह चिट्ठी कभी नहीं आती। उसी की दोस्त गिन्नी की सौतेली माँ गिन्नी से ढेर सारा काम करवाती है, उसे खाना भी पूरा नहीं देती और उसकी पिटाई भी करती है। ऐसी ना जाने कितनी बातों की लिस्ट उसने बनायी और भगवान जी के नाम एक चिट्ठी लिख दी, जिसमें उसने इन सभी बुराईयों को रावण के साथ जला देने की प्रार्थना भगवान से की।
 
शाम में जब माँ ने मेले के लिए तैयार होने को आवाज लगाई तो मुन्नी अपनी सबसे पसंदीदा फ्रॉक पहनकर उसकी जेब में वह चिट्ठी डालकर इठलाते हुए मम्मी-पापा के साथ मेला देखने निकल पड़ी।

मेले में पहुँचने पर माँ-पापा किसी खिलौने की दुकान पर रुकते और उससे कुछ पसंद का खरीदने को पूछते तो वह बाद में...बाद में कहकर टाल देती और कहती मुझे सबसे पहले रावण को देखना है, एकदम पास से। और इस तरह वह बीच में आने वाले चाट-पकौड़ी, कुल्फी, झूले, गुब्बारों सबको अनदेखा करते हुए तब तक नहीं रुकी जब तक कि रावण के नजदीक नहीं पहुँच गयी। पर अपनी चिट्ठी डालने के लिए तो उसे और भी पास जाना था। पर पापा ने कहा कि इससे आगे नहीं जा सकते और यहाँ से रावण कितना बड़ा और साफ़ दिख तो रहा है। जब और गाए जाने का कोई रास्ता और तरकीब उसे नजर नहीं आई तो वह मायूस हो गयी। पापा ने उसे बार-बार समझाया पर उस पर कोई असर ना हुआ। मेला देखने का इतने दिनों का उल्लास जाने कहाँ चला गया। तभी पापा ने अपनी गुड़िया को गोद में उठाया और इसी दौरान वह चिट्ठी नीचे गिर पड़ी। मुन्नी बोली मेरी चिट्ठी और पापा उसे उठाकर पढ़ने लगे।

बच्ची के मासूम शब्दों में ढली प्रार्थना पापा के दिल को छू गयी। उन्होंने मुन्नी को चूमा और प्यार से समझाया, ‘बेटा, कोई भी बुराई सिर्फ कागज को आग में जला देने से नहीं मिट सकती। इसके लिए उसे हमें अपने मन से मिटाने का संकल्प लेना होता है। रावण को जलाना बस एक इशारा भर है हम सबके लिए अपने-अपने मन के रावण को जलाने के लिए। लेकिन अफसोस है कि हम बस कागज़ के रावण ही जलाकर रह जाते हैं।’ यह कहकर मुन्नी के पापा ने अपनी जेब से सिगरेट का पैकेट बाहर निकाला और उसे वहां पड़े डस्टबिन में फेंक दिया और मुन्नी से वादा किया कि अबसे वह इन बुरी आदतों को हाथ भी न लगायेंगे।
 
मुन्नी की मुस्कान फिर लौट आई। उसने कहा, ‘अगर ऐसा है तो आज से मैं अपना होमवर्क टाइम से करुँगी और खाना खाते समय नखरे भी नहीं दिखाऊंगी।’ मुन्नी की माँ भी ख़ुश होकर बोली, ‘आज से मैं भी अपनी प्यारी मुन्नी पर कभी हाथ नहीं उठाऊंगी।’
 
पीछे रावण जलने लगा था। मुन्नी ने अपने पापा-मम्मी के साथ मेला अच्छे से घूमा। खिलौने खरीदे, झूला खाया, हूपला खेला, जादूगर का खेल देखा, अपनी पसंदीदा आइसक्रीम, जलेबी और पकौड़ियाँ खायी और फिर सब ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आये। मेले से वह गौमती काकी के लिए मिठाई और एक साड़ी भी खरीद कर लायी थी। जिसे देखकर गौमती काकी की आँखें ख़ुशी से छलछला उठी। उसने मेले से लाये खिलौनों से कल्लू को भी खेलने दिया और इसके बाद कल्लू ने उसके खिलौने कभी नहीं बिगाड़े। 
 
अपने लिए मेले से लायी रंग-बिरंगी पेंसिल्स में से उसने कुछ पेंसिल सीमा को भी दी। सीमा बहुत ख़ुश हुई और उसे अपनी गलती का अहसास भी हुआ। उसने मुन्नी से वादा किया कि अब वह ऐसा काम कभी नहीं करेगी।
 
अंग्रेजी की बेंत मारने वाली टीचर और उसकी सहेली गिन्नी की सौतेली माँ के अंदर के रावण भी एक दिन जल जायेंगे, इसी आशा के साथ वह अपना होमवर्क करने बैठ गयी।
 
By Monika Jain ‘पंछी’

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