Friday, October 2, 2015

Essay on Dussehra in Hindi


Essay on Dussehra Festival in Hindi for Kids. Vijaya Dashami par Nibandh, Dasara Ravan Dahan Paragraph, Vijayadashami Speech, Durga Dashami Puja Article, Write Up, Anuched. दशहरे पर निबंध, दशहरा लेख.

विजयादशमी के मायने

उत्सव और त्यौहार हर्ष, उल्लास और मनोरंजन के प्रतीक हैं. दौड़ती-भागती ज़िन्दगी की बोरियत में कुछ ठहरे हुए क्षण. ये बात अलग है कि ये दौड़-भाग की ज़िन्दगी भी इंसान ने खुद चुनी और ये बोरियत भी. मैं उत्सव विरोधी बिल्कुल नहीं हूँ. लेकिन एक बड़ी मजेदार चीज है. इंसान ने सारी दुनिया के साधन अपने मनोरंजन के लिए जुटा लिए, इसके बावजूद भी उसकी बोरियत दूर नहीं हो पायी. वह घोड़ों को दौड़ाता है, वह बैलों को लड़ाता है, वह खुद भी अखाड़े में उतर जाता है, दुनिया भर के गीत-संगीत, नृत्य, खेल, एडवेंचर, त्यौहार और भी न जाने क्या-क्या इंसान ने अपने लिए उपलब्ध करवा लिए, लेकिन उसकी बोरियत आज भी वैसी की वैसी ही है और आनंद की खोज अब तक जारी है. जबकि घोड़ों, गधों, बैलों, ऊंटों किसी को भी इंसान की इस दौड़ में कोई रूचि नहीं. बल्कि जिन लोगों को मनोरंजन के साधनों की दरकार नहीं, जो सबकी तरह बोरियत महसूस नहीं करते, जिनके लिए प्रकृति और अंतर्मुखता ही सारे आनंद और उत्सवों की शरणस्थली है, वे लोग भी उसकी नजर में बोरिंग इंसान करार दे दिए जाते हैं. अजब है पर सच है.

खैर! अब आते हैं हम विजयादशमी पर. उत्सव, त्योहारों और आनंद की इसी कड़ी में हर वर्ष रावण का दहन एक परंपरा बन चुका है और यह त्यौहार मनाया जाता है बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में. कई अन्य मान्यताओं के साथ जो एक प्रमुख मान्यता है वह है कि इस दिन श्री राम ने रावण का वध किया था और लंका पर विजय प्राप्त की थी. बुराई की हार और अच्छाई की विजय निश्चित रूप से अच्छा संकेत है. इसे सेलिब्रेट करना भी अच्छी बात है. लेकिन क्या सिर्फ जश्न मनाने तक ही यह सारी कवायद होनी चाहिए? जिस रावण को हम सालों से जलाते आ रहे हैं वह रावण तो कभी का मृत्यु का वरण कर चुका, तो फिर हर साल रावण का कद बढ़ा-बढ़ाकर हम कौनसी बुराईयों को जलाते हैं? हम तमाशाबीन अपनी बुराईयों, अपने गुनाहों, अपने अपराधों से अनजान किसकी मृत्यु पर इतना हर्ष मनाते हैं?

विजयादशमी संकेत है अपने मन के भीतर झाँकने का और वहां सदियों से जो गन्दगी, बुराई और अज्ञान रुपी धूल की पर्तें जमी हैं उन्हें झाड़ने का. यह समय है बहिर्मुखी से अंतर्मुखी बनने का, अन्याय से न्याय और असत्य से सत्य की ओर लौटने का. लेकिन हमारा सारा उत्सव, हमारा सम्पूर्ण जीवन तो कुछ और ही कहानी बयां करता है. हम खुद से इतना भयभीत हो चुके हैं, हम अपने मन से इतना हार चुके हैं, हम अपनी कमजोरियों के इस कदर गुलाम बन चुके हैं कि हमारी सारी यात्रा बाहर और दूसरों की तरफ ही होती है. तभी तो कागज का जलता हुआ रावण हमें हर्ष और उल्लास दे जाता है लेकिन अपने भीतर के रावण को हम दिन प्रतिदिन सशक्त होने देते हैं. उसके सामने हमारा कोई वश नहीं चलता.

मेरे कस्बे के दशहरे मेले में जिस समय रावण का पुतला धूं-धूं करके जल रहा होता है ठीक उसी समय एक कविता हमेशा बोली जाती है, जिसमें एक पंक्ति आती है, ‘सचमुच के रावण जिन्दा है, कागज़ के रावण जलते है.’ और इन्हीं मेलों में लड़कियों को कितनी अश्लील हरकतों का सामना करना पड़ता है, यह भी किसी से छिपा हुआ नहीं. लेकिन सब कुछ पता होते हुए भी कितने विरोधाभासों में जीते हैं हम. हर पल हम उन्हीं पात्रों की आलोचना कर रहे होते हैं जिन्हें हम किसी ना किसी रूप या मात्रा में खुद जी रहे होते हैं.

उत्सव हमारे जीवन का अपरिहार्य हिस्सा बन चुके हैं लेकिन जीवन उत्सव तभी बन सकता है जब इन उत्सवों से मिले सार्थक सन्देश को भी हम अपने जीवन में उतार सकें. विशेष रूप से जब कोई किसी उत्सव को धर्म से जोड़ता हैं, अपने किसी आराध्य से जोड़ता हैं तब तो उसकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. दशहरा आने वाला है. आईये हम सब मनन करें कि इस बार रावण दहन की अग्नि को हम अपनी कौनसी बुराई अर्पित करके आने वाले हैं. बाकी आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this essay about Dussehra festival?