Wednesday, October 7, 2015

Maharana Pratap Story in Hindi

 
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महाराणा प्रताप का प्रतीक

स्कूल की छुट्टी हो गयी थी. रमन, सुलेखा, चित्रा, दीपक, सृष्टि, अमन और प्रतीक सभी बच्चे बहुत उत्साहित लग रहे थे. कुछ दिनों बाद उनके स्कूल में विचित्र वेशभूषा प्रतियोगिता जो थी और इन सभी ने उसमें अपना नाम लिखवाया था. सभी घर आते हुए इसी पर चर्चा कर रहे थे.  
 
‘मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या बनूँगा’, दीपक ने कहा.
 
मैंने तो सोच लिया है, ‘मैं तो मीरा ही बनूँगी.’ चित्रा बोली.
 
‘तू मीरा बनेगी तो मैं कृष्ण बन जाऊँगा. अब से तू मेरी भक्त हुई. चल आशीर्वाद ले चुहिया!’, अमन ने चित्रा को चिढ़ाते हुए कहा और सारे बच्चे हँस पड़े.
 
‘आशीर्वाद ले मेरा ठेंगा. तुझ पर तो कंस बनना ही सूट करेगा कनखजूरे!’ चित्रा मुंह बनाते हुए बोली और फिर से सबकी हंसी छूट गयी.
 
‘इन दोनों की लड़ाई तो कभी खत्म न होने वाली. वैसे तुम लोग यह तो भूल ही गए कि इस बार इस प्रतियोगिता में कुछ नया भी शामिल किया गया है’, रमन बोला.
 
‘अरे हाँ! मेम ने कहा था कि इस बार जो जिस पात्र का अभिनय करेगा उसे उसी के जीवन से सम्बंधित प्रश्न भी पूछे जायेंगे. और यह भी प्रतियोगिता के मूल्यांकन का एक अहम् हिस्सा है’, सृष्टि ने अमन की बात आगे बढ़ाते हुए कहा.
 
‘पर यह सब हम कैसे पता करेंगे’, सुलेखा ने चिंतित होते हुए पूछा.
 
‘हे चिंता देवी! इन्टरनेट किस दिन काम आएगा’, अमन ने बेफिक्र होते हुए कहा.
 
प्रतीक आज बिल्कुल चुप था और अपने में ही खोया हुआ था. कुछ देर में सब बच्चे घर पहुँच गए.
 
घर पहुँचते ही प्रतीक इन्टरनेट पर कुछ सर्च करने लगा.
 
‘बेटा! खाना तो खा लो पहले और यह क्या तुमने अपनी यूनिफार्म भी नहीं बदली अभी तक’, प्रतीक की मम्मी ने कहा.
 
प्रतीक ने उत्साहित होते हुए पापा-मम्मी को प्रतियोगिता के बारे में बताया और कहा, ‘मैं महाराणा प्रताप बनना चाहता हूँ पापा! आज उनकी एक कविता आई थी हमारी हिंदी की किताब में. बस तब से ही उनके बारे में और ज्यादा जानने की इच्छा है. और फिर हमसे हम जो भी बनेंगे उनके जीवन से आधारित प्रश्न भी तो पूछे जायेंगे.’
 
‘अरे वाह! महाराणा प्रताप ही तो बना था मैं अपने कॉलेज के दिनों में उनके जीवन पर आधारित एक नाटक में. चलो पहले कपड़े बदलकर खाना खाओ फिर मैं तुम्हें सब कुछ बताता हूँ उनके बारे में’, प्रतीक के पापा ने गर्व से कहा.
 
प्रतीक यह जानकार बड़ा ख़ुश हुआ. शाम में पापा के पास बैठकर उसने बड़े ध्यान से महाराणा प्रताप के बारे में सब कुछ सुना और प्रतियोगिता की तैयारी शुरू कर दी.
 
आज प्रतियोगिता का दिन था. अंतिम बारी प्रतीक की ही थी. लम्बी कद काठी वाला हष्ट-पुष्ट प्रतीक बिल्कुल महाराणा प्रताप का छोटा प्रतिरूप ही लग रहा था. उसके चेहरे का ओज और आत्मविश्वास भी देखते बनता था. उसके स्टेज पर आते ही सब तरफ से तालियों की गड़गड़ाहट गूँज पड़ी.
 
जज महोदय ने पूछा, ‘प्रतीक, कौनसी बात ने तुम्हें महाराणा प्रताप बनने के लिए प्रेरित किया.’
 
प्रतीक ने कहा, ‘सर यूँ तो महाराणा प्रताप का पूरा जीवन ही इतना प्रेरणादायक है कि प्रतियोगिता में ही सही महाराणा प्रताप का अभिनय करना मेरे लिए बहुत गर्व का विषय है. पर हाँ महाराणा प्रताप बनने का विचार मेरे मन में तब आया जब हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक और हाथी रामसिंह का उल्लेख आया था. कहते हैं हल्दीघाटी के युद्ध में मानसिंह के हाथी पर जब चेतक ने अपने दोनों पाँव चढ़ा दिए तब हाथी की सूंड पर बंधी तलवार से उसका एक पैर कट गया था. ऐसी हालत में भी वह लगातार युद्ध भूमि में महाराणा प्रताप का साथ देता रहा. जब प्रताप युद्ध भूमि से बाहर निकल रहे थे तब दो मुग़ल सैनिक उनके पीछे थे. सामने 26 फीट चौड़ा नाला था. चेतक जिसका एक पैर कटा हुआ था. उसने इस स्थिति में भी अपने स्वामी की रक्षा के लिए अपना सारा बल लगाकर उस नाले को पार कर लिया और सैनिक पीछे ही रह गए. इसके बाद चेतक की गति मंद पड़ गयी और वह वीरगति को प्राप्त हुआ. इसी तरह महाराणा प्रताप के हाथी रामप्रसाद को मानसिंह ने बंदी बनाकर अकबर को भेंट किया था. पर रामप्रसाद ने शत्रु के यहाँ 18 दिनों तक दाना-पानी कुछ भी नहीं खाया और शहीद हो गया. जिस महाराणा प्रताप से जानवर भी इतना प्यार करते थे कि उनके लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया, वे स्वयं कितने विलक्षण और अद्भुत होंगे यह सोचते हुए ही मेरे मन में महाराणा प्रताप बनने और उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की इच्छा जागृत हुई और जितना मैं उनके विषय में जानता गया उतना ही मेरे मन में महाराणा प्रताप और मेवाड़ की इस भूमि के प्रति सम्मान बढ़ता गया. न जाने कितनी बार ऐसा हुआ जब महाराणा प्रताप के बारे में पापा से सुनते हुए मेरी आँखों में आंसू आ गए. महाराणा प्रताप जैसे वीरों की गाथाएं हमारी अमूल्य धरोहर है. मैं अगर उनके जीवन से कोई एक गुण भी गृहण कर पाऊं तो मेरे लिए बहुत गर्व की बात होगी.’
 
प्रतीक का जवाब सुनकर पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा. सभी की आँखें नम हो गयी. जब पुरस्कार की घोषणा होने लगी तो सब तरफ से प्रतीक-प्रतीक के स्वर गूँजने लगे. प्रतीक को पहला पुरस्कार मिला और पूरा हॉल महाराणा प्रताप की जय-जयकार से गूँज उठा.

By Monika Jain ‘पंछी’

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