Tuesday, November 17, 2015

Childhood Memories Essay in Hindi

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काश! वह प्रेम पत्र रहा होता

कागज पर लिखे प्रेम पत्र का अपना एक अलग ही आकर्षण है. कितना रोमांचक समय होगा वह जब एक दूसरे को प्यार करने वाले डर-डर के छुप-छुप के एक दूसरे को लैटर लिखा करते होंगे. फूल, गिफ्ट्स, चॉकलेट्स, मेसेजेज, ईमेल्स, फोन, व्हाट्स एप और डेटिंग के इस दौर में वह खतों वाला प्यार जाने किसे नसीब होता होगा. 

हमेशा स्कूल/डिस्ट्रिक्ट टॉप करने के लिए किताबों में खोयी रहने वाली, अव्वल दर्जे की अंतर्मुखी और सिंसियर यह लड़की, जिसे हमेशा बस एक-दो की ही कंपनी चाहिए होती थी, जिसे ग्रुप्स में रहना ज्यादा पसंद नहीं था...क्या किसी ने कभी मुझे भी वो कागज़ वाला प्रेम पत्र लिखा होगा यही याद करते-करते बचपन के समय में चली गयी. 

तब पाँचवी क्लास में पढ़ती थी. इनोसेंट का टैग तो आज तक नहीं उतर पाया है तो उस वक्त क्या रही होऊँगी, पता नहीं. पर हाँ, सही शब्द, गलत शब्द इतना तो पहचानती थी. भावनाओं को तो नवजात शिशु भी पहचान लेता है तो फिर मैं तो 10-11 साल की लड़की थी. कहते हैं इंटेलीजेंट और सिंसियर लड़कियों से लड़के थोड़ा डरते हैं. और खुद यह लड़की भी अपने में ही खोयी रहने वाली किसी की ओर नजर उठाकर भी नहीं देखने वाली, जिसे यह भी न मालूम होता था कि क्लास में पढ़ता कौन-कौन है, पर हाँ तब क्लास के कुछ लड़के होमवर्क के लिए कॉपी मांगने के लिए जरुर अक्सर घर आते थे. पाँचवी क्लास तक आते-आते लड़के और लड़कियों के बैठने की जगह अलग-अलग हो गयी थी. इसलिए शायद मन ने भी लड़के और लड़की के भेद को कुछ-कुछ स्वीकार कर लिया होगा. 

एक दिन प्रेयर के बाद क्लास में आकर बैठी थी. कॉपी-किताब निकालने के लिए बैग खोला तो देखा उसमें कागज का बॉल बनाकर डाला हुआ था. मैंने और मेरे पास बैठी मेरी सहेली दोनों ने उसे देखा. फिर मैंने उसे खोला तो उसमें एक लड़के ने अपने नाम के साथ कुछ मेसेज लिखा था. एक पार्क में मिलने के लिए बुलाया था. और जिन शब्दों का प्रयोग करते हुए यह लिखा था वह बिल्कुल अच्छे नहीं थे. सहेली तो हंसने लगी थी और मैंने झट से उसे वापस फोल्ड करके बैग में रख दिया. घर आकर चुपके से छत पर गयी और रोते-रोते उस लैटर के जितने बारीक टुकड़े कर सकती थी किये और उसे एक बारिश का पानी जाने वाले पाइप में डाल दिया. अब तो समझती हूँ कि ये गलत किया था, पर तब शायद मन में जाने क्या डर रहा हो.

कुछ दिन बाद वापस वैसा ही लैटर घर पे बैग खोलते वक्त मिला. भैया पास में ही बैठा था. मैंने फिर रोने लगी और रोते-रोते वह ख़त भैया को पकड़ा दिया. घर पे सबको पता चला. पापा ने प्रिंसिपल मैम से बात की. उस नाम के दो लड़के पढ़ते थे स्कूल में. एक सीनियर और एक जूनियर. प्रिसिपल मैम ने लैटर माँगा और कहा हैण्डराइटिंग मिलाकर उसे समझा देंगी और डांट देंगी. खैर! बात आई गयी हो गयी. लड़के का पता चला या नहीं यह सब कुछ पता नहीं. पर हाँ उसके बाद कोई ख़त नहीं आया था. वे दोनों लड़के रास्ते में भी एक-दो बार नजर आये थे. पर कभी पता नहीं चल पाया कि कौन था. इसके बाद स्कूल भी बदल गयी. आज कुछ बच्चे अपने स्कूल में चलने वाले टाइम पास और रोज-रोज बदलने वाले अफेयर्स के बारे में बता रहे थे. अचानक ही वह घटना याद आ गयी. जाने क्यों मन ने कहा कि काश! वह प्रेम पत्र रहा होता.


By Monika Jain ‘पंछी’