Thursday, November 5, 2015

Essay on Children’s Day in Hindi

Essay on Children’s Day in Hindi. 14 November Kids Speech, Jawaharlal Nehru Article, Child Labour Paragraph, Bal Diwas par Nibandh, Bachpan Bachao Bhashan. बाल दिवस पर निबंध, बचपन बचाओ, भाषण, लेख.
 
बचपन कहीं बचा नहीं

Essay on Children’s Day in Hindi

एक औरत ठिठुरती सर्दी में चार-पांच महीने के बच्चे को बिना कोई कपड़ा पहनाये घर-घर भीख मांगने जाती है। एक दूसरी औरत बच्चे को इस हालत में देखकर उसके पहनने के लिए कोई कपड़ा देती है। पहली औरत कपड़ा बच्चे को पहनाकर आगे बढ़ जाती है और दूसरे घर के सामने पहुँचने से पहले बच्चे के शरीर से वह कपड़ा उतार लेती है और भरी सर्दी उसे नंगा कर फिर से भीख मांगने लगती है। पहली औरत बस विस्मय से देखती रह जाती है। जानती हूँ पेट की आग, स्वार्थ और लालच के सामने रिश्ते दम तोड़ देते हैं, बच्चे उस आग से लड़ने के हथियार बन जाते हैं। सवेरा होते ही कूड़ेदान से प्लास्टिक, लोहा आदि बीनने के लिए घर से बाहर निकाल दिए जाते हैं। पर भूख की यह कीमत सच बहुत बड़ी है, बहुत बोझिल। इतनी कि सारी दुनिया के पेट की तृप्ति भी इसे न्यायसंगत नहीं ठहरा सकती।
 
खैर, यह तो बात हुई उन बच्चों की जिनका जन्म ही अभावों में होता है, और अक्सर इन्हीं अभावों में इनका सारा बचपन घुल जाता है। जिसे बचाने के लिए एक व्यक्ति से लेकर पूरे राष्ट्रीय स्तर तक व्यापक प्रयासों और नीतियों की जरुरत है। पर सुख सुविधा से संपन्न या मध्यमवर्गीय घरों के बच्चे? क्या वे अपना बचपन जी पा रहे हैं? क्या उनकी मासूमियत को हम सहेज पा रहे हैं? शायद नहीं।
 
एक पिता अपनी एक छोटी सी बच्ची के साथ बाहर खड़े हैं। शरीर पर खुजली से त्रस्त एक श्वान सड़क पर इधर-उधर दौड़ रहा है। बच्ची ने जिज्ञासावश पूछा, ‘पापा, इस डॉगी को क्या हुआ’ पापा ने उस जानवर की तरफ नाक-भौंह सिकोड़ते हुए कहा, ‘बेटा, यह बहुत गन्दा डॉगी है। इसके पास बिल्कुल नहीं जाना है और यह कभी पास भी आये तो इसे पत्थर मारकर भगा देना।’
 
पापा चाहते तो यह भी कह सकते थे कि यह कोई गन्दा नहीं बस एक बीमार जानवर है। आप छोटे हो इसलिए आपको उसके पास नहीं जाना है। उसे बेवजह पत्थर नहीं मारना है, बस उससे दूर रहना है और उसके लिए मन में दया के भाव ही रखने हैं। लेकिन हम बच्चों को प्रेम नहीं नफरत करना सिखा रहे हैं।
 
बचपन का वह समय जो खिलखिलाता, मुस्कुराता, हर तरह के तनाव से कौसों दूर और मासूमियत व निर्दोषता से परिपूर्ण होना चाहिए, उसे हम नहीं सहेज पा रहे। क्या थमा रहे हैं हम बच्चों को? जो उम्र दादा, नाना, पापा, मामा और चाचा के कन्धों की सवारी करने की है, उस उम्र में हम बच्चों के कन्धों पर दुनिया-जहाँ का बोझ बस्ते के रूप में लाद रहे हैं। क्लास में अव्वल आने या परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा अंक लाने का तनाव समय से पहले उन्हें बहुत गंभीर बना देता है। कई बच्चे तो इन अपेक्षाओं के बोझ को झेल भी नहीं पाते और इतनी छोटी उम्र में आत्महत्या कर इस समूची शिक्षा व्यवस्था पर एक प्रश्न चिह्न छोड़कर चले जाते हैं। जो समय उछलने-कूदने, फुदकने, टहलने और किलकारियों का है उस समय को हम कैद कर रहे हैं खचाखच भरी बसों में। और तो और आजकल बच्चों को यह भी पता नहीं होता कि खेलना क्या और कैसे है? गिल्ली-डंडा, छिपा-छिपी, सितोलिया, लंगड़ी टांग, शतरंज, कैरम, खो-खो, रुमाल झपट्टा ये सब गुजरे जमाने के किस्से हैं। आजकल के बच्चों के पास कंप्यूटर और मोबाइल गेम्स के अलावा कोई ऑप्शन नहीं। और फिर हम बड़ों के रेस्ट्रिक्शंस भी बड़े गज़ब के होते हैं। मिट्टी में नहीं खेलना है, उन बच्चों के साथ नहीं खेलना है (क्योंकि उन बच्चों के बड़ों से नहीं बनती), ये नहीं खेलना है, ऐसे नहीं खेलना है और भी न जाने क्या-क्या।
 
बच्चों से प्रेम और मैत्री की भावना भी छीन ली हमने और उसकी जगह थमा दिए प्रतिस्पर्धा, तनाव और कुछ भी कर गुजरने की भावना से भरे टैलेंट हंट शोज और कम्पटीशन्स। जाहिर है इन प्रतियोगिताओं की तैयारी के लिए दिन रात एक कर दिए जाते हैं। हर अभिभावक की उम्मीद कि मेरा बच्चा ही जीते, पर सारे बच्चे तो जीत नहीं सकते। ऐसे में जो हारते हैं, उन्हें एक पल को लगता है जैसे उनकी सारी दुनिया ही खत्म हो गयी हो। इतनी सी उम्र में मायूसी और निराशा कौनसे गुल खिलाएगी, यह जरा सोचने वाली बात है। दूसरी ओर सबकी आँखों का तारा बना, जीत का ताज पहनने वाला बच्चा कितनी महत्वकांक्षाओं, अभिमान और अपेक्षाओं से भर सकता है, यह भी विचारणीय है। आगे चलकर यही भावनाएं तो दुनिया जहाँ के संघर्षों और शोषण की जड़े बनती है। जरा सोचकर देखने वाली बात है। क्या इतनी सी उम्र में जीत-हार से इतना फर्क पड़ना चाहिए? बच्चों में कैसी होड़? लेकिन बड़ों की अपेक्षाओं, प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ के इस खेल में कई बच्चों का आत्मविश्वास टूट जाता है और कुछ बच्चे आत्ममुग्धता के शिकार हो जाते हैं। दोनों ही स्थितियां भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं।

इसलिए बहुत जरुरी है हम सब के लिए यह समझना कि अगर बच्चों को हम ऐसी प्रतियोगिताओं का हिस्सा बनाते भी हैं तो बस उनका प्रतिभागी होना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए। जीतने और हारने से कई ज्यादा जरुरी है कुछ बेहतर सीखना और अपने डर को खत्म करना। क्योंकि प्रतियोगिताएं होती ही कुछ बेहतर सीखने-सिखाने, आत्मविश्वास को मजबूत करने, नए-नए लोगों से मिलने और नयी-नयी जानकारियां प्राप्त करने के लिए। और जिसने सीख लिया वह तो हारकर भी जीत गया। इसलिए अगर जीत की ख़ुशी हो तो हार भी सहर्ष स्वीकार होनी चाहिए। बच्चे अभी इतने नाजुक हैं कि मैडल्स, सर्टिफिकेट्स और तमगों का बोझ नहीं उठा सकते। उन्हें फूलों सा खिला रहने दिया जाये, इसी में हमारी समझदारी है।
 
टीवी, इन्टरनेट और मोबाइल संस्कृति ने भी बचपन को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अपनी मासूमियत से सभी के दिलों को जीत लेने वाले बाल कलाकारों के जीवन की सच्चाई इतनी मासूम नहीं। इतनी छोटी उम्र का अभिनय, पॉपुलैरिटी और स्टारडम आने वाले भविष्य के उतार-चढ़ावों को स्वीकार करने में बाधा डालता है और बचपन की सारी बेफिक्री को भी लूटकर ले जाता है। वहीं दूसरी ओर टीवी, मोबाइल और इन्टरनेट के उपयोगकर्ता बच्चे प्रकृति की निकटता से दूर इस आभासी मनोरंजन में डूबे हिंसक और फूहड़ कार्टून सीरियल्स और वीडियो गेम्स की लत के कारण गुस्से, तनाव, चिड़चिड़ाहट, अकेलेपन, हिंसा और अवसाद के शिकार हो रहे हैं। जिसकी वजह से उनका मानसिक और शारीरिक विकास बाधित हो रहा है। एकल परिवारों और जनरेशन गैप के चलते अब वो दादी और नानी की कहानियां भी नहीं रही जो बचपन से बच्चों के चरित्र को वह मजबूती देती थी जो आगे चलकर देश का भविष्य बनता था। अब तो मम्मी और पापा दोनों की जॉब में व्यस्तता की वजह से बाकी रह गए हैं बस टीवी पर आने वाले ऊलजुलूल कार्यक्रम, हिंसक और बेहुदे कार्टून केरैक्टर्स, इन्टरनेट पर पोर्न तक पहुँच, एक्शन मूवीज, फूहड़ और अश्लील गाने, मोबाइल के उत्तेजना और निराशा पैदा करने वाले गेम्स जो नफरत, हिंसा, उन्माद और भटकाव से भरे भविष्य का आईना दिखा रहे हैं।
 
बड़ी ही विडम्बना पूर्ण स्थिति है। एक ओर देश का भविष्य कचरे के ढेर में से प्लास्टिक, पोलीथिन और बेचने लायक चीजें चुन रहा है, ताकि एक वक्त की रोटी का जुगाड़ हो सके। होटल, रेस्तरां और घरों में झूठे बर्तनों को रगड़ रहा है ताकि रात को भूखे पेट न सोना पड़े। स्कूल जाते बच्चों को देखकर इस बचपन की आँखें एक पल को चमकती है लेकिन अगले ही पल मालिक की फटकार पर फिर से बर्तनों के ढेर में जा गढ़ती है। दूसरी ओर कन्धों पर जमाने भर का बोझ लादे ऊपर से नीचे तक बंधा हुआ बचपन है जो सड़कों पर दौड़ते-खेलते पिल्लों को देखकर पल भर ठहरकर मुस्कुरा लेना चाहता है लेकिन अगले ही पल खचाखच भरी बसों का हॉर्न उनकी मुस्कुराहट को लील जाता है। एक बचपन वर्तमान की रोटी के इंतजाम के लिए जूझ रहा है और दूसरा बचपन भविष्य की रोटियों के इंतजाम के लिए। और जिस देश का बचपन ही इतना जूझता नजर आये उस देश के भविष्य की दिशा क्या होगी?
 
Monika Jain ‘पंछी’
 
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