Monday, November 9, 2015

Essay on Social Service in Hindi

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सेवा नहीं है वह जिससे पाना हो मेवा

कोई भी कार्य सौ फीसदी सही या गलत नहीं हो सकता. क्योंकि इस पृथ्वी पर हर प्राणी का जीवन कुछ इस तरह से है कि बिना किसी दूसरे के शोषण और हिंसा के उसका अस्तित्व बच ही नहीं सकता. जब हम एक बिल्ली की जान बचा रहे होते हैं तब भी हम अनजाने में ही सही हजारों चूहों की जान को ख़तरे में डाल रहे होते हैं. इसके साथ ही हमारा हर कार्य चलना-उठना, बैठना, खाना-पीना, यहाँ तक कि सांस लेना भी असंख्य जीवों की मृत्यु पर ही संभव है. यह बात हर कार्य पर लागू है फिर चाहे वह सेवा ही क्यों न हो. ऐसे में जो चीज सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है वह है कार्य करने के पीछे के भाव. इसी के चलते कुछ कार्य बंधन बन जाते हैं तो कुछ मुक्ति.

अक्सर लोगों को लगता है कि अनाथाश्रम में जाकर, वृद्धाश्रम में जाकर, गरीब बस्तियों में जाकर या कुछ विशेष लाइमलाइट में आने वाला कार्य करके ही सेवा हो सकती है. पर सेवा का यह कांसेप्ट जो कि पूर्णत: ईसाई धर्म से आयातित है भविष्योन्मुखी है. जब तक सेवा में कुछ पाने का प्रयोजन छिपा हुआ है, कुछ विशिष्ट महसूस करने की भावना का समावेश है तब तक वस्तुत: वह सेवा है नहीं. वह भी शोषण और हिंसा का विस्तार मात्र ही है. क्योंकि एक ओर भविष्य में धन, सुख, वैभव, यश, प्रसिद्धि, स्वर्ग या किसी भी प्रतिफल की चाह लिए कोई सेवा कार्य करता है तो वह भी किसी के दुःख के व्यवसायीकरण पर आधारित प्रतिफल ही हुए. दूसरी ओर पुण्य जो भविष्योन्मुखी होता है वह फिर नए जन्म और कर्मों का बंधन बनता है...तो वस्तुत: वह हिंसा का विस्तार ही है.

ऐसे में एक आध्यात्मिक यात्री के लिए सेवा हेतु अलग से किसी कूच या अभियान की जरूरत नहीं होती. उसका तो पूरा जीवन ही आत्म सुधार की दिशा में होता है. अपने विस्तार, शोषण और हिंसा को कम करने से बेहतर कोई इस दुनिया के लिए और स्वयं के लिए कुछ कर भी नहीं सकता. इसके अलावा अपनी जीवन यात्रा में चलते हुए व्यक्ति को हजारों ऐसे अवसर मिलते हैं जहाँ वह सेवा का उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है. पर वह सेवा निष्प्रयोज्य होनी चाहिए. वह भविष्योन्मुखी नहीं बल्कि अपने ही किसी पुराने पाप कर्म की निर्जरा के रूप में या प्रायश्चित्त के रूप में अतीतोन्मुखी होनी चाहिए. और उसे वहीँ भूलकर आगे बढ़ जाना चाहिए.

यह तो बात हुई आध्यात्मिक यात्री की. लेकिन हम जैसे सामान्य मनुष्य जो न तो पूर्ण रूप से आध्यात्म को चुन सकते हैं और ना ही पूरी तरह से भौतिकवादी होना चाहते हैं ऐसे में हमारा रास्ता क्या हो? बेशक जहाँ तक संभव हो हमारी सेवा निष्काम और निष्प्रयोज्य ही होनी चाहिए. अवसर होते हुए भी जितना संभव हो हमें अपना विस्तार कम ही रखना चाहिए. क्योंकि पहले लाखों जीवों का शोषण करके करोड़पति बनना और फिर लाखों रुपये दान करना अपनी ऊर्जा को व्यर्थ गंवाना है. लेकिन हाँ जब उद्देश्य से बचना संभव न हो हो तब वह निश्चित रूप से नैतिक ही हो, अनैतिक नहीं. भविष्योन्मुखी पाप और पुण्य दोनों में से हम किसी को न चुने वह सबसे आदर्श स्थिति होती है, क्योंकि अंतत: दोनों पाप ही बन जाते हैं, अंतर बस परिमाण का होता है. लेकिन जब दोनों में से किसी एक को चुनना अपरिहार्य हो तो बेशक पुण्य का ही चुनाव होना चाहिए. क्योंकि जब तक दुनिया में रहने की चाह है तब तक हर कोई सुख की मात्रा ही अधिक चाहेगा इसलिए दुनिया को बेहतर बनाने के लिए समाज कल्याण और कुरूतियों के उन्मूलन की दिशा में किये गए कार्य भी बेहद जरुरी है. भले ही सब कुछ आँखों का भ्रम ही क्यों न हो.

इसके अतिरिक्त आत्म सुधार के लिए भी निरंतर प्रयत्नशील रहना चाहिए. हम जो भी कार्य करते हैं हम उसके प्रति कितने ईमानदार हैं...एक शिक्षक के रूप में, एक डॉक्टर के रूप में, एक वकील के रूप में हम अपने प्रोफेशन के प्रति कितने ईमानदार हैं...हमसे मदद मांगने वालों की सक्षम होते हुए हम कितनी मदद कर पाते हैं...रिश्वत, चोरी, भ्रस्टाचार, शोषण, अन्याय, झूठ, छल, धोखा, क्रोध इन सब चीजों से हम अपने आपको कितना दूर रख पाते हैं...हम लोगों की आर्थिक, जातीय, धार्मिक किसी भी स्थिति को नजरंदाज करते हुए उनके साथ किस तरह से व्यवहार करते हैं...आत्म सुधार की दिशा में ऐसी हजारों बातें हैं जो अपनाई जा सकती है. क्योंकि वस्तुत: कर्म से पूर्ण रूप से बचना तो संभव है नहीं इसलिए कर्म के पीछे के भाव बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

By Monika Jain ‘पंछी’