Thursday, December 17, 2015

Story on Friendship in Hindi

Story on Friendship Day in Hindi for Kids. Dosti ki Kahani, Two Best Mitra, Animals True Friends Tales, Mitrata Diwas Messages, Divide and Rule. मित्रता दिवस, दोस्ती की कहानी, सच्चा मित्र, दोस्त.

बोनी और टोनी की दोस्ती

बोनी बन्दर और टोनी भालू दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। उनकी मित्रता की चर्चा पूरे सुन्दर वन में थी। दोनों एक दूसरे के लिए जान की बाजी लगाने को तैयार रहते थे। बोनी का अंगूरों का एक बगीचा था, जिसके अंगूर बहुत मीठे और रसीले थे। जबकि टोनी कपड़ों की सिलाई का काम करता था। बोनी हर रोज अपने बगीचे के अंगूर और टोनी के सिले हुए कपड़े बेचने बाजार जाता था। टोनी भी बोनी के बगीचे की देखरेख में उसकी बहुत मदद करता था। टोनी के रहते किसी की हिम्मत न होती कि बगीचे के अंगूर चुरा सके। इस तरह दोनों का काम बहुत अच्छे से चल रहा था।

कुछ ही दिन पहले चंपा लोमड़ी सुंदरवन में रहने आई थी। वह बहुत चालाक थी। जब उसे बोनी के मीठे और रसीले अंगूरों के बगीचे के बारे में पता चला तो उसका मन ललचा गया।

वह सोचती, ‘काश! मुझे हर रोज ये मीठे-मीठे अंगूर खाने को मिल जाए तो रोज-रोज ये भोजन ढूंढने के झंझट से ही छुटकारा मिल जाए।’

उसने एक तरकीब सोची। उसने अपनी मीठी-मीठी बातों से टोनी और बोनी से दोस्ती बढ़ाई और उनका विश्वास जीता।

एक दिन जब बोनी अंगूर और कपड़े बेचने बाजार गया तो चम्पा टोनी के पास आई और बोली, ‘बोनी भाई का जन्मदिन आने वाला है। आपने उनके लिए क्या खास सोचा है?’

‘खास तो कुछ नहीं। बस मैंने बोनी के लिए एक पोशाक सिली है, वही उसे तोहफे में दूंगा।’ टोनी ने कहा।

‘सिर्फ पोशाक से क्या होगा? आपको उनके लिए केक और मिठाई भी लानी चाहिए। आखिर वो आपके सबसे अच्छे दोस्त हैं।’ चंपा ने कहा।

‘तुम बिल्कुल सही कहती हो चंपा बहन! पर ये सब तो शहर में मिलता है और इस तरह बगीचे को छोड़कर मैं शहर में नहीं जा सकता।’ टोनी उदास होकर बोला।

‘आपने मुझे बहन कहा है तो क्या मैं आपके लिए इतना भी नहीं कर सकती। आप बेफिक्र होकर शहर जाइए और केक, मिठाई व सजावट का सामान ले आइये। शाम को बोनी भाई के आने से पहले लौट आइयेगा ताकि उन्हें कुछ पता ना चले और ये टोकरियाँ ले जाइए क्योंकि आपके पास बहुत सारा सामान होगा।’ चंपा ने बोनी के बगीचे से अंगूरों को भरने वाली कुछ खाली टोकरियाँ टोनी को थमाते हुए कहा।

टोनी चंपा की बातों में आ गया और चंपा को धन्यवाद कहकर शहर निकल गया।

टोनी के जाते ही चंपा लोमड़ी अंगूरों पर टूट पड़ी। उसने भरपेट अंगूर खाए और बोली, ‘वाह! मजा आ गया इतने रसीले और मीठे अंगूर खाकर।’

उसने बहुत सारे अंगूर तोड़कर अपने घर में भी छिपा लिए। इसके बाद वह दौड़ी-दौड़ी बाजार पहुँची और बोनी के पास जाकर बोली, ‘बोनी भाई, बोनी भाई! मैंने अभी-अभी टोनी भाई को बहुत सारे अंगूरों की टोकरियाँ भरकर शहर बेचने को ले जाते देखा है।’

‘क्या बोल रही हो चंपा बहन? तुम होश में तो हो? टोनी बिना मुझे बताये ऐसा कोई काम कभी नहीं कर सकता।’ बोनी पूरे विश्वास से बोला।

‘आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो आप खुद चलकर देख लीजिये। टोनी भाई वहाँ नहीं हैं।’ चंपा ने कहा।

चंपा के बार-बार कहने पर बोनी अपना सामान बांधकर बगीचे पर आया। बगीचे पर टोनी नहीं था।

बहुत सारे अंगूर और टोकरियाँ भी गायब थी। यह सब देखकर उसके होश उड़ गए। उसे बहुत दुःख हुआ और गुस्सा भी आया।

‘जिसे मैं अपना सबसे अच्छा दोस्त समझता था, उसी ने मेरे साथ धोखा किया। अब मैं टोनी से कभी बात नहीं करूँगा। तुम टोनी के ये कपड़े उसे लौटा देना और कह देना कि आज से वह मेरे बगीचे की ओर आँख उठाकर भी ना देखे।’ बोनी ने कपड़े चंपा के हाथों में देते हुए कहा।

‘ठीक है बोनी भाई, आप परेशान मत होइये और घर जाकर आराम कीजिये।’ चंपा ने कहा।

‘तुम बहुत अच्छी हो चंपा बहन! अगर तुम ना होती तो मुझे टोनी की सच्चाई का पता कभी ना चल पाता। मैं तुम्हारा यह अहसान कभी नहीं भूलूंगा।’ यह कहकर बोनी घर चला गया।

कुछ देर बाद टोनी शहर से लौटकर बगीचे पर आया। उसके आते ही चंपा लोमड़ी उसके पास आई और बोली, ‘टोनी भाई, आप जब शहर गए थे तब बोनी भाई यहाँ आये थे।’

मैंने पूछा तो वे बोले, ‘कई दिनों से मेरे बगीचे से अंगूर गायब हो रहे हैं। मैं ये देखना चाहता था कि मेरी अनुपस्थिति में टोनी अंगूरों का क्या करता है? आज उसकी चोरी पकड़ी गयी। वह बिना मुझे बताये शहर जाकर अंगूर बेचता है।’

मैंने उन्हें बार-बार समझाया कि आप शहर उनके लिए केक और मिठाई लाने गए हैं पर उन्होंने मेरी एक न सुनी और ये कपड़े लौटा दिए और कहा, ‘टोनी से कह देना आज के बाद मेरे बगीचे की ओर आँख उठाकर भी न देखे।’

टोनी को यह सब जानकार बहुत बुरा लगा। उसने सोचा, ‘जिसे मैं अपना सबसे अच्छा दोस्त समझता हूँ, वही मुझ पर भरोसा नहीं करता।’

गुस्से में टोनी केक और मिठाई वहीँ पटक कर चला गया। चंपा लोमड़ी को मुफ्त का केक और मिठाई भी खाने को मिल गयी।

अगले दिन बोनी पूरे दिन बगीचे पर ही था। चंपा वहाँ आई और बोली, ‘बोनी भाई, आज आप बाजार नहीं गए।’

‘मैं बाजार चला जाऊँगा तो बगीचे की रखवाली कौन करेगा?’ उदास बोनी ने कहा।

‘मेरे रहते आपको चिंता करने की कोई जरुरत नहीं। अगर आप चाहें तो अब से मैं आपके बगीचे की देखरेख कर लूंगी। बस हाँ, भोजन के समय मुझे घर जाना होगा।’ चंपा ने कहा।

‘भोजन के लिए तुम्हें कहीं ओर जाने की क्या जरूरत है? जब भी तुम्हें भूख लगे तुम बगीचे से अंगूर खा लेना। तुम मेरे लिए इतना कुछ कर रही हो तो क्या मैं तुम्हारे लिए इतना भी नहीं कर सकता।’ यह कहकर बोनी बाजार चला गया।

बोनी और टोनी कई बार रास्ते में एक दूसरे को मिलते पर बिना बात किये आगे बढ़ जाते। बचपन के इतने अच्छे दोस्त अब एक दूसरे को फूटी आँख भी ना सुहाते। पर जब से दोनों अलग हुए थे तब से ही उदास रहने लगे थे। दोनों के व्यवसाय में भी घाटा होने लगा था क्योंकि पहले तो टोनी बोनी के बगीचे की बहुत अच्छे से देखभाल करता था पर अब चंपा लोमड़ी इतना ध्यान नहीं देती थी और ढेर सारे अंगूर खा जाती थी। उधर टोनी अब खुद बाजार में कपड़े बेचने जाता था। पर वह बेचने की कला में माहिर नहीं था। इसलिए ज्यादा कपड़े नहीं बेच पाता। इसलिए दोनों बहुत परेशान रहने लगे।

बोनी और टोनी की दोस्ती टूटने की खबर पूरे सुन्दर वन में फ़ैल गयी। सभी को बहुत आश्चर्य हुआ।

जम्बो हाथी और लम्बू जिराफ दोनों सुन्दर वन में सबसे समझदार और वृद्ध थे। दोनों को जब ये खबर मिली तो उन्हें बहुत दुःख हुआ।

‘जब से ये चंपा लोमड़ी आई है तभी से सुंदरवन में सब उल्टा हो रहा है। कई जानवर चंपा की शिकायत लेकर आते हैं। जरुर चंपा ने ही कुछ किया होगा।’ जम्बो हाथी ने कहा।

‘आप बिल्कुल सही कहते हो जम्बो भाई! हमें टोनी और बोनी को वापस मिलाने और चंपा को सबक सिखाने के लिए कुछ सोचना चाहिए।’ लम्बू जिराफ ने कहा।
दोनों ने एक उपाय सोचा। जम्बो हाथी बहुत अच्छा चित्रकार था। उसने बचपन से ही बोनी और टोनी की दोस्ती देखी थी। उसने अपने घर के एक कमरे की दीवारों पर बोनी और टोनी की दोस्ती को दर्शाते, एक दूसरे को गले लगाते और एक दूसरे के साथ खेलते बोनी और टोनी के कई चित्र बनाये और बोनी और टोनी के घर अपने यहाँ दावत का निमंत्रण भेज दिया। जब शाम को बोनी और टोनी जम्बो हाथी के घर आये तो वहाँ कोई नहीं था और चारों तरफ उन दोनों के कई चित्र बने हुए थे। उन चित्रों को देखकर उनकी दोस्ती की यादें ताजा हो गयी और दोनों की आँखों में आंसू आ गए। पर फिर भी उन्होंने एक दूसरे से बात नहीं की और जाने लगे। तभी पीछे से जम्बो हाथी और लम्बू जिराफ आये।

‘बोनी और टोनी तुम दोनों को मैं बचपन से जानता हूँ और तुम्हारी दोस्ती को भी। तुम दोनों सपने में भी एक दूसरे का बुरा नहीं सोच सकते। जरुर तुम लोगों को कोई ग़लतफ़हमी हुई है। किसी दूसरे की बातों में आकर अपनी इतनी अच्छी दोस्ती मत तोड़ो। जो भी गलतफहमी है वह अभी दूर करो। मुझे बताओ क्या हुआ है?’ जम्बो हाथी ने कहा।

जम्बो हाथी की बात सुनकर दोनों ने जो-जो चंपा लोमड़ी ने उनसे कहा था वह सब बताया। सारी बातें सुनकर दोनों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उन्हें समझते देर न लगी कि चंपा लोमड़ी ने उन दोनों को झूठ बोलकर एक दूसरे के खिलाफ भड़काया था। उन्हें अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ। दोनों ने एक दूसरे से माफ़ी मांगी, गले लगाया और कहा, ‘काका अगर आप दोनों ना होते तो हमें कभी सच का पता न चलता। आपका बहुत-बहुत आभार। अब हम उस चंपा लोमड़ी को नहीं छोड़ेंगे।’ यह कहकर दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और लाठी लेकर चंपा के घर की तरफ गए।

चंपा ने जब दोनों को साथ-साथ लाठी लेकर आते देखा तो वह समझ गयी कि उसकी चोरी पकड़ी गयी है। वह दुम दबाकर भागने लगी। बोनी और टोनी ने तब तक उसका पीछा किया जब तक वह सुन्दर वन की सीमाओं से बहुत दूर नहीं चली गयी।

इसके बाद बोनी और टोनी ने वादा किया कि अब वे किसी और की बातों में आकर अपनी दोस्ती कभी नहीं तोड़ेंगे। बोनी और टोनी फिर से हँसी-ख़ुशी रहने लगे।

By Monika Jain ‘पंछी’


How is this story about friendship?

Tuesday, December 15, 2015

Broken Heart Messages in Hindi

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एक पैगाम टूटे दिल के नाम

कोमल : वह हमेशा खुद को प्यार कहता रहा पर उसने कभी धोखे, नफ़रत, झूठ, अपमान, चालाकी और दर्द के सिवा कुछ भी नहीं दिया.
 
रश्मि : देता भी कैसे? जिसके पास जो होगा वही तो देगा.
 
कोमल : तो वह खुद को प्यार क्यों कहता फिरता है ?
 
रश्मि : तुमने ऐसे लोगों के बारे में जरुर सुना होगा जो अपने पुराने, नकली, सड़े-गले बेकार सामान को बेचने के लिए एक अच्छी सी कंपनी का सुन्दर और आकर्षक लेबल चिपका लेते हैं. बस वह भी यही करता है. अपनी गले तक भर आई नफ़रत, झूठ, चालाकी, फ़रेब आदि को बाहर निकालने के लिए उसने प्यार का चोला ओढ़ रखा है. जिसका शिकार तुम जैसे कई लोग बन जाते हैं.
 
कोमल : लेकिन, मैं ही क्यों ?
 
रश्मि : तुम ही इसलिए क्योंकि तुम्हारी अच्छाई में ऐसे बुरे लोगों से लड़ने की शक्ति है. तुम कभी टूट नहीं सकती...कभी नहीं... और तुम उदास क्यों होती हो...तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हें सच पता चल गया. वैसे भी कोई कितने भी खुशबूदार, सुन्दर और आकर्षक चोले से खुद को ढक ले. ज्यादा देर तक वह अपनी दुर्गन्ध छिपा नहीं सकता.
 
कोमल : पर वह कहता है कि वह कभी गलती नहीं करता. वह तो हमेशा दूसरों को ही दोष देता है. अपनी गलती कभी नहीं मानता.
 
रश्मि : जो ऊपर से नीचे तक कीचड़ से सना हो. उसके पास दूसरों को देने के लिए और क्या होगा? अफ़सोस ! उसने कभी आइना देखा ही नहीं.
 
कोमल : हम्म...प्यार और नफरत कुछ भी नहीं. वह तो बस दया का पात्र है.
 
रश्मि : एकजेक्ट्ली!
 
देखो! बुरा जो छूट रहा है, उसे छूटने दो. बुरे को छोड़ने का गम ना करो. यह समय दु:ख मनाने का है भी नहीं, बल्कि जश्न मनाने का है. जश्न अपनी आज़ादी का. आज़ादी उस घुटन से जो तुमने कई बार उस रिश्ते में महसूस की. आज़ादी उस दर्द से जो तुम्हें हमेशा अपने प्यार के बदले मिलता रहा. आज़ादी उस दुर्गन्ध से जो उसकी घिनौनी सोच से निकल तुम्हारे फूल सरीखे जीवन में पसरती रही. आज़ादी उन आँसुओं से जो तुम्हारी आँखों में इरादतन भरे गए, जिनके लिए तुम कभी बनी ही नहीं थी. आज़ादी उस अपमान से जो वह खुद को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में वक्त-बेवक्त तुम्हें देता रहा. आज़ादी उस बर्बर, धूर्त और स्वार्थी बंधन से जो तुम्हारी मासूमियत के लिए सजाये मौत था. इतनी आज़ादी और खुशियाँ एक साथ मिलने का भी कोई गम करता है भला?
 
उसका अहम् और दिखावा रिश्ते से ज्यादा जरुरी था, पर तुम्हारे आत्मसम्मान से ज्यादा नहीं. जो रिश्ता सिर्फ नाम का था, सिर्फ स्वार्थ पर टिका, प्यार, विश्वास, परवाह, समझ से पूरी तरह नदारद, और जो भीतर से पूरी तरह खोखला था, उस रिश्ते का बोझ ढ़ोना कहाँ की बुद्धिमानी है? याद रखो, आज़ादी हर हाल में सुकून देने वाली है. जरुरत बस हिम्मत, साहस और अडिग फैंसलों की है.
 
तुम्हारे लिए उसे भूल पाना मुश्किल होगा, लेकिन नामुमकिन नहीं. सुनो, यह मानव का स्वभाव है, वह हमेशा उन चीजों के पीछे भागता है जो उसकी पहुँच से बाहर होती है. तुम अच्छी तरह जानती हो जिस प्यार को सिर्फ तुम उससे पाना चाहती हो, वह तुम्हें कभी मिल नहीं सकता. तो फिर क्यों तुम अपनी ख़ुशी को किसी की कृपा का गुलाम बनाना चाहती हो. याद रखो, यह कतई जरुरी नहीं है कि जो चीजें आसानी से मिल जाए, उनका मोल कम है और जो ना मिले, उनका ज्यादा. जो हमसे सच्चा प्यार करते हैं, जो निस्वार्थ भाव से हमारी मदद करते हैं, जो हमारी मजबूरियों का फायदा नहीं उठाते, जो हमारी समस्याओं को समझते हैं, जिन्हें हमारी परवाह होती है, या यूँ कहूँ कि जो सच्चे अर्थों में हमारे दोस्त होते हैं, कई बार हम उन्हें वह इम्पोर्टेंस नहीं दे पाते जिनके वे हकदार होते हैं. क्योंकि हम तो उन लोगों के पीछे भाग रहे होते हैं, जो हमें आकर्षित करते हैं, जो हमें कभी नहीं समझते, जो हमें धोखा दे रहे होते हैं.
 
तुम समझ रही हो न? इसलिए फिर कहती हूँ, बुरा जो छूट रहा है, उसे छूटने दो. बुरे को छोड़ने का गम ना करो. एडजस्टमेंट करना गलत नहीं, लेकिन यह तुम्हारी मुस्कुराहट की कीमत पर तो नहीं होना चाहिए न? किसी को माफ़ कर देना भी गलत नहीं है. पर कई बार हमारी माफ़ी को हमारी कमजोरी समझ लिया जाता है और सामने वाला इसे अपने उचित-अनुचित हर तरह के व्यवहार पर हमारा समर्थन समझने लगता है. और फिर माफ़ कर देने का मतलब स्वीकार करना तो नहीं होता.
 
जो टूट गया है, वह व्यर्थ नहीं गया. उसने तुम्हें ज़िन्दगी जीने के कई सबक सिखाएँ हैं. तुम बस स्वागत करो उस खुले आकाश का जो तुम्हारे पंखों को उड़ान देने को व्याकुल है. जो तुम्हारी बातों, आँखों और मुस्कुराहटों को जीवन देने वाला है. जो तुम्हें सही मायनों में प्यार करना सिखाने वाला है. पहले खुद से प्यार और फिर सबसे प्यार.

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this article about leaving or ending a bad relationship?

Saturday, December 12, 2015

Poem on Makar Sankranti in Hindi

Poem on Makar Sankranti in Hindi. Makarsankranti par Kavita, Happy Uttarayan Festival, Farmer Sankrant Sms, Messages, Wishes, Shayari, Quotes, Slogans, Status, Rhymes. मकर संक्रांति कविता, शायरी.

आई मकर संक्रांति

(1)

हुए सूर्य संक्रमित
आई फिर संक्रान्ति
देने नया उत्साह
भरने नया हर्ष
मन में कृषक के.

उड़ेंगे पतंग
ले जाएंगे अपने साथ
कृषक की तमाम अर्ज़ियाँ
सूर्य के पास
जितना ऊँचा उठेंगे पतंग
उतना ही बढ़ेगा उत्साह कृषक का.

जब कभी हतोत्साहित होगा कृषक
तो पुकारेगी पतंग
ठहरो कृषक!
करो तैयारी आएगा नया वर्ष
जब पुनः करोगे गान
होगा स्वर्ण विहान
करो तैयारी फिर से
नया बीज बोने की.

(2)

आई लेकर नव विहान देखो प्यारी आई संक्रांति
और समेटे जीवन धन की कितनी ही ये निर्मल शांति.

कृषक खिल उठे, महका जीवन, तिल की, गुड़ की ख़ुशबू से
हुआ संचरित नव उत्साह, नवल सूर्य के जादू से.

चले डोर संग व्योम भेदने और सजाने ज्यों विहंग
बच्चे दौड़े लेकर हाथों-हाथों में सुंदर पतंग.

बीजेंगे अब कृषक बीज और लाएंगे फिर जीवन क्रांति
आई लेकर नव विहान देखो प्यारी आई संक्रांति.

(3)

सूर्य जाता है जब दूसरी राशि में
तब क्यों खुश हो जाता है किसान इतना
कि उड़ने लगते हैं पतंग
छाने लगती है खुशबू घी की चारों ओर
रग फैलने लगते हैं इधर उधर...

क्यों किसान सोचता है कि
संक्रमित होना सूर्य का शुभ होगा
उनके लिये उनके बीजे हुए बीजों के लिये...

क्या नहीं जानता किसान कि
नहीं बदलतीं ऋतुएँ किसानों के लिये
सूर्य नहीं होते संक्रमित किसानों के लिये
बल्कि उन्हें जाना होता है सिर्फ मकर राशि में
खत्म होना होता है सर्दियों का
किसानों का कोई हेतु नहीं होता इसमें
लेकिन खुश होेता है किसान…

नदी अपना पानी नहीं पीती
पेड़ अपने फल नहीं खाते
किसान उपजाते हैं अन्न खुद के लिये नहीं
बल्कि इसलिये कि
अगली बार फिर आए संक्रांति
फिर हो सूर्य संक्रमित
जाए दूसरी राशि में
और उड़ें पतंग
महके तिल-मूंगफली की खुशबू चारों ओर…

 
By Aman Tripathi


How are these poems about Makar Sankranti?



Thursday, December 10, 2015

Power of Mind in Hindi

Essay on Power of Mind in Hindi. Positive Attitude Thoughts, Subconscious Thinking Article, Words, Law of Attraction, The Secret Rahasya, Vichar Shakti Ka Vigyan. सकारात्मक विचार शक्ति, आकर्षण का नियम.

विचार वस्तु है ~ समझे अपने विचारों की जिम्मेदारी

कुछ सालों पहले मैंने एक दोस्त से कहा था, 'मैंने अपने जीवन में कभी कोई चमत्कार घटित होते हुए नहीं देखा.' आज भी मैं यही कहती हूँ कि मैंने अपने जीवन में कोई चमत्कार घटित होते हुए नहीं देखा. लेकिन तब से लेकर आज तक के इसी वाक्य में सोच और समझ का एक विस्तृत अंतर आ चुका है. तब मन यह सोचता होगा कि दूसरों के लिए चमत्कार जैसा कुछ होता होगा पर मेरे लिए नहीं हुआ कभी लेकिन आज मन यह जानता है कि चमत्कार जैसा कुछ होता ही नहीं. हर चीज का कोई कारण कोई विज्ञान अवश्य होता है. या फिर यूँ कहूँ कि जो कुछ भी है सब चमत्कार ही है और दोनों बातों के मायने बिल्कुल एक ही हैं.
 
कुछ दिनों से एक लैटर का इंतजार हो रहा था. लैटर को अब तक आ जाना चाहिए था...लेकिन नहीं आया और यह बेहद जरुरी था मेरे लिए. मम्मा से रोज पूछ रही थी कि पोस्टमैन अंकल आये क्या? आज इंतजार की शिद्दत कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी थी. आज फिर पूछा तो मम्मा ने कहा पोस्टमैन को कई दिनों से इधर देखा ही नहीं है. लैटर का न आना बहुत परेशानी में डाल सकता था. इसलिए थोड़ी बेसब्री थी, पर कहीं न कहीं मन में विश्वास भी था कि आएगा जरुर. कुछ देर बाद पोस्टमैन अंकल आ ही गए. माँ ने मुझे बुलाया. माँ को उन्होंने कई सारी पोस्ट्स पकड़ाई पर मेरी नज़र जिस लिफाफे को ढूंढ रही थी वह नहीं दिखा. तो मैंने पोस्टमैन अंकल को उस लैटर के बारे में बताते हुए जब भी वह आये उसे जल्द से जल्द पहुँचाने की कह दिया. मम्मा ने अंदर आते हुए मैगजीन्स के बीच में से एक लिफाफा निकालते हुए मुझसे पूछा और हाँ यही मेरा वह सुकून लौटाने वाला लिफाफा था. इंतजार के खत्म होने से बड़ा सुकून और हो भी क्या सकता है.
 
कुछ देर बाद मैं पोस्टमैन अंकल के बारे में सोच रही थी. यहाँ इस शहर में आने के बाद से कितनी ही बार काँटों से भरे जीवन पथ में वो खुशियों के फूल चुन-चुन कर मेरे लिए लाते रहे हैं, जिनसे स्थायी न सही पर ज़िन्दगी का दर्द कुछ समय के लिए कम तो हो ही जाता है और सबसे बड़ी बात मुश्किलों का सामना करने का हौंसला भी मिल जाता है. मुझे उन्हें कुछ गिफ्ट देना चाहिए. क्या देना चाहिए यह सब सोचते-सोचते मैं कुछ काम निपटाने लगी और कुछ देर बाद फेसबुक पर आई. न्यूज़ फीड देखते हुए नज़र अचानक एक पोस्ट पर पड़ी जो कि एक पोस्टमैन और एक लड़की की संवेदनशील कहानी थी. उसमें उस लड़की ने उस पोस्टमैन को दिवाली के अवसर पर एक दिल छू लेने वाला गिफ्ट दिया था. मैं सोचने लगी देखो! इस लड़की ने तो गिफ्ट कर भी किया और मैं जो अभी तक सोच ही रही हूँ. उस पोस्ट को पढ़कर यह भावना और भी दृढ़ हो गयी कि अब तो कुछ अच्छा सा गिफ्ट करना ही है.
 
पिछले कुछ महीनों में (जब से ध्यान देना शुरू किया है) हजारों ऐसी घटनाएँ हो चुकी हैं, जिसमें जब भी कोई विचार मन में उठता है उसी से मिला जुला कुछ न कुछ कहीं देखने-पढ़ने को मिल जाता है. कोई पोस्ट लिखना टाल देती हूँ तो कुछ ही घंटों में किसी और की पोस्ट में वही विचार प्रकट हो जाते हैं. किसी बुक को पढ़ते समय कुछ सवाल पैदा होते हैं तो कुछ ही देर में किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं उनका जवाब मिल जाता है. कई सवाल बहुत गूढ़ होते हैं पर एक दिन बस यही सोच लिया कि यह रसभरी क्या होती है? (रसमलाई का नाम रसभरी भी होता है यह मुझे नहीं पता था) और कुछ ही देर बाद फेसबुक पर किसी ने रसमलाई की फोटो पोस्ट की और उस पर रसभरी लिखा था. महीनों बाद किसी की पोस्ट दिखती है, उस व्यक्ति या उस पोस्ट के बारे में कुछ सोचने लगती हूँ कि मेरे लाइक या कमेंट कुछ करने से पहले ही उन जनाब का कोई कमेंट या लाइक मेरी पोस्ट पर आ जाता है. कई चीजों का पूर्वानुमान हो जाता है. ये सब तो बहुत छोटी-छोटी सी बातें हैं पर कुछ अनुभव तो इतने अद्भुत हैं कि उन्हें शब्द दे पाना संभव ही नहीं है. इन्हें संयोग कहा जा सकता है लेकिन वास्तव में संयोग जैसा कुछ होता नहीं. यह विचारों और मन पर काम करने वाला विज्ञान है. जिसे आधुनिक युग में आकर्षण का नियम कहा जाता है. लेकिन आध्यात्म में इसका समावेश युगों-युगों से है. कई उदाहरणों के साथ इस रूप में भी कि जब तक हमारी एक भी इच्छा शेष है हमें जन्म लेते ही रहना पड़ेगा.
 
फेसबुक पर आलोचना करती हुई, क्रूर व्यंग्य करती हुई, ख़तरनाक ताने मारती हुई, नकारात्मक, सिर्फ समस्यायों ही समस्यायों से भरी, गालियों और घृणा से सनी पोस्ट्स की अति देखती हूँ तो अच्छा नहीं लगता. विचार स्पंदन होते हैं. अपने ही जैसे विचारों और घटनाओं को आकर्षित करते हैं. विचार कब वस्तु या वास्तविकता बन जाए कहा नहीं जा सकता. हम अपने शब्दों और विचारों की अहमियत नहीं समझते, लेकिन इनके कितने घातक और अच्छे प्रभाव हो सकते हैं यह सोचा जाना बेहद जरुरी है. इसलिए शब्दों और विचारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझिये. ये सिर्फ आपके जीवन को नहीं बल्कि सबके जीवन को प्रभावित करते हैं. इसलिए जितना संभव हो प्रेम और सकारात्मकता को फैलाइये. कुछ पाने के लिए सबसे पहले उसके बारे में सोचना और बात करना ही जरुरी है. सिर्फ समस्यायों की चर्चा से तो समस्याएं ही हासिल होनी है. जरुरी है बातें समाधान की भी हो. प्रेम बोईये ताकि प्रेम पुष्पित और पल्लवित हो. ज़िन्दगी नफ़रत पर बर्बाद कर देने के लिए नहीं है. ज़िन्दगी का हासिल तो सिर्फ प्रेम ही हो सकता है और कुछ भी नहीं क्योंकि यहीं मृत्यु के उस हासिल तक पहुँचा सकता है जिसे मुक्ति कहते हैं.
 
By Monika Jain ‘पंछी’

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Sunday, December 6, 2015

Essay on Books in Hindi

Essay on Books are Our Best Friend in Hindi for Kids. Kitab par Nibandh, Pustak Lekh, Importance of Book Article, Library Speech, Pustakalaya Anuched, Paragraph. पुस्तक का महत्व पर निबंध, किताब लेख.

खुद से बेहतर किताब कौनसी?
 
अगर कोई आज मुझसे पूछे कि दुनिया में करने लायक सबसे अच्छे काम क्या हैं तो उस लिस्ट में एक काम को मैं निश्चित रूप से शामिल करुँगी, वह है किताबें पढ़ना, इसके बावजूद कि आज तक कोर्स बुक से इतर कुल 10-15 किताबें हीं पढ़ी हैं, और इस बात का गहरा अफ़सोस भी है कि मैंने बचपन से कोर्स से इतर किताबें पढ़ने में रूचि क्यों नहीं ली और तब वैसा मार्गदर्शन क्यों नहीं मिला जैसा फेसबुक से जुड़ने के बाद खोज पायी. पर हाँ एक बात यह भी है कि किसी भी अच्छे काम की शुरुआत के लिए कभी देर नहीं होती और जो आत्मा को ही एकमात्र सच मानते हैं उनके लिए तो वाकई में कभी देर नहीं होती क्योंकि उस सच को पाने के लिए अभी क्रमिक विकास के पथ पर चलते हुए जाने कितने जन्मों से गुजरना होगा. और अच्छी किताबों को पढ़ने में रूचि का जाग्रत हो जाना उसी विकास पथ पर आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करना है.

अब बात आती है अच्छी किताबों की तो निश्चित रूप से यह व्यक्तिगत रूचि का विषय है कि किसे कौनसी किताब अच्छी लगेगी और कौनसी नहीं. पर मुझे यह लगता है कि हर मनुष्य अपने आप में एक मुक्कमल किताब है जिसे पढ़ लेने के बाद कुछ भी पढ़ना शेष नहीं रह जाता. हमारे अपने मन से बेहतर और कोई किताब नहीं हो सकती. इसलिए सबसे अच्छी किताबों की श्रेणी में मैं उन किताबों को रखती हूँ जो हमारे मन को निष्पक्ष रूप से पढ़ने में सहायक बनती है. क्योंकि स्वयं को पढ़ना ही जिसे हम स्वाध्याय या आध्यात्म भी कहते हैं हमें हमारी एकमात्र मंजिल तक पहुँचाने में सहायता करता है.

कुछ शब्दों, कुछ वाक्यों के गहरे अर्थ बहुत देर से समझ आते हैं. अब तक यह बात हमेशा सिर्फ दूसरों के मुंह से सुनी थी कि किताबें सबसे बेहतर दोस्त होती हैं पर बीतें दिनों कुछ ऐसी किताबें हाथ में आई जो कोरा आईना थी. जिन्हें पढ़ते हुए पता चला कि कोर्स से इतर भी ऐसी किताबें होती हैं जिन्हें घंटों बैठकर पढ़ा जा सकता है. कोर्स बुक्स तो अक्सर मजबूरी में ही पढ़नी होती है पर ये किताबें कुछ ऐसी थीं कि गंभीर विषय होते हुए भी इन्हें पढ़ते समय लगातार मुस्कुराया जा सकता है; जो ठहरकर बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देती है; जो हमारी अच्छाईयों, बुराईयों, कमियों और शक्तियों सभी का परिचय कुछ इस तरह हमसे करवाती हैं कि अपने विचारों और भावनाओं के प्रति एक सजग दृष्टि हममें विकसित हो जाती है; और इन सबसे इतर ऐसे अद्भुत अहसास और अनुभव दे जाती हैं जिन्हें शब्दों में व्यक्त किया ही नहीं जा सकता. इन किताबों ने मन के अध्ययन में बहुत सहायता की इसलिए इनके प्रति कृतज्ञता स्वाभाविक है और इन्हें सच्चा दोस्त समझना भी.

जब से किताबें पढ़ने का स्वाद चढ़ा है तो लिखना बस एक औपचारिकता भर रह गया है. पाठकों के सन्देश, उनके ईमेल्स, उन्हें ब्लॉग से मिली सहायता, प्रेरणा और मार्गदर्शन यही बस कुछ कारण रह गए हैं जिनकी वजह से लिखना जारी है. बाकी आज मुझे बाल गंगाधर तिलक का यह कथन बिल्कुल सार्थक लगता है, ‘मैं नरक में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूँगा, क्योंकि इनमें यह शक्ति है कि जहाँ ये होंगी, वहां अपने आप ही स्वर्ग बन जायेगा.’
 
By Monika Jain ‘पंछी’

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