Saturday, December 12, 2015

Poem on Makar Sankranti in Hindi

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आई मकर संक्रांति

(1)

हुए सूर्य संक्रमित
आई फिर संक्रान्ति
देने नया उत्साह
भरने नया हर्ष
मन में कृषक के.

उड़ेंगे पतंग
ले जाएंगे अपने साथ
कृषक की तमाम अर्ज़ियाँ
सूर्य के पास
जितना ऊँचा उठेंगे पतंग
उतना ही बढ़ेगा उत्साह कृषक का.

जब कभी हतोत्साहित होगा कृषक
तो पुकारेगी पतंग
ठहरो कृषक!
करो तैयारी आएगा नया वर्ष
जब पुनः करोगे गान
होगा स्वर्ण विहान
करो तैयारी फिर से
नया बीज बोने की.

(2)

आई लेकर नव विहान देखो प्यारी आई संक्रांति
और समेटे जीवन धन की कितनी ही ये निर्मल शांति.

कृषक खिल उठे, महका जीवन, तिल की, गुड़ की ख़ुशबू से
हुआ संचरित नव उत्साह, नवल सूर्य के जादू से.

चले डोर संग व्योम भेदने और सजाने ज्यों विहंग
बच्चे दौड़े लेकर हाथों-हाथों में सुंदर पतंग.

बीजेंगे अब कृषक बीज और लाएंगे फिर जीवन क्रांति
आई लेकर नव विहान देखो प्यारी आई संक्रांति.

(3)

सूर्य जाता है जब दूसरी राशि में
तब क्यों खुश हो जाता है किसान इतना
कि उड़ने लगते हैं पतंग
छाने लगती है खुशबू घी की चारों ओर
रग फैलने लगते हैं इधर उधर...

क्यों किसान सोचता है कि
संक्रमित होना सूर्य का शुभ होगा
उनके लिये उनके बीजे हुए बीजों के लिये...

क्या नहीं जानता किसान कि
नहीं बदलतीं ऋतुएँ किसानों के लिये
सूर्य नहीं होते संक्रमित किसानों के लिये
बल्कि उन्हें जाना होता है सिर्फ मकर राशि में
खत्म होना होता है सर्दियों का
किसानों का कोई हेतु नहीं होता इसमें
लेकिन खुश होेता है किसान…

नदी अपना पानी नहीं पीती
पेड़ अपने फल नहीं खाते
किसान उपजाते हैं अन्न खुद के लिये नहीं
बल्कि इसलिये कि
अगली बार फिर आए संक्रांति
फिर हो सूर्य संक्रमित
जाए दूसरी राशि में
और उड़ें पतंग
महके तिल-मूंगफली की खुशबू चारों ओर…

 
By Aman Tripathi


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