Sunday, January 25, 2015

Story on Moral Education in Hindi


Story on Moral Education in Hindi Language for Kids, Children, Best Student Award, Prize, Sarvashreshtha Chhatra Puraskar, Ideal Friend, Sacha Mitra, Dost, Annual Function of School, Morals Values, Inspirational, Motivational, Small Kahani, Short Tales, Katha, Stories, Kahaniyan, Tale, Kathayen, Incidents, सर्वश्रेष्ठ छात्र पुरस्कार, हिंदी कहानी, नैतिक शिक्षा कथा, सच्चा मित्र, दोस्त, वार्षिक समारोह, इनाम, कहानियाँ, कथाएँ, प्रेरक प्रसंग, घटनाएँ

सर्वश्रेष्ठ छात्र  
(नन्हें सम्राट में प्रकाशित)

आज स्कूल का वार्षिकोत्सव था. हर क्षेत्र में प्रतिभा दिखाने वाले बच्चों को पुरस्कारों का वितरण हो रहा था. रोहन बहुत खुश और उत्साहित नजर आ रहा था. उसे पूरा विश्वास था कि इस साल उसे ही स्कूल के बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड मिलेगा. उसने स्कूल टॉप किया था और बैडमिंटन में भी राज्य स्तर पर प्रथम स्थान पाया था. वह बहुत सुन्दर भी था. पर इन सब बातों पर उसे बहुत घमंड था. अपने सामने वह किसी को कुछ नहीं समझता था. सामने रखी ट्रॉफी की ओर इशारा करते हुए बार-बार दोस्तों से कह रहा था, ‘देखना, यह ट्रॉफी थोड़ी देर बाद मेरी ही बगल में होगी.’

‘पर स्कूल तो अमित ने भी टॉप किया है तो उसे भी तो अवार्ड मिल सकता है’ रोहन का एक दोस्त डरते-डरते बोला.

‘तू चुप कर. वह लंगड़ा पढ़ाई के अलावा और कर ही क्या सकता है? मैं तो खेलकूद में भी अव्वल हूँ, इसलिए इनाम तो मुझे ही मिलेगा.’ रोहन इतराते हुए बोला.

सभी पुरस्कारों के वितरण के बाद अंत में जब बेस्ट स्टूडेंट के पुरस्कार की बारी आई तो अमित के नाम की घोषणा हुई. तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूँज उठा. पर रोहन के चेहरे की ख़ुशी और उत्साह नाराजगी, गुस्से और ईर्ष्या में बदल गयी. वह अपने दोस्तों से कहने लगा, ‘इस टकले प्रिंसिपल ने इस लंगड़े में जाने क्या देख लिया कि इसे बेस्ट स्टूडेंट बना दिया. जरुर तरस खाकर ही यह इनाम दिया होगा. वरना इस अवार्ड पर तो पूरी तरह से मेरा ही हक़ था.’

रोहन के चापलूस दोस्त उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगे. पर अंशुल को रोहन की यह बात बहुत बुरी लगी.

वह बोला, ‘रोहन यह अच्छी बात नहीं है. तुम एक तरफ बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड चाहते हो और दूसरी तरफ किसी के लिए कैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए ये भी तुम्हें नहीं पता. शारीरिक कमजोरी तो किसी में कभी भी आ सकती है. पर इसका यह आशय नहीं कि हम किसी की कमजोरी का मजाक उड़ायें, और किसी को सिर्फ उसकी शारीरिक दुर्बलता की वजह से कमतर आंके. अमित सिर्फ पढ़ाई में होशियार ही नहीं उसका आचरण भी बहुत अच्छा है. अपनी शारीरिक कमजोरी के बावजूद भी वह हमेशा सबकी मदद के लिए तैयार रहता है. पढ़ाई में कमजोर छात्रों को पढ़ाता है. छोटे, बड़े सभी का कितना आदर करता है और यही सब बातें उसे स्कूल का सर्वश्रेष्ठ छात्र बनाती है.’

‘वह ढंग से चल फिर नहीं सकता. इसलिए सबकी सहानुभूति पाने के लिए ऐसा करता है. खैर! उसे तो मैं अगले साल देख लूँगा.’ यह कहकर रोहन अपने दोस्तों के साथ घर की ओर निकल पड़ा.

गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल वापस शुरू हुए. रोहन अमित को नीचा दिखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता था. उसकी हमेशा यही कोशिश रहती कि अमित पढ़ाई में ज्यादा ध्यान ना दे पाए. एक बार तो उसने अमित की कुछ नोटबुक्स भी उसके बैग से चुराकर कहीं छिपा दी. ताकि वह परेशान रहे.

वार्षिक परीक्षा में तीन महीने बचे थे. एक दिन रास्ते में रोहन की साइकिल का एक कार से एक्सीडेंट हो गया और वह लहूलुहान सड़क पर बेहोश होकर गिर पड़ा. अस्पताल में जब उसे होश आया तो पता चला उसके दोनों पांवों की हड्डियाँ टूट गयी है और दोनों में प्लास्टर बंध गया है. वह बहुत डर गया. वह माँ से पूछने लगा, ‘माँ मेरे पैर सही तो हो जायेंगे ना? मैं फिर से चल तो सकूँगा ना? और माँ मैं अपना एग्जाम तो दे पाऊंगा ना?’

माँ ने उसे भरोसा दिलाया कि सब कुछ ठीक हो जाएगा और उसे आँखें बंद कर आराम करने को कहा.

पर जैसे ही उसने अपनी आँखें बंद की उसकी आंखों के सामने स्कूल का वार्षिकोत्सव, अंशुल और अमित का चेहरा घूमने लगा. उसे अंशुल की कही हुई सब बातें याद आने लगी और वह सब हरकतें भी जो उसने अमित को परेशान करने के लिए की थी. ज्यों ही उसने आँखें खोली अपने सामने उसने अंशुल और अमित को पाया, जो उसकी तबियत पूछने के लिए वहां आये थे. उन्हें देखकर रोहन का रोना छूट गया. वह अपने किये पर बहुत शर्मिंदा था. उसने अपनी सारी गलतियाँ स्वीकार की और अमित से माफ़ी मांगी.

अमित ने उसे चुप करवाते हुए कहा, ‘तुम बिल्कुल चिंता मत करो. तुम बहुत जल्द ठीक हो जाओगे और रही स्कूल और पढ़ाई की बात तो स्कूल में अब जो भी पढ़ाया जाएगा वो मैं तुम्हें घर आकर समझा दूंगा और तुम्हें नोट्स भी दे दूंगा. तुम बस समय पर दवा लो और जल्दी से ठीक हो जाओ.’

अमित की बातों से रोहन को बहुत हिम्मत मिली और साथ ही उसे आत्मग्लानि भी हुई, ‘जिस लड़के का वह हमेशा मजाक उड़ाता रहा, परेशान करता रहा आज वही उसकी मदद के लिए सबसे पहले आया. वह सचमुच सर्वश्रेष्ठ है.’

डॉक्टर ने रोहन को दो महीने घर पर ही आराम के लिए कहा. उधर अमित स्कूल के बाद अक्सर रोहन के घर आ जाता और उसे स्कूल में पढ़ाया हुआ सब कुछ समझा देता. अमित और रोहन बहुत अच्छे दोस्त बन गए. परीक्षा तक रोहन बिल्कुल ठीक हो गया. अमित की मदद से उसने अच्छे अंकों से परीक्षा पास की.

आज फिर से वार्षिकोत्सव था. सर्वश्रेष्ठ छात्र के नाम की घोषणा होने वाली थी. हर ओर से अमित का ही नाम गूँज रहा था और जब अमित को पुरस्कार मिला तो रोहन सबसे ज्यादा खुश नज़र आ रहा था.

Monika Jain 'पंछी'

How is this story on Moral Education to be an Ideal or Best Student. Feel free to share your views. 

Friday, January 23, 2015

Poem on Zoo in Hindi


Poem on Zoo in Hindi Language for Kids, Children, Chidiya Ghar par Kavita, Visit to a Zoological Garden, Wild Animals, Birds, Wildlife Park, Bird Sanctuary, Poetry, Rhyming Rhymes, Sher o Shayari, Lines, Slogans, Sms, Messages, Ghazal, Nazm, Muktak, Composition, Geet, Song, Lyrics, Quotes, Thoughts, Sayings, Words, Proverbs, चिड़ियाघर पर हिंदी कविता, पक्षी अभयारण्य, नज़्म, गज़ल, शेर ओ शायरी, नारे, नारा, गीत, मुक्तक, स्लोगन

चिड़ियाघर की सैर 

सूंड हिलाता हाथी आये 
घोड़ा सरपट दौड़ लगाये 
चिड़ियाघर की सैर कराने 
हमको पापा लाये. 

भूरी-भूरी कोमल काया 
जल से बाहर निकल कर आया 
ऊदबिलाव को देख-देखकर 
हम बच्चों का मन हर्षाया. 

लम्बे-लम्बे काले बाल 
सील मछली थी बड़ी कमाल
नटखट बंदरों की टोली ने 
मचा रखा था बड़ा धमाल. 

खुला मुंह करके लेटा था 
झील किनारे मगरमच्छ. 
भारी-भरकम बॉडी वाला 
गेंडा दिखता था बड़ा गज़ब.

एक ओर बतखें करती थी
पानी में अठखेलियाँ 
दूजी और चहक-चहकती 
रंग-बिरंगी चिड़िया. 

मछलीघर में करती थी चुहुल 
मछलियाँ ढेर सारी 
हम सबने मिलकर की 
हाथी की खूब सवारी. 

उछल-कूद करते लंगूर 
देखो! हल्ला लगे मचाने 
बड़े-बड़े नाखूनों वाला 
भालू बैठा था सुस्ताने. 

बड़ी-बड़ी जादूई आँखों 
वाला वो शर्मीला हिरण
लम्बी-लम्बी गर्दन वाला 
जिराफ बड़ा था विलक्षण.

झुंडों में विचरण करते 
चीतल थे कितने प्यारे 
काली-काली धारियों वाले 
जेब्रा थे सबसे न्यारे. 

हरियल तोते कितने सारे 
उड़ते जाते फुर्र-फुर्र
नीले-नीले पंखों वाला 
मोर बड़ा था सुन्दर. 

पेड़ पे लेटा देखा हमनें 
एक बड़ा सा अजगर 
उसे देख एक पल को हम सब 
काँप गए थे थर-थर. 

बाघ था स्याह धारीदार 
शेर के पाँव थे गद्देदार 
लगी छूटने कंपकंपी हमारी 
सुनकर उसकी तेज दहाड़.

उल्लू, लोमड़ी और कंगारू 
ना जाने क्या-क्या देखा 
सपनों से भी प्यारा ये 
चिड़ियाघर था कितना अनोखा.

By Monika Jain ‘पंछी’

Visiting to a zoo is a pleasing experience for we all. How is this hindi poem on a visit to a zoo? Feel free to share your views. 


Sunday, January 11, 2015

Makar Sankranti Story in Hindi


Makar Sankranti Story in Hindi Language, Festival, Patang, Kite, Orphan, Forlorn, Child Labour, Paropkar, Helping Others, Based on Moral Values, Education, Humanity, Kindness, Kahani, Tales, Katha, Stories, Kahaniyan, Kathayen, Incident, Prerak Prasang, मकर संक्रांति त्योहार पर हिंदी कहानी, पतंग, अनाथ, मानवता, दया, सहायता, शिक्षा, नैतिक मूल्य, कहानी, कहानियाँ, कथा, कथाएँ, प्रेरक प्रसंग, घटनाएँ 

हरी पतंग और लाल दुपट्टा  (राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित)

पतंगों का मौसम आ चुका था. आकाश में लाल, नीली, पीली, हरी, नारंगी ढेर सारे रंगों की पतंगें उड़ते हुए ऐसी लग रही थी, मानो इन्द्रधनुष के सारे रंग आकर आकाश में बिखर गए हों. इन रंगों की सोहबत में सारा आकाश खिलखिलाता सा नज़र आ रहा था. रेवड़ी, तिलपट्टी, मूंगफली, तिल के लड्डू सब थाली में लिए मैं भी छत पर पड़ौस के बच्चों के साथ पतंग उड़ाने पहुँच गयी. तभी छत से नीचे सड़क पर कई दिनों बाद एक चबूतरे पर बैठी रेवती नज़र आई. बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से कभी वो आकाश में उड़ती पतंगों को देखती तो कभी मायूस होकर शून्य में ताकने लगती. 

रेवती घर से थोड़ी दूर बने आधे कच्चे आधे पक्के घर में रहती थी. कुछ महीनों पहले तक तो जब उसकी माँ झाड़ू-बर्तन करने आती थी, अक्सर उसका घर में आना-जाना होता था. पर पिछले ही महीने उसकी माँ चल बसी. आसपास के लोग बताते हैं कि उसके शराबी पति ने एक रात उसे इतनी बेरहमी से पीटा कि अगली सुबह उसकी आँखें ही ना खुली और वह उस 12-13 साल की बच्ची को अकेला छोड़कर सदा के लिए चली गयी. 

रेवती की माँ रेवती से बहुत प्यार करती थी. अक्सर उसकी ही बातें करती रहती थी. रेवती उसकी इकलौती संतान थी. मैं जब भी रेवती की पढ़ाई के बारे में पूछती तो वह बड़े उत्साह से कहती, ‘ दीदी जी, रेवती को तो खूब पढ़ा लिखाकर बड़ी अफसरानी बनाना है. उसे ना मांजने पड़ेंगे यूँ घर-घर जाकर बर्तन. समझदार बड़े अफसर से ही उसका ब्याह भी रचाऊँगी. बेटी के जीवन में किसी बात की कमी ना होने दूँगी. चाहे उसके लिए दस घर और क्यों ना पकड़ने पड़े.’ 

रेवती की माँ का उत्साह देखकर बड़ा अच्छा लगता था. एक अनपढ़ गरीब औरत के दिल में अपनी बच्ची के लिए ऐसे सपने पलते देखकर दिल ख़ुशी से भर जाता. साथ ही ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले उन तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों पर गुस्सा भी आता जो आज भी लड़की के जन्म पर उदास हो जाते हैं और कुछ तो जन्म से पहले ही उसे मृत्यु की गोद में सुला आते हैं. 

रेवती पढ़ने में बहुत होशियार थी. मैं भी अक्सर रेवती को गणित और अन्य विषयों के प्रश्न हल करने में मदद करने लगी. दिल से यही चाहती थी कि रेवती की माँ की आँखों की जो चमक है, वह कभी फीकी ना पड़े. उसके सारे सपने सच हो. पर नियति को जाने क्या मंजूर था जो वो चमक भरी आँखें ही सदा के लिए मूँद गयी और उसके साथ ही रेवती को लेकर देखे सारे सपने भी सो गए. 

रेवती की माँ के गुजरने के बाद उसके शराबी पिता ने उसकी स्कूल छुड़वा दी और उसे भी घर-घर जाकर बर्तन मांजने के काम में लगा दिया ताकि उसकी शराब के पैसे जुटाए जा सके. यह सब जानकर मुझे बड़ा दुःख हुआ. एक दिन मैंने रेवती से उसकी सभी कॉपी-किताबें घर मंगवा ली और उसे कहा कि काम के बीच में वह 1 घंटा यहाँ पढ़ने आ जाया करे और किसी को यह बात ना बताये. इससे पिता को शक नहीं होगा, वह यही समझेगा कि यहाँ भी काम करने ही आती है. कुछ दिन तो यह चलता रहा पर एक दिन अचानक उसके पिता को जाने कैसे ख़बर लग गयी और वह जब रेवती पढ़ रही थी तब आया और उसका हाथ पकड़कर पीटते हुए ले जाने लगा. मैंने रोकने की कोशिश की तो उसने रेवती की सारी कॉपी किताबें मुझे घूरते हुए मेरी आँखों के सामने ही माचिस की एक तीली लगाकर जला दी. मानो मुझे कह रहा हो, अब ना करना ऐसी जुर्रत. 

उस घटना के कई दिन बाद तक रेवती नज़र नहीं आई. आज अचानक जब रेवती को चबूतरे पर अकेले बैठे देखा तो मन किया उससे बात करने का, उसका हाल पूछने का. यह सोचते हुए मैं कुछ तिल के लड्डू और रेवड़ियाँ एक अख़बार में लपेटकर नीचे आई और रेवती को अपने पास बुलाया. रेवती ने पहले डरते-डरते चारों ओर देखा और फिर दौड़कर मेरे पास आ गयी. मैंने उससे पूछा, ‘कैसी है रेवती ? सुबह से कुछ खाया या नहीं ?’ रेवती कुछ नहीं बोली. वह तो बार-बार बस आसमान में उड़ती पतंगों को देखे जा रही थी. मैंने उससे पूछा, ‘ तुझे पतंग चाहिए ?’ उसने बस सहमति में सर हिला दिया. मैंने उसे अख़बार में बंधे लड्डू और रेवड़ियाँ पकड़ाई और कहा, ‘ तू पहले इसे खा ले. तब तक मैं लेकर आती हूँ पतंग.’ यह सुनकर रेवती लड्डू-रेवड़ियाँ लेकर तुरंत वापस उसी चबूतरे पर चली गयी और वहां बैठकर मेरे वापस आने का इंतजार करने लगी. मैं छत पर रखी पतंगों में से एक हरी रंग की पतंग और मांझा ले आई और रेवती को दे दिया. मैंने देखा रेवती ने तो अख़बार खोला तक नहीं था. वह तो बस पतंग के ही इंतजार में बैठी थी. मुझे लगा कुछ देर बाद खा लेगी और यह सोचकर मैं भीतर आ गयी. 

करीब 1-2 घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई. मैंने देखा रेवती खड़ी थी. हाथ में वही पतंग और मांझा लिए हुए. मैंने कहा ये तेरे लिए ही है, तू इसे वापस क्यों लेकर आई है ? तब रेवती बोली, ‘ दीदीजी मुझे पतंग उड़ाना नहीं आता. आप प्लीज इसे उड़ा देना और मेरी माँ तक पहुँचा देना. सब कहते हैं कि मरने के बाद लोग ऊपर आसमान में चले जाते हैं. माँ भी तो वहीँ होंगी ना. आप बस उन तक ये पतंग पहुँचा दो’ और यह कहकर वह पतंग मेरे हाथ में थमाकर दौड़ी-दौड़ी चली गयी. मैं हैरत से कुछ देर उसे देखती रही, फिर अचानक पतंग पर मेरी नज़र पड़ी. जिस पर बहुत कुछ लिखा था. 

अरे ! यह तो रेवती की लिखावट है. यह देखकर मैं उन शब्दों को पढ़ने लगी. ‘ माँ ! तू मुझे छोड़कर क्यों चली गयी ? माँ तेरी बहुत याद आती है. सुबह जब बापू मार-मार कर उठाता है चाय बनाने के लिए तब चाय के हर एक उबाल के नीचे बैठने के साथ तू बहुत याद आती है. जब सुबह-सुबह आसपास के बच्चे स्कूल ड्रेस पहनकर बैग लेकर पढ़ने जाते हैं तो उनके हर एक बढ़ते कदम के साथ तू बहुत याद आती है. माँ, बापू जो भी मैं बनाती हूँ सब खा जाता है. मुझे हमेशा सूखी-ठंडी रोटियाँ खानी पड़ती है. तब हर एक कौर के गले में चुभने के साथ तू बहुत याद आती है. रात को बापू जब शराब पीकर लौटता है तब डर के मारे मैं गुसलखाने में छिप जाती हूँ. तब भी नल से टपकती हर बूँद के साथ तू बहुत याद आती है. माँ तेरे बिना नींद नहीं आती. हर बदलती करवट के साथ तू बहुत याद आती है. माँ तू वापस आ जा ना. या फिर मुझे ही अपने पास बुला ले. तेरे बिना एक दिन भी काटना बहुत मुश्किल है. तू बस वापस आ जा माँ.’ 

और यह सब पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखों से आंसू बहने लगे. विश्वास नहीं हो रहा था यह 12-13 साल की उस मासूम बच्ची के शब्द थे, जो थोड़ी देर पहले मेरे सामने खड़ी थी. मैं दौड़कर बाहर गयी कि शायद रेवती बाहर ही हो. पर वह नज़र नहीं आई. तब मैं पतंग को लेकर छत पर गयी और जाने किस विश्वास में उसे उड़ाने लगी. देखते ही देखते पतंग दूर आसमान में पहुँच कर एक बिंदु की तरह चमकने लगी. डोर का आखिरी सिरा जो हाथ में था वह मैंने छोड़ दिया. कुछ देर पतंग को देखती रही और फिर बुझे मन के साथ नीचे आ गयी. 

सुबह अचानक रेवती के घर के पास भीड़ देखी. पता चला रेवती का शराबी पिता बाहर मरा पड़ा था. एक के बाद एक यह सब घटनाएँ मुझे बहुत बैचेन कर रही थी. थोड़ी देर बाद छत पर कपड़े लेने गयी तो देखा शाम को जो पतंग उड़ाई थी उसकी डोर पास ही सूख रहे मेरे लाल दुपट्टे में अटकी हुई थी और पतंग अभी भी वैसे ही उड़ रही थी. 

शायद यह रेवती की माँ या ईश्वर का संकेत था कि मुझे अब रेवती के लिए बहुत कुछ करना था. और यही सोचकर वह लाल दुपट्टा मैंने गले में डाला और रेवती के घर की ओर चल पड़ी. 

By Monika Jain ‘पंछी’ 

How is this hindi story relevant to Makar Sankranti? Feel free to share your views.

Sunday, January 4, 2015

Poem on Children Day in Hindi


Poem on Children Day in Hindi Language, Bal Diwas par Kavita, Kids, Childhood, Bachpan, 14th November, Chacha Jawaharlal Nehru Birthday, Children's Ghazal, Nazm, Short Poetry, Lines, Slogans, Rhyming Rhymes, Sms, Messages, Composition, Geet, Song, Lyrics, Quotes, Thoughts, Words, Nare, Proverbs, Sayings, Status, बचपन, बाल दिवस पर हिंदी कविता, नज़्म, गज़ल, शेर ओ शायरी, नारे, नारा, गीत, मुक्तक, स्लोगन

एक दौर था...

मायूस जिसके दर से कोई परिंदा नहीं लौटा
ख़ुद में जिंदादिली का वो मकां रखते थे हम
ख़्वाब आँखों में, होठों पे बागबां
एक दौर था मुट्ठी में आसमां रखते थे हम.

चहचहाते परिंदों से याराना था अपना 
मिट्टी के घरोंदों में आशियाना था अपना
होता था बुजुर्गों की बाहों का बिस्तर 
वो भी क्या खूबसूरत फसाना था अपना.

तब ज़िन्दगी कुछ इतनी संजीदा भी नहीं थी
हर कदम पे शौक से इम्तेहां रखते थे हम
किसी गिले का शिकन कभी चेहरे पे न रहा
एक दौर था मुट्ठी में आसमां रखते थे हम.

होता था नशा सा बेखौफ शैतानी में 
था अक्स जिंदगी का दरिया की रवानी में 
छोटी खुशियाँ समेटे वो लम्हें भी खूब थे 
जब डुबाते थे कश्ती को बारिश के पानी में.

तन्हा रात में वो शामें बहुत याद आती हैं
जब साथ हर कदम पे कारवां रखते थे हम
मासूमियत की थी वो कोरी दास्तां 
एक दौर था मुट्ठी में आसमां रखते थे हम.

By Malendra Kumar

Childhood is the blissful time of anyone’s life. Its the most joyful time. A time of no stress and no worries, A time full of innocence, A time without any responsibility and duty. The above poem is reflecting the sweet memories of childhood. On the occasion of childrens day we all wish to live those days again. Thank you ‘Malendra’ for sharing such a nostalgic poem about childhood memories.

How is this hindi poem on childrens day? Feel free to share your views.

Saturday, January 3, 2015

Poem on Clouds in Hindi


Poem on Clouds in Hindi Language, Bewafa Badal par Kavita, Disloyal Cloud, Megh, Sky, Rain, Unfaithful Love, Innocent River, Stream, Masoom Nadi, Current, Dhara, Lahar, Short Poetry, Rhyming Rhymes, Sher O Shayari, Muktak, Ghazal, Nazm, Composition, Lines, Slogans, Geet, Song, Lyrics, Quotes, Thoughts, Sayings, Proverbs, Composition, Sms, Messages, Words, Nare, Status, मेघ, घन, नदी, धारा, लहर, बेवफा बादल पर हिंदी कविता, नज़्म, गज़ल, शेर ओ शायरी, नारे, नारा, गीत, मुक्तक, स्लोगन

एक बेवफा बादल

वो बादल बनकर आया और बोला 
‘प्रेम से भरा हूँ मैं 
तुझ पर बरसना चाहता हूँ
बनकर प्रेम की धारा 
तुझ संग बहना चाहता हूँ.’ 

मेरी ना 
और उसकी गुजारिश चलती रही 
उसके प्रेम को सच मान 
धीरे-धीरे मैं पिघलती गयी. 

एक मासूम नदी सी मैं, 
उसके प्रेम की फुहारों को समेट
चल दी उसके संग. 
जहाँ-जहाँ उसने मुझे मोड़ा 
मैं बहती गयी उसके प्रेम और विश्वास में रंग.

राह में मिलती रही उसे 
एक नहीं हजारों नदियाँ 
हर नदी से उसने की 
बिल्कुल वैसी ही 
प्रेम की मीठी-मीठी बतिया. 

ना जाने कितनी नदियों के संग बहकर 
वह फिर मेरे पास आता रहा 
हर नदी ने उसे ठुकराया 
और वह बस मुझे बहलाता रहा. 

मेरा कुछ कहना 
उसके नजरिये में मेरा अविश्वास था 
क्या सही क्या गलत मैं समझ ना पायी 
पर उसकी कथनी और करनी में बड़ा विरोधाभास था. 

जरा से सूरज के ताप से 
वह भाप बन उड़ जाता था 
फिर किसी और नदी की तलाश कर 
वह उस पर भी बरसना चाहता था. 

ना मिलता जब उसे कहीं भी 
वैसा प्यार और समर्पण 
तो मेरी भावनाओं को छल कहता 
तुझको ही है मेरा सर्वस्व अर्पण. 

मेरी ना अब ना ही है 
उस बादल को मंजूर नहीं 
बार-बार उड़ कर आना 
ना छूटा उसका फितूर कहीं. 

पर ये मासूम नदी 
अब पत्थरों से टकराकर 
मजबूत बन चुकी है. 
अपनी दिशा खुद तय करना 
अब ये बखूबी सीख चुकी है. 

By Monika Jain ‘पंछी’ 

How is poem about a ‘bewafa badal’? Feel free to share your views. 


Friday, January 2, 2015

Hope Quotes in Hindi


Hope Quotes in Hindi Language, Aasha par Vichar, Asha, Positive, Faith, Belief, Vishvas, Bharosa, Expectation, Expectance, Quotations, Thoughts, Sayings, Proverbs, Lines, Slogans, Sms, Messages, Words, Nare, Status, Statement, Anmol Vachan, Suvichar, Adarsh Vakya, Suktiyan, Shiksha, Updesh, आशा, उम्मीद, अपेक्षा, विश्वास, भरोसा, हिंदी उद्धरण, शिक्षा, उपदेश, विचार, सुविचार, अनमोल वचन, आदर्श वाक्य, नारे, नारा, स्लोगन 

Hope Quotes
  • आशा को जीवन का लंगर कहा है. उसका सहारा छोड़ने से आदमी भवसागर में बह जाता है, पर बिना हाथ-पैर हिलाए केवल आशा करने से कुछ नहीं सरता ~ हकीम लुकमान / Hakeem Luqman
  • अभिलाषा तभी फलोत्पादक हो सकती है, जबकि वह दृढ निश्चय में परिणित कर दी जाए ~ स्वेट मार्डेन / Swet Morden
  • मैं आशावादी हूँ, इसलिए नहीं कि मैं इस बात का कोई सबूत दे सकता हूँ कि सच्चाई ही फलेगी, बल्कि इसलिए कि मेरा इस बात में अदम्य विश्वास है कि अंततः सच्चाई ही फलती है. हमारी प्रेरणा केवल हमारे इसी विश्वास से पैदा हो सकती है कि अंततः सच्चाई की ही जीत होगी ~ महात्मा गाँधी / Mahatma Gandhi
  • जिसे कुछ आशा है, वह एक तरह से सोचता है और जिसे कोई आशा नहीं होती, वह कुछ और ही प्रकार से सोचता है. पुर्वोवत चिंता में सजीवता है, उत्कंठा है, लेकिन आशाहीन को न तो सुख है, न दुःख है फिर भी तृप्ति है ~ शरतचंद्र चट्टोपाध्याय / Sharat Chandra Chattopadhyay
  • दु:समय में जब मनुष्य की आशा और निराशा का कोई किनारा नहीं दिखाई देता, तब दुर्बल मन डर के मारे आशा की दिशा को ही कसकर पकड़े रहता है ~ शरतचंद्र चट्टोपाध्याय / Sharat Chandra Chattopadhyay
  • मुझे नहीं मालूम कि आशावादी ठीक है या निराशावादी, लेकिन आशावादी कुछ ना कुछ तो जरुर कर पायेंगे ~ क्रेग वाटर 
  • यह कहना कठिन होता है कि असंभव क्या है. क्योंकि विगत का स्वप्न, आज की आशा और कल की वास्तविकता होती है ~ रोबर्ट एच गोडार्ड / Robert H Goddard 
How are these quotes about hope? Feel free to share your views.