Saturday, August 29, 2015

Telepathy-Intuition in Hindi

Telepathy Communication in Hindi. Develop Intuition, Intuitive Skills, Psychic Telepathic Power, Meditation Thoughts Reading, Nonviolence, Subconscious Mind Message Transmission. टेलिपैथी अंतर्ज्ञान.

टेलिपैथी और अंतर्ज्ञान पर मेरे अनुभव 

अहिंसा, सजगता और ध्यान के रास्ते पर जब कोई आगे बढ़ता है तो जीवन के कई रहस्य प्रकट होने लगते हैं. उसी में से एक रहस्य है कि विचार भी हमारे नहीं होते, और किसी चीज की मालकियत की बात तो छोड़ ही दें. वास्तिवकता यही है कि विचार भी हमारी प्रॉपर्टी नहीं. महावीर के अनुसार विचारों पर अपना हक़ जमाना भी हिंसा का एक अत्यंत सूक्ष्म रूप है. हालाँकि अहिंसा के इस स्तर तक पहुँच पाना दिन में तारे देखने जैसा है. आज के प्रोफेशनल युग मे यह संभव भी नहीं. लेकिन बीते दिनों जब से नोटिस करना शुरू किया है जो विचित्र अनुभव हुए हैं उनके बारे में आप सभी को बताना चाहती हूँ.
 
परसों एक ख़याल दिमाग में आया. सोचा इस पर कोई बड़ी पोस्ट लिखकर फिर सीधे ब्लॉग पर ही डालूंगी इसलिए फेसबुक पर कुछ लिखना निरस्त कर दिया. पर अगले दो दिन देखा कि कई लोगों ने उसी विचार से सम्बन्धित पोस्ट डाली है, जबकि वह कोई करंट अफेयर भी नहीं. फिर कुछ देर बाद एक किताब लेकर पढ़ने बैठी तो उसमें भी आगे पढ़ते-पढ़ते उसी से सम्बन्धित विचार पढ़ने में आये. और सबसे ताज्जुब की बात कि अनजाने में मैं खुद 2-3 साल से उस विचार को फॉलो कर रही हूँ. उस विचार पर तो बाद में लिखूंगी. लेकिन यहाँ यह बताना जरुरी है कि ऐसा इत्तेफाक सिर्फ एक बार नहीं बल्कि आजकल कई बार होता है. कई बार तो ज्यों की त्यों पक्तियां जो कुछ देर पहले सोची हो किसी और की पोस्ट में या बातचीत में निकल आती है.
 
इसके अलावा एक और जो विचित्र घटना मेरे साथ होती है. फेसबुक पर कई बार जब किसी की पोस्ट या कमेंट पढ़ रही होती हूँ, तो मेरा पढ़ना कम्पलीट करने से पहले ही उसी व्यक्ति का लाइक, कमेंट या कभी-कभी मेसेज भी इनबॉक्स में आ जाता है. ऐसा भी एक या दो बार नहीं, जाने कितनी बार हुआ है.

एक दिन सुबह छत पर खड़ी थी. मम्मा सड़क पर मोर्निंग वाक कर रही थी. तभी मेरे दिमाग में जाने क्यों ख़याल आया कि पड़ोस वाली आंटी मम्मा को अभी रास्ते में मिल सकती है और कुछ ही देर बाद ऐसा हुआ भी.

ऐसे कई तरह के अनुभव कई बार होते हैं, जिनमें से सब याद भी नहीं रहे और सबको शब्द दे पाना संभव भी नहीं. पर हम सब लोगों के जीवन में ये सब अवचेतन मन के द्वारा संचालित होते हैं. जो वास्तव में निपुणता हासिल कर लेते हैं वे चेतन अवस्था में भी ऐसे कम्युनिकेशन या पूर्वाभास कर सकते हैं.
 
वैज्ञानिक भी टेलीपैथी से जुड़ी कई सारी रिसर्च कर रहे हैं और आने वाले समय में संभव है किसी के भी दिमाग में कोई भी विचार आरोपित किया जा सकता है. लेकिन यहाँ यह देखना जरुरी है कि खुद महावीर ने ‘धारणा’ शब्द के माध्यम से इस बारे में यह कहा है कि कभी भी कोई बुरा विचार अपने मन में मत रखो क्योंकि आप कुछ बुरा करे ना करे लेकिन आपके आसपास कोई भी व्यक्ति आपके उस बुरे विचार को पकड़ सकता है और वह बुरा काम कर सकता है.
 
जानवरों में यह टेलीपैथी और अंतर्ज्ञान और भी ज्यादा विकसित होता है क्योंकि वे प्रकृति के निकट होते हैं. उनका जीवन सरल और कृत्रिमता से दूर होता है. उनकी हिंसा भी सिर्फ अपनी आत्मसुरक्षा और खाने तक सीमित होती है लेकिन हम मानवों का जीवन तो हर पल हिंसा ही हिंसा से भरा है फिर चाहे वह मन से हो, वचन से या कर्मों से.
 
निष्कर्ष सिर्फ इतना ही है कि जितना हम प्रकृति, सरलता, अहिंसा, मानवीयता, सजगता, ध्यान आदि से दूर रहेंगे हम जीवन के रहस्यों से उतने ही अनभिज्ञ रहेंगे. आत्मा-परमात्मा की बातें बेमानी नहीं है. बस जरुरी है इनके नाम पर व्यापार करने वाले लोगों से दूर रहने की. और वास्तविक धर्म सिर्फ और सिर्फ भीतर से जुड़ा है. बाहर की सारी चीजें कर्म या कांड हैं. 


Tuesday, August 25, 2015

Inspirational Poem in Hindi

 
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आत्मविश्वास
 
जीवन के घनघोर अंधेरों में 
हमें जलाना होगा अपने ही भीतर एक दीया 
और बनना होगा खुद अपना ही प्रकाश 
क्योंकि दूर आकाश में झिलमिलाता वह सितारा 
जो खुद निर्भर है अपनी रौशनी के लिए सूरज पर 
वह कैसे बन सकता है तुम्हारा विश्वास.
 
काँटों की राह पर चलते हुए 
हमें खिलाना होगा अपने ही भीतर एक फूल 
क्योंकि तुम्हारी राह में फूल बिछाने को आतुर तुम्हारा प्रेम 
बन सकता है कभी भी तुम्हारे लिए एक शूल.
 
तूफानों से टकराकर जब पाना हो साहिल 
तो बन जाना तुम खुद अपनी ही नाव 
क्योंकि वह नाविक 
जो सात समन्दर पार ले जाने के करता था वादे 
वह बीच समंदर तुम्हें डुबोकर, कर सकता है अपना ही बचाव.
 
मैं यह नहीं कहती 
भर लो अपने मन में दूसरों के प्रति इतना अविश्वास 
मैं बस चाहती हूँ जाग जाए हम सब का आत्मविश्वास 
क्योंकि यही एक आस है जो रहेगी सदा ही साथ 
बाकी तो चलते-चलते छूटते जायेंगे, सबके ही हाथ.

By Monika Jain ‘पंछी’
 
How is this inspirational poem about self confidence?

Monday, August 17, 2015

Jainism Santhara Sallekhana in Hindi

 
Santhara Ritual in Hindi. Sallekhana Prayopavesa, Voluntary Sanyasana Samadhi Marana, Jainism Fasting to Death, Jain Religion Fast, Holy Salekhana, Upwas. संथारा, सल्लेखना, मृत्यु तक उपवास, समाधिकरण.
 
संथारा / सल्लेखना
 
हम सभी को बहुत जल्दबाजी मची रहती है चीजों को सही और गलत के तराजू में तौलने की, पर काश! काश सब कुछ इतना आसान होता. अगर सब कुछ इतना ही आसान होता तो तुरंत दुनिया के सारे कामों को सही और गलत के एक्सट्रीम्स पर श्रेणीबद्ध कर दिया जाता और फिर कोई विवाद ही नहीं रहता. पर चीजें सामान्तया द्वैत नहीं होती. अक्सर सही और गलत के बीच कहीं होती है. और फिर जितने भी दुनिया में प्राणी है उतने ही सही और गलत अलग से अस्तित्व में आ जाते हैं.
 
इन दिनों ओशो की 'महावीर वाणी' पढ़ रही हूँ. कल ही 'संथारे' पर रोक की ख़बर सुनी और शाम में ही यह किताब पढ़ते समय 'संथारे' का थोड़ा सा जिक्र आया. सबसे महत्वपूर्ण जो चीज होती है वह होते हैं भाव और दृष्टिकोण. 'आत्महत्या' को हम सामान्यता जीजिविषा का खत्म होना मानते हैं, पर वास्तविकता इससे परे है. आत्महत्या जीजिविषा का खत्म होना नहीं बल्कि कुछ विशेष शर्तों के साथ गहरी जीजिविषा का होना है, जिनके पूरा ना होने पर हम मृत्यु का मार्ग चुन लेते हैं. और यह निर्णय भी बस एक क्षण का आवेश होता है. अगर उस क्षण किसी ने रोक लिया होता तो आत्महत्या भी कोई नहीं करता. बल्कि आत्महत्या की तैयारी करते समय एक सांप आ जाए तब भी मरने को इच्छुक व्यक्ति भाग खड़ा होगा. क्योंकि गहरे में कहीं जीने की इच्छा प्रबल है. मतलब जहाँ-जहाँ मरने की इच्छा है वहां जीने की इच्छा निश्चित रूप से होगी, बस वह कंडीशनल होगी.
 
अब आते हैं 'संथारे' पर. अपने शुद्ध रूप में संथारा वह भाव है जहाँ ना जीने की इच्छा होती है और ना ही मरने की. इसके मूल में भी अहिंसा ही है. क्योंकि हमारी जीने की सारी इच्छा हिंसा पर खड़ी है. हर एक जीवन किसी ना किसी की मृत्यु पर ही संभव है. ऐसे में संथारा अपने आदर्श रूप में अहिंसा के उच्चतम भाव के अलावा और कुछ नहीं है. पल भर में डर कर खुद को खत्म कर लेना बहुत आसान काम है. लेकिन अन्न, जल का त्याग करते हुए 20-30-60-90 दिनों तक जीना किसी कायर या मृत्यु की इच्छा रखने वाले का काम नहीं हो सकता, वह भी तब जबकि हम जानते हैं कि हमारा मन क्षण-क्षण बदलता रहता है.

इसके अलावा जैन धर्म मुक्ति के लिए कर्मों की निर्जरा पर विश्वास करता है. जिसका मुख्य आधार अहिंसा है. अपने अंतिम समय में नए पाप कर्मों के बंध को रोकने के लिए संथारा लिया जाता है. ताकि अपनी सेवा के लिए किसी को कष्ट ना पहुँचाया जाए और आहार-विहार आदि से होने वाली हिंसा से भी बचा जा सके. ऐसे में संथारा आत्महत्या और इच्छामृत्यु दोनों से ही बिल्कुल अलग है.
 
कल किसी ने कहा कि संथारा एक प्राकृतिक मृत्यु नहीं है. संथारे का समर्थन या विरोध बाद में. उससे पहले एक सवाल मेरे दिमाग में घूम रहा है. हम जिस परिवेश में रह रहे हैं उसमें कौनसी मृत्यु प्राकृतिक है? एक शराबी जो रोज शराब पीता है उसकी? एक स्मोकर जो रोज सिगरेट पीता है उसकी? विकास के नाम पर जो करोड़ों टन धुआँ वायुमंडल में छोड़ा जाता है उसमें सांस लेने वालों की? कीटनाशकों और रसायनों के इंजेक्शन का प्रयोग करके जो पेड़ पौधे और पशु-पक्षी हम जबरन पैदा करवा रहे हैं उन्हें खाने वालों की? यहाँ तक की रोज चाय, दूध और कॉफ़ी में घोलकर पी जाने वाली शक्कर को भी धीमा जहर माना जाता है. तो बात ऐसी है कि प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, होश में हो या बेहोशी में हम सभी आत्महत्या और परहत्या करने के अलावा रोज कौनसा काम कर रहे हैं?
 
और कल्पना कीजिये कि अगर पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के भी क़ानून लागू होने शुरू हो जाएँ तो आत्महत्या तो बहुत बाद की बात है, पहले तो परहत्या के मामलों की गिनती ही नामुमकिन हो जायेगी. बात गोलमोल घुमाने वाली नहीं है. बात ऐसी है कि वास्तव में ही सब कुछ गोलमोल ही है. तो कम से कम जो इस गोलमोल से बिना किसी को कष्ट पहुंचाए, बिना कोई गलत सन्देश दिए मुक्त होना चाहते हैं, उनके बारे में सोच समझकर कुछ निर्णय लेना ही उचित होगा.
 
By Monika Jain ‘पंछी’

Thursday, August 13, 2015

Prem Kahani in Hindi


Adhuri Prem Kahani in Hindi. One Sided Real True Love Story. Broken Heart, Emotional Stories, Touching, Sad Tales, Dard Bhari Kahaniya, Mohabbat, Ishq, Pyar. अधूरी प्रेम कहानी, इश्क, प्यार, मोहब्बत.

Prem Kahani in Hindi
और मैंने मांग लिया तारों से उनका न टूटना

तो आखिर आज आ ही गया तुम्हारा जन्मदिन! हर साल कितनी बेसब्री से इंतजार रहता है इस दिन का। और हर बार लगता है जैसे हर साल आने वाला यह दिन जाने कितने सालों बाद आया है। तुम्हें तो पता भी नहीं सालों पहले तुम्हारा जन्मदिन जानने के लिए घंटों कंप्यूटर के सामने बैठकर कितनी मशक्कत की थी मैंने। तुमने तो सारी दुनिया से इसे छिपाने के प्रबंध कर रखे थे। पर मैं भी हार कहाँ मानने वाली थी। तुमसे और तुम्हारे दोस्तों से बिना कुछ पूछे तुम्हारा जन्मदिन जो जानना था। और आखिरकार तीन-चार घंटों की मेहनत रंग ले ही आई। बस तब से यह दिन मेरे जीवन का सबसे खास दिन बन गया है। कभी-कभी इस जुनून और दीवानगी के बारे में सोचती हूँ तो बरबस हँसी छूट जाती है और साथ ही हो जाती है ये आँखें भी नम। सोचती हूँ इतनी शिद्दत से ईश्वर को ढूंढा होता तो शायद वे भी मिल जाते। पर देखो न तुम ना मिले।

कितने पागल से दिन थे वे। तुम तो मुझसे कोसों दूर थे पर सिर्फ तुम्हारी एक झलक पाने के लिए दिन में बीसों बार अपना फेसबुक अकाउंट लॉग इन करती और तुम्हारे स्टेटस! वो तो मेरे लिए जैसे रोज की गीता बाँचना था। कभी कई दिनों तक तुम्हारी कोई हलचल ना दिखाई देती तो मैं परेशान हो उठती। इंतजार के वे पल बड़े भारी लगते। रह-रहकर ख़याल आ जाता सब ठीक तो है न? पर तुमसे पूछने की हिम्मत कभी न जुटा पाती।

फिर एक दिन तुमने ही बात करना शुरू किया और मैं पगली, ख़ुशी के मारे हूँ-हाँ से ज्यादा कुछ बोल ही न पायी। धीरे-धीरे हम दोस्त बने और फिर दोस्ती से प्यार का सफ़र...उस वक्त ऐसा लगता था जैसे सारी दुनिया की खुशियाँ मेरे दामन में आकर सिमट गयी हो।

फिर एक दिन जाने क्या हुआ। अचानक तुमने कहा कि यह रिश्ता तोड़ना होगा हमें। कोई वजह भी कहाँ बताई तुमने और बिना कुछ कहे चले गए हमेशा के लिए। पर मैंने कहा था न टूटा हुआ कुछ भी अच्छा नहीं लगता मुझे। बस इसलिए ही मैंने नहीं तोड़ा यह रिश्ता आज तक। प्यार के उस अंकुरित बीज को देती रही अपनी वफ़ा का खाद और पानी...और कब यह एक विशाल वृक्ष बन गया पता भी न चला। तुम्हारी अनुपस्थिति में भी तुम्हारा अस्तित्व मेरे जीवन में इतना गहरा होता चला गया कि अब कोई मुझमें मुझे तलाशेगा तब भी सिर्फ तुम्हें ही पायेगा।

लड्डू बहुत पसंद हैं न तुम्हें? हर साल की तरह इस साल भी वही बनाये हैं। तुम्हें याद है? पहली बार जब तुमने मेरे हाथों से बने लड्डू खाए थे तो मेरा नाम ही लड्डू रख दिया था। अब तो सालों गुजर गए इन कानों ने अपने लिए यह नाम नहीं सुना। वैसे भी तुम्हारे सिवा कोई लड्डू कहता भी तो अच्छा कहाँ लगता।

तुम कहाँ हो, कैसे हो, क्या कर रहे हो कुछ भी नहीं पता। मैं तुम्हारी स्मृतियों में हूँ या नहीं यह भी नहीं जानती। तुम तक कुछ पहुँचाऊ तो भी कैसे? यूँ तो कभी मंदिर नहीं जाती पर यह तुम्हारा ही विश्वास था न कि दुआएँ और प्रार्थनाएँ दुनिया के किसी भी कोने में पहुँच जाती है। बस इसलिए हर साल इस दिन लड्डू लेकर पहुँच जाती हूँ मंदिर और मांग लेती हूँ ईश्वर से तुम्हारे जीवन में लड्डुओं की सी मिठास।

अक्सर सखियाँ हँसती है मुझ पर। कहती हैं, ‘कंगना! पागल लड़की! कब तक उसके लिए दुआएँ मांगती रहेगी जिसे तेरी जरा भी फिक्र नहीं। जिसने इतने सालों में एक बार भी तेरी खोज-खबर लेने की कोशिश नहीं की कि तू कैसी है, किस हाल में है। कभी भगवान से अपने लिए भी कुछ मांग लिया कर।’ मैं बस मुस्कुरा कर रह जाती हूँ। अब उन्हें कैसे बताऊँ कि मेरे भीतर मेरा कुछ रह ही कहाँ गया है।

अक्सर तारों से भरी रातों में चाँद को निहारते हुए जब अचानक कोई तारा टूट जाता था तो तुम आँखें बंद कर मांग लेते थे हमेशा के लिए मुझे और मैं बस अपलक तुम्हें देखती रह जाती थी। आज भी तारों से भरी वैसी ही रात है। सखियों की बात याद है कि कभी कुछ मांग लिया कर अपने भी लिए। सोच रही हूँ जैसे ही कोई तारा टूटेगा मांग लूँगी मैं भी तुम्हें। पर यह क्या? तारा टूटा और मैंने मांग लिया तारों से उनका ना टूटना। टूटा हुआ कुछ भी अच्छा नहीं लगता न।


By Monika Jain ‘पंछी’ 


Sunday, August 9, 2015

Poem on Sparrow Bird in Hindi


Poem on Sparrow Bird in Hindi for Kids. Chidiya Bachao Abhiyan par Kavita, Save Gauraiya Birds Campaign Rhymes, Slogans, Conservation, Lines, Poetry, Information. चिड़िया पर कविता, गौरैया बचाओ अभियान.


मेरी चिड़िया मुझको ला दो

मैं जब छोटी गुड़िया थी
अंगना में आती चिड़िया थी.

चुग्गा चुगने जब वो आती
उसे देखकर मैं मुस्काती.

फुदक-फुदक वह गाना गाती
मैं उसको वह मुझे नचाती.

अब जब मैं हो गयी सयानी
क्यों नहीं आती चिड़िया रानी?

सूना हो गया अंगना आज
ना देती चिड़िया आवाज़.

कहाँ गयी हो चिड़िया रानी
चुग लो दाना, पी लो पानी.

चिड़िया के रैन बसेरों को
मानव ने काटा पेड़ों को.

घर ना छीनो चिड़िया का
बचपन ना छीनो गुड़िया का.

फिर से तुम कुछ पेड़ लगा दो
मेरी चिड़िया मुझको ला दो.

By Monika Jain 'पंछी'

How is this hindi poem about sparrow? 
 
 

Poem on Birds in Hindi



Poem on Save Birds in Hindi for Kids. If I were a Bird Poetry, I wish I was a Birdie Rhymes, Pakshi par Kavita, Panchi Flying Shayari, Panchhi Slogans, Lines, Quotes. पंछी कविता, पक्षी पर कविताएं.

काश मैं पंछी होती

काश मैं पंछी होती
मेरी हर ख्वाहिश पूरी होती
उन्मुक्त गगन को छूने की
चाह मेरी पूरी होती
काश मैं पंछी होती.

जाति, धर्म, समाज की
दीवार कोई ना मैं ढ़ोती
ना सरहद की सीमाओं में
बंधी-बंधी मैं रोती
काश मैं पंछी होती.

मंदिर, मस्ज़िद, गिरिजाघर
हर दीवार मेरा डेरा होती
बन हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
पहचान मेरी मैं ना खोती
काश मैं पंछी होती.

ना दहेज़ की ज्वाला में
मुझको झुलसाया जाता
ना बाल विवाह की बलिवेदी पर
मुझको सुलगाया जाता
काश मैं पंछी होती.

भ्रष्टाचार के दलदल में
मैं ना घसीटी जाती
आतंकवादी साये में
नित रोज ना मारी जाती
काश मैं पंछी होती.

ना वोट-वोट करते नेता
मुझको बहलाने आते
और जीत का ताज पहन अपने
वादे सारे भूल ही जाते
काश मैं पंछी होती.

ना धन के लालच में आकर
अपनों का खून बहाया जाता
ना रिश्वत का खंजर मुझ पर
बार-बार चलाया जाता
काश मैं पंछी होती.

ना अमीर की कोठी होती
ना गरीब की कुटिया
सबसे अलग, सबसे ज़ुदा
होती मेरी दुनिया
काश मैं पंछी होती.

By Monika Jain 'पंछी'

How is this hindi poem about birds?

Thursday, August 6, 2015

Poem on Unity in Hindi

 
Hindi Poem on Unity in Diversity for Kids. Anekta Mein Ekta Kavita. Brotherhood Slogans, National Integration Shayari, Communal Harmony, Togetherness is Strength. विविधता अनेकता में एकता पर कविता.
 
छोड़ दो सारे भेद
 
धर्म को बाँटने वाले इंसान बता तेरी रज़ा क्या है?
तूने ईश्वर को भी ना छोड़ा, बता तेरी सज़ा क्या है?
 
जातिवाद के नाम पर क्यों फैलाते हो आग 
क्षेत्रीयता का क्यों अलापते हो राग
छोड़ दो इंसानियत का खून करना
मानवता को तो रहने दो बेदाग़.
 
राम, रहीम, यीशु ना जाने कितने दिए नाम
परिंदों ने क्यों नहीं बनाया अपना कोई भगवान
क्यों वृक्षों के पत्ते सबको करते हैं सलाम
सबको करने देते अपनी छाया में विश्राम.
 
भूख एक, प्यास एक, बहती हवा का अहसास एक
जीवन को रौशन करते सूर्य का प्रकाश एक
फिर कौनसी मजबूरियाँ, क्यों दिलों की दूरियाँ
जब हर दिल में धड़कने वाली धड़कनों की आवाज़ एक.
 
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में क्यों करते ईश्वर को कैद
इंसानियत के दामन में क्यों करते हो इतने छेद
मानवता है धर्म हमारा, है मनुष्यता जाति 
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई छोड़ दो सारे भेद.
 
By Monika Jain 'पंछी'
 
How is this hindi poem about unity?


Wednesday, August 5, 2015

Parrot Story in Hindi


Story of Parrot in Hindi for Kids, Children. Mithu, Tota, Tote ki Kahani. Animals and Birds Cruelty. Animal Bird Abuse Tales, Parrots Short Moral Stories, Kahaniya, Kathayen. तोता, तोते की कहानी.
 
मुझे अच्छी लगती है उनकी आज़ादी 

मुझे पशु-पक्षियों को हाथ में पकड़कर घुमाना या उन्हें पिंजरे में रखकर दिल बहलाना जरा भी नहीं पसंद. पर हाँ, मुझे अच्छा लगता है आकाश में ऊंचाइयों पर उड़ते हुए पंछियों को देखना. मुझे अच्छा लगता है जब अचानक कोई भेड़ या बकरियों का झुण्ड घर के बाहर से गुजरता है और उनमें से कुछ शरारती मेमने फुदककर कतार से बाहर निकल इधर-उधर दौड़ने लगते हैं. मुझे अच्छा लगता है जब छत पर सुबह रखा दाना और पानी अगली सुबह तक अनजाने दोस्तों द्वारा पूरा फिनिश कर दिया जाता है. मुझे अच्छा लगता है घर की सीढ़ियों पर बैठकर कुत्ते या उसके पिल्ले को रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े करके खिलाना. कई बार जब रोटी एक हो और कैंडिडेट्स ज्यादा तो छुपके से सभी को इक्वल-इक्वल शेयर करके खिला देना मुझे अच्छा लगता है. तितलियों, तोते या किसी भी पक्षी को पकड़ने के इरादे से आये विलेन को देखकर उन्हें फुर्र से उड़ा देना मुझे अच्छा लगता है. मुझे अच्छी लगती है उनकी आज़ादी. बहुत अच्छी.
 
पर कुछ लोगों को जाने क्यों यह अच्छा नहीं लगता. बात कुछ सालों पहले की है. एक तोता शायद कहीं से किसी पिंजरे से उड़कर हमारे घर पर आ गया था. उसके थोड़े से कटे हुए पंखों और उसके हावभाव से यही लग रहा था कि वह एक पालतू तोता है. बिना किसी जान पहचान के भी खाना खाते समय थाली पर या मुझ पर आकर बैठ जाता. उसे तो डर नहीं लग रहा था पर उसके इतने अपनेपन से मैं डर जाती थी :p हालाँकि निश्चिंत थी कि जैसे आया है वैसे ही चला जाएगा. पर एक दिन 2-3 घंटे के लिए बाहर क्या गयी, कुछ बच्चों को उस तोते की भनक लग गयी और मेरी अनुपस्थिति में वे उसे पकड़ने को आ गए. वह उड़कर भाग गया तो पूरे 2 घंटे उन बच्चों ने उसे पकड़ने के लिए एक पेड़ से दूसरे पेड़, दूसरे से तीसरे पर दौड़ाया, उस पर पत्थर फेंके सो अलग. उड़ने में वह शायद बहुत ज्यादा माहिर नहीं था इसलिए उनके पकड़ में आ गया और सामने रहने वाले पड़ोसी के बच्चों ने उसे पिंजरे में डाल दिया.
 
मेरे घर आने तक यह सब काण्ड हो चुका था. जब मुझे यह सब पता चला तो बहुत दुःख हुआ और बहुत गुस्सा भी आया. पता नहीं मैंने सही किया या नहीं, पर मैंने उस बच्चे से पिंजरे में पकड़ा तोता अपने घर पर दिखाने को लाने को कहा और उसे उस तोते को पिंजरे से बाहर निकालकर वही छोड़कर जाने के लिए मजबूर कर दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि पड़ोसी का मुंह हमेशा के लिए फूल गया. उस पर उनका तर्क कि बच्चों ने 2 घंटे तक इतनी मेहनत की इसे पकड़ने की. पर इससे भी बुरी जो चीज हुई वह थी उस तोते के दिमाग में भयंकर वाले डर का बैठ जाना जो बच्चों ने उसके पीछे पड़-पड़कर, पत्थर फेंक-फेंक कर उसके दिल और दिमाग में बैठा दिया था. उस दिन के बाद तोता बस कमरे में एक जगह बैठ गया और कभी अपनी जगह से हिला तक नहीं. कुछ खाने को दिया जाता तो नहीं खाता. किसी की भी आहट होती या पड़ोस के वही बच्चे उसे देखने के लिए कभी आ जाते तो वह बहुत बुरी तरह से सहम जाता. 1-2 दिन ऐसे ही निकल गए.
 
मैंने बहुत कोशिश की उसे सहज माहौल देने की पर फिर वह तोता मैंने कभी नहीं देखा जो बिना किसी डर के खाने की थाली में आ बैठता था, जो पूरे दिन घर में इधर से उधर उड़ता फिरता था. हाँ आखिरी दिन वह कमरे से बाहर खुले चोक में आया था पर फिर पता नहीं कब वह उड़ कर घर से बाहर चला गया. जिन्दा रहा होगा या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन मुझे यही लगता है कि किसी के मनोरंजन के लिए कैदी बनने से कई बेहतर होगी उसके लिए उसकी आज़ादी वाली मौत.
 
By Monika Jain ‘पंछी’

Sunday, August 2, 2015

Poem on Hindi Diwas in Hindi


Poem on Hindi Diwas in Hindi for Kids. Vishwa Matri Bhasha Divas par Kavita, Rashtrabhasha Day, Pakhwara, 14 September Poetry, Slogans, Lines, Quotes, Information, Sms. हिंदी भाषा दिवस पर कविता, नारे.

जन-जन तक हिंदी पहुँचा दूँ
 
कल रात हिंदी को 
मैंने सपने में देखा 
उसके मुखमंडल पर छायी थी 
गहरी उदासी की रेखा.
 
मैंने पूछा हिंदी से
इतनी गुमसुम हो कैसे?
अब तो हिंदी दिवस है आना
सम्मान तुम्हे सब से है पाना.
 
हिंदी बोली यही गिला है
वर्ष का इक दिन मुझे मिला है
अपने देश में मैं हूँ पराई
ऐसा मान न चाहूँ भाई.
 
मेरे बच्चे मुझे न जाने
लोहा अंग्रेजी का माने
सीखे लोग यहाँ जापानी
पर मैं हूँ बिल्कुल अनजानी.
 
हिंदी की ये बात सुनी जब
ग्लानि से भर उठी मैं तब
सोचा माँ की पीर बंटा दूँ
जन-जन तक हिंदी पहुँचा दूँ.
 
मोनिका जैन 'पंछी'
 
How is this poem about hindi diwas? 

Saturday, August 1, 2015

Story on Female Foeticide in Hindi


Story on Female Foeticide in Hindi. Stop Daughters Infanticide, Save Girl Child, Kanya Bhrun Hatya par Kahani, Women, Beti Bachao Abhiyan, Gender Selective Abortion. कन्या भ्रूण हत्या पर कहानी.

कहानी : वंशिका

Story on Female Foeticide in Hindi

(ललकार टुडे में प्रकाशित)  

‘वंशिका ! अच्छा नाम है ना ?’ अपनी मासूम सी बच्ची जिसने आज ही जन्म लिया था उसे अपने हाथों में उठा उसका माथा चूमते हुए दामिनी ने रश्मि से कहा.

कहते हैं जब एक औरत माँ बनती है तो उसका दूसरा जन्म होता है. वंशिका की माँ के रूप में तो दामिनी का दूसरा जन्म था ही साथ ही कुछ समय से उसकी दुनिया भी बदल चुकी थी.

अपने पति, सास-ससुर सभी को छोड़कर कुछ महीने पहले ही वह इस नए शहर में आकर बसी थी, सिर्फ और सिर्फ अपनी बेटी के लिए.

कितनी खुश थी वह जिस दिन उसे डॉक्टर से पता चला कि वह माँ बनने वाली है. ना जाने कितने सपने संजोये थे उसने अपनी पहली संतान को लेकर. पर जब उसे यह पता चला कि उसके पति और सास-ससुर चाहते हैं कि पहली संतान लड़का ही होनी चाहिए तो उसका मन एक अनजाने से भय से आतंकित हो गया.

घर वालों के दबाव में आकर उसे अपने गर्भ की जांच करानी ही पड़ी और जब उसे पता चला कि उसके गर्भ में एक लड़की पल रही है तो उसे उसके सारे सपने बिखरते नज़र आये.

उस पर बार-बार बच्चे को गिराने का दबाव डाला जाने लगा. पर इस कुकृत्य के लिए दामिनी बिल्कुल भी तैयार नहीं थी. एक नन्हीं सी कली जो अभी खिली भी नहीं, जिसने दुनिया देखी भी नहीं और जो उसके शरीर का एक हिस्सा थी उसे वह अपने से कैसे अलग कर सकती थी ?

घर में रोज कलह होने लगी. उसने अपने पति अनिल और सास-ससुर को समझाने की बहुत कोशिश की पर उन पर कोई असर ना पड़ा और उन्होंने अपना फैसला सुना दिया, ‘तुम्हें घर और बच्ची दोनों में से किसी एक को चुनना होगा. अगर तुम्हें इस घर में रहना है तो बच्चा गिरवाना होगा वरना यह घर छोड़कर जाना होगा.’

दामिनी के पैरों तले जमीन खिसक गयी. दामिनी के माता-पिता नहीं थे. मायके में बस उसके दो बड़े भाई और उनके बीवी-बच्चे थे. उसने अपने मायके में बात की तो वहां से भी यही सलाह मिली, ‘जैसा ससुराल वाले कहते हैं वैसा ही कर. जिसने जन्म ही नहीं लिया उसके लिए तू अपने पति को कैसे छोड़ सकती है ? बच्चे तो और भी हो जायेंगे पर शादी कोई बच्चों का खेल नहीं है जो तू इतना बड़ा फैसला अकेले ले ले.’

मायके से भी निराश दामिनी के लिए अब कोई भी फैसला करना बहुत मुश्किल था. पर किसी भी कीमत पर वह एक मासूम बच्ची की जान नहीं ले सकती थी. उसने अपनी बचपन की पक्की सहेली रश्मि से बात की और उसी के शहर में अपने रहने का इंतजाम करवाया और अपनी सारी हिम्मत जुटाकर कपड़ों से भरा सूटकेस और अपने जमा कुछ पैसे लेकर निकल पड़ी एक नए शहर के लिए.

अपनी सहेली के घर के पास ही एक छोटे से कमरे में उसने अपनी नयी दुनिया बसाई. दामिनी पढ़ी लिखी थी. वहीँ उसने एक स्कूल ज्वाइन कर लिया और किसी तरह अपना नया जीवन शुरू किया. आसान तो कुछ भी नहीं था पर अपनी हिम्मत और रश्मि से मिली मदद के बल पर उसने सारी मुश्किलों को पार किया और कुछ महीने बाद एक बहुत ही सुन्दर फूल सी बच्ची को जन्म दिया.

दामिनी वंशिका को प्यार से वंशु कहकर बुलाती थी. एक छोटी सी बच्ची के साथ जॉब और घर के सारे काम बहुत मुश्किल थे पर दामिनी को कुछ अच्छे लोगों का साथ मिला और मुश्किलों से उसकी लड़ाई जारी रही. दामिनी ने वंशिका की पढ़ाई-लिखाई और पालन-पोषण में कोई कसर नहीं छोड़ी. वंशिका भी अपनी माँ से बहुत प्यार करती थी. दामिनी सिर्फ उसकी माँ ही नहीं बल्कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त भी थी, जिससे वह अपने स्कूल, दोस्तों सबकी बातें शेयर करती थी.

वंशिका को अपने पिता का सच नहीं पता था. उसे यही बताया गया कि एक हादसे में उसके पिता और दादा-दादी की मौत हो गयी. क्योंकि दामिनी नहीं चाहती थी कि अपने पिता का सच जानकर वंशिका का दिल टूट जाए और वह अपने पिता से नफरत करने लगे.

उधर दामिनी के जाने के एक साल के भीतर ही उसके पति अनिल ने दूसरी शादी कर ली. नयी पत्नी से दो जुड़वाँ बेटे हुए आकाश और विकास.

समय बीतता गया और बच्चे बड़े हो गए.

वंशिका ने PMT की परीक्षा पास की और मेडिकल कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी कर वह डॉक्टर बन गयी. वंशिका की पोस्टिंग उसी शहर में हुई जहाँ उसके पिता रहते थे. दामिनी को जब पता चला तो अतीत की सारी स्मृतियाँ उसकी आँखों के सामने छाने लगी. वह घबरा भी गयी पर बेटी के करियर का सवाल था सो अपनी भावनाओं पर काबू कर वह बेटी के साथ उसी शहर चली आई जहाँ से कभी शादी के बाद उसने अपना नया जीवन शुरू किया था.

उधर अनिल की दूसरी पत्नी निशा की कुछ साल पहले एक कार एक्सीडेंट में मौत हो गयी थी. आकाश और विकास दोनों ने अमेरिका में एम.बी.ए. किया और वहीँ की लड़कियों से शादी कर वहीँ सेटल हो गए. इधर दामिनी का पति अनिल अपने बूढ़े माता-पिता के साथ अकेला रह गया.

अनिल की तबियत बहुत ख़राब रहने लगी. जांच कराने पर पता चला उसे ब्लड कैंसर है. जिन बेटों की चाह में उसने अपनी पहली पत्नी को घर से निकाल दिया उन्हीं को उसकी कोई परवाह नहीं थी. अकेलापन उसे सालने लगा और वह अपराध बोध से भर गया पर अब पछताने के अलावा उसके पास कुछ था भी नहीं. मरने से पहले उसकी बस एक ही ख्वाइश थी दामिनी और अपनी बेटी से माफ़ी मांगना.

एक दिन वंशिका जब अपने घर से हॉस्पिटल के लिए रवाना हो रही थी तो उसने देखा पास ही में एक आदमी चक्कर खा कर गिर गया और बेहोश हो गया. लोगों की मदद से वह उसे अपने घर तक लायी. माँ से पानी मंगवाया और उस आदमी की जांच करने लगी. माँ वंशिका को पानी का गिलास देकर ज्यों ही वापस मुड़ी अचानक उसके कदम रुक गए. उसने उस आदमी को ध्यान से देखा. वह और कोई नहीं बल्कि उसका पति अनिल ही था. वह एकदम स्तब्ध रह गयी. अनिल को भी होश आ गया था. उसके सामने दामिनी खड़ी थी. उसने अपनी आँखों को मसला और फिर से उसे देखा. जब उसने दामिनी को पहचान लिया तो वह अपनी भावनाओं पर काबू ना कर सका, फूट फूट कर रोने लगा और हाथ जोड़कर बोला, ‘दामिनी! प्लीज मुझे माफ़ कर दो. मैं तुम्हारा बहुत बड़ा अपराधी हूँ पर हो सके तो मुझे माफ़ कर दो.’

वंशिका को कुछ समझ नहीं आया तो उसने माँ से पूछा, ‘माँ क्या आप इन्हें जानती हो ?’

वंशिका के माँ कहते ही अनिल ने अपने आंसू पौंछे और एक बार वंशिका को और फिर सवाल भरी निगाह से दामिनी की ओर देखा. दामिनी ने सहमति में सर हिला दिया.

अनिल को खांसी चलने लगी. वंशिका पानी का गिलास लेकर अनिल को पानी पिलाने लगी. पानी पीकर अनिल ने बड़े प्यार से उसके सर पे हाथ फेरा और पूछा, ‘बेटा! तुम्हारा नाम क्या है ?

‘वंशिका’

और इस शब्द के साथ ही अनिल की आँखें झुक गयी और फिर से अविरल आंसू बह पड़े.

By Monika Jain ‘पंछी’

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