Thursday, January 7, 2016

Essay on Atheism in Hindi

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नास्तिकता क्यों एक समाधान नहीं
 
एक ओर धर्म में जहाँ आडम्बर और कर्म-काण्ड आधुनिकता का रंग ओढ़कर आगे से आगे स्थानांतरित होते जा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर स्वयं को तर्कवादी कहने वाले नास्तिकों की संख्या में भी इज़ाफा हो रहा है. हालाँकि आडम्बर एक ऐसी चीज है जिसका सिर्फ धर्म से सम्बन्ध नहीं है, इसका सम्बन्ध मनुष्य के मन से है और इस आडम्बर से तो आस्तिक क्या नास्तिक भी अछूते नहीं है. हाँ, बस ईश्वर और धर्म के नाम पर जो भौंडा प्रदर्शन होता है वह थोड़ा अधिक कुरूप लगता है. धर्म के नाम पर होने वाले अपराध अधिक घृणित लगते हैं. बाकी दिखावों और अपराधों का तो हमारा यह समाज आदि हो ही चुका है. इससे कोई कितना अछूता रह पाता है यह तो उसकी प्रकृति पर ही निर्भर करेगा, आस्तिक या नास्तिक के लेबल पर नहीं.
 
जहाँ एक ओर लोग अपने धर्म और जाति विशेष का होने पर गर्व करते हैं वैसे ही नास्तिक अपने नास्तिक होने पर गर्व महसूसते हैं. कुछ समय तक मैं नास्तिकता के अधिक पक्ष में थी लेकिन तथाकथित आस्तिकता और नास्तिकता का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद मुझे यह महसूस हुआ कि अधिकांश मामलों में दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं. दोनों में ही कट्टरता और अन्धविश्वास को देखा जा सकता है. अपवाद भी दोनों में है ही.
 
नास्तिक धर्म को सारे अपराधों की जड़ मानते हैं और उन्हें लगता है कि धर्म के खत्म हो जाने से देश और दुनिया बेहतर बन जायेगी. लेकिन केवल एक नास्तिक शब्द के बल पर जो दुनिया बदलने चले हैं वे बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में है. अगर उन्हें लगता है कि राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, हजरत मोहम्मद के उपदेशों को मिटा देने से; गीता, कुरान, बाइबिल सभी धर्म ग्रंथों को आग लगा देने से; धर्म शब्द को ही लोगों के जेहन से मिटा देने मात्र से समस्यायों का समाधान हो सकता है तो वे फिर से वही भूल दोहरा रहे हैं जो आस्तिकों ने इस रूप में की है कि सिर्फ ईश्वर की पूजा-पाठ कर लेने से, गंगा में डुबकी लगा लेने से, साधुओं का प्रवचन सुन आने से, मंदिरों या गरीबों में दान कर देने से, अपने-अपने धर्म का प्रसार करने से, निर्दोष पशुओं की बलि देने से और गाय को माता मान लेने से वे स्वर्ग या जन्नत में पहुँच जायेंगे, उनके सारे कष्ट दूर हो जायेंगे या उन्हें अपने गलत-सही हर तरह के स्वार्थ को सिद्ध करने का लाइसेंस मिल जाएगा. दोनों की विचारधारा में ज्यादा कुछ अंतर नहीं. क्योंकि सतही और फोरी तौर पर किये गए उपाय समाधान नहीं बन सकते. इलाज के लिए रुग्ण जड़ों को स्वस्थ जड़ों में रूपांतरित करना जरुरी है. उस कीड़े को मिटाना जरुरी है जिसे स्वार्थ और अज्ञानता कहा जा सकता है. क्योंकि किसी भी तरह के अपराध के मूल में स्वार्थ, अहंकार और अज्ञानता ही होती है, धर्म कहीं भी नहीं.
 
सबसे महत्वपूर्ण चीज यहाँ जो दोनों वर्गों द्वारा इग्नोर की जा रही है वह है मनुष्य का मन और उसका आदतन स्वभाव. जो न तो नाम मात्र का आस्तिक बन जाने से बदल सकता है और न ही नास्तिक बन जाने से. अधिकांश मामलों में आस्तिकता और नास्तिकता एक जिद और अहंकार से ज्यादा कुछ भी नहीं लगती. नास्तिकों की बातें पढ़ें तो नजर आएगा कि उनका एक मात्र उद्देश्य बस धर्म और ईश्वर को गरियाना भर ही रह गया है. जबकि अन्धानुकरण की प्रवृत्ति, शब्दों और प्रतीकों को पकड़ने की प्रवृत्ति सिर्फ धर्म और ईश्वर की मोहताज नहीं. यह पकड़ना मनुष्य का स्वभाव बन गया है, जो जीवन के कई क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है. बल्कि कई नास्तिक खुद अपने जीवन का अवलोकन करेंगे तो वे खुद भी अपने आपको किसी ना किसी चीज की गंभीर जकड़न में पायेंगे. बहुतों ने तो नास्तिक शब्द को ही पकड़ लिया है. और यह पकड़ना ही तो अन्धानुकरण और अंध श्रद्धा है. बल्कि पकड़ जहाँ जितनी गहरी वहां हिंसा उतनी ही ज्यादा. आडम्बर, हिंसा, दिखावा, पाखण्ड मनुष्य के दिल और दिमाग में इस कदर रच बस गए हैं कि वह धर्म के क्षेत्र से निकल भी जाए तो अन्य रूपों में प्रकट होंगे लेकिन होंगे जरुर. अभी भी हो ही रहे हैं. हिटलर और स्टालिन दोनों से बेहतर इस बात के और क्या उदाहरण हो सकते हैं. एक आस्तिक था, दूसरा नास्तिक, लेकिन दोनों के तानाशाही कांडों में कोई अधिक अंतर नहीं. दुर्गा पूजा के विरोध में जब महिषासुर की पूजा होती है, राम के विरोध में जब रावण को पूजा जाता है, बीफ पार्टी के विरोध में जब पोर्क पार्टी या पोर्क पार्टी के विरोध में जब बीफ़ पार्टी होती है तो यह विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है कि समस्या कहीं बाहर है ही नहीं. सारी समस्या तो भीतर ही है.
 
कुछ बातों को समझना यहाँ जरुरी है. अन्धविश्वास अपने पाँव क्यों पसारते हैं? एक पक्ष के स्वार्थ और दूसरे पक्ष के अज्ञान और आत्मविश्वास की कमी के कारण. जिस व्यक्ति को यह न पता हो कि विविध पदार्थों और धातुओं से वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा निर्मित एक यंत्र सात समुद्र बात करने में भी सक्षम है. उसके लिए पहली बार ऐसे किसी यंत्र से रूबरू होना किसी चमत्कार के साक्षात्कार से ज्यादा कुछ हो भी कैसे सकता है. इसके अलावा मनुष्य का मन बहुत निशक्त है. दिन प्रतिदिन बढ़ती भौतिकवादी सुख-सुविधाओं ने लोगों के मन को इतना कमजोर बना दिया है कि छोटी से छोटी समस्या भी उन्हें पहाड़ जैसी बड़ी लगने लगती है. ऐसे में हमेशा वे अवलंब और सहारा ढूंढने की कोशिश करते हैं कि कोई उनकी समस्यायों का निराकरण कर दे. और जो लोग इन समस्यायों को भुनाने के लिए चमत्कारी दूकानें खोल कर बैठे हैं, वहां उन्हें उम्मीद की किरण नजर आती है इसलिए उनके यहाँ ग्राहकों की भीड़ बढ़ने लगती है. और उनका व्यवसाय दिन दुगुनी, रात चोगुनी दर से फलने-फूलने लगता है.
 
स्वार्थ, अहंकार और अज्ञान केवल तथाकथित धर्म का मोहताज नहीं है. धर्म रहे न रहे स्वार्थ, अहंकार और अज्ञान तो तब तक रहेगा ही जब तक ज्ञान और शिक्षा का प्रसार नहीं होता, जब तक लोगों का मन प्रेम और करुणा से ओतप्रोत नहीं होता. दुनिया को हम अगर अच्छा बनते देखना चाहते हैं तो सबसे पहले जरुरत है संकीर्ण सोच से मुक्त एक खुले दिमाग की और सकारात्मक बातों के प्रसार की. ईश्वर है या नहीं यह चिंता का विषय नहीं है. चिंता का विषय है अज्ञान और स्वार्थ के वशीभूत अपनी कट्टर मान्यताओं को ओढ़े बढ़ती नफरत, हिंसा और मनमुटाव. जैसे ही हम दिमाग को खुला छोड़ेंगे और अपने मन, जीवन और आसपास के परिवेश पर विवेक पूर्वक सकारात्मक दृष्टि रखना शुरू करेंगे तो हमें कई नयी चीजें समझ आने लगेगी. विज्ञान, कारण-कार्य-परिणाम के एक ऐसे परिवेश का निर्माण करना बहुत जरुरी है जहाँ लोग मन से सशक्त, संवेदनशील, प्रेम और करुणा से भरे हो, जो अपने आप से दूर भागने की बजाय अपने भीतर झाँकने की हिम्मत कर सके और वहां अपनी समस्यायों के समाधान ढूंढ सके. जहाँ लोग बाहर कुछ बदलने से पहले भीतर खुद को बदलने का साहस कर सकें. जहाँ लोग सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर बन सके.
 
 By Monika Jain ‘पंछी’

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