Sunday, January 3, 2016

Materialism vs Spiritualism Essay in Hindi

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असली विजेता
 
इस भौतिकवादी दुनिया में जहाँ हमारा पूरा जीवन बाहर की ओर जाता है खुद को आंतरिक यात्रा पर ले आना इतना आसान काम नहीं होता. यह जानते हुए भी कि बाहर की यात्रा में हम चाहे चाँद पर पहुँच जाए, चाहे मीलों की दूरियों को चंद क्षणों में बदल दें, चाहे अपार सम्पदा अर्जित कर लें, कितनी ही क्रांतियाँ कर लें, संतुष्टि, सुख या पूर्णता जैसी चीज स्थायी रूप में कहीं नहीं मिलेगी. पूर्णता और आनंद शाश्वत रूप में कहीं अगर मिल सकता है तो वह भीतर ही है. लेकिन यह वह समय भी नहीं जहाँ बाह्य परिस्थितयों और माहौल को पूरी तरह नकारा जा सके. यह बहुत मुश्किल समय है. विज्ञान, सभ्यताओं और परम्पराओं ने एक ओर जहाँ बहुत कुछ सरल किया है तो दूसरी ओर जीवन को अतिसुविधापूर्ण बनाने के चक्कर न जाने कितनी जटिलताएं भी खड़ी कर दी है. ऊपर से किसी की व्यक्तिगत मुसीबतें और परिस्थितयां जाने कितनी सीमायें खड़ी कर देती है.
 
मैं जब आध्यात्मिक विषयों पर कुछ लिखती हूँ तो कुछ दोस्तों के सुझाव आते हैं कि किस चक्कर में पड़ गयी हो, ऐसे तो रचनात्मकता पूरी तरह ही खत्म हो जायेगी. मैं भी यह अच्छी तरह जानती हूँ कि कौनसे विषय हैं जिन पर मेरा लिखा हुआ बहुत ज्यादा पसंद किया जाता है. किन शब्दों को अपनी आवाज़ देने पर वे अधिक सराहे जायेंगे. कौनसा लेखन सफलता की ऊंचाईयों तक पहुँचा सकता है. लेकिन चेतना जिसकी अनुमति नहीं देती वह कार्य कर पाना कितना मुश्किल हो जाता है. एक लेखक की मुसीबतें तो ऐसे में हजार गुना बढ़ जाती है. जब तक उसके मन में अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जरा सी भी चाह हो तब तो बहुत ज्यादा. और तब अपने कुछ विरोधाभासों को भी स्वीकार करना पड़ता है. इस आशा के साथ कि किसी दिन हम इतना साहस अर्जित कर पायेंगे कि उनसे भी मुक्ति पा सकें. जब न कदम पूरी तरह आध्यात्मिकता की ओर बढ़ाये जा सके और ना ही भौतिकता को पूरी तरह छोड़ा जा सके तब संतुलन का रास्ता ही चुनना होता है.
 
जब कोई कहता है कि अज्ञानता एक वरदान है. तब वह इस मायने में बहुत सही कहता है कि एक जड़ जीवन, एक बंधा-बंधाया जीवन जीना बहुत आसान होता है. तभी तो पशु दुनिया जहाँ की चिंताओं से मुक्त खुद में ही मग्न नज़र आते हैं. लेकिन जिसकी चेतना धीरे-धीरे जागने लगती है जाने कितने द्वन्द और संघर्ष उसका इंतजार कर रहे होते हैं. और ऐसे में बाहरी और व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियाँ जब पूरी तरह से प्रतिकूल हो तब तो कहना ही क्या. पर इन प्रतिकूलताओं में भी जो अनुकूलता खोज लेता है असली विजेता वही होता है.
 
By Monika Jain ‘पंछी’

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