Saturday, February 6, 2016

Childhood Story in Hindi

सेब चोर, चोरी की कहानी, बचपन की यादें, घटना. Childhood Moral Story in Hindi. Theft of Apple Incident, Once I Was a Thief Tales, Kids Memories, Child, Children.

मैं एप्पल चोर

ऐसा भी नहीं था कि मुझे एप्पल खानी थी। ऐसा भी नहीं था कि मन लालची था। ऐसा भी नहीं था कि पहले कभी बिना पूछे किसी की चीज उठाई हो। अपने एग्जाम पेपर्स में कोई सवाल न आने पर एक पल को भी आगे-पीछे, बाएं-दायें न झाँकने वाली लड़की को चीटिंग क्या होता है यह नहीं पता था। दूसरों की चीजों या भौतिक वस्तुओं की ओर कभी कोई खासा आकर्षण रहा ही नहीं तो चोरी क्या होती है यह भी कैसे पता होता? लेकिन जाने क्यों उस दिन राह में चलते हुए भैया के बेफिक्री और मजाक में बार-बार कहे शब्द 'तू वहां से एप्पल नहीं उठा सकती' मैंने बड़ी गंभीरता से ले लिए थे। भैया को खुद भी कहाँ अहसास होगा कि मैं उन शब्दों के विपरीत को साकार कर ही दूंगी। तब उम्र भी क्या थी, यही कोई 6-7 साल और भैया भी तो सिर्फ दो साल ही तो बड़ा था, पर बार-बार ये शब्द सुनकर लगा जैसे मेरे साहस को चुनौती दी जा रही हो। जैसे मेरी निर्भयता को ललकारा गया हो। हालाँकि तब नन्हा और अबोध मन यह कहाँ जानता था कि किसी की चीज को बिना पूछे चुपके से उठा लेना साहस और निर्भयता का काम नहीं होता, तब तो बस कानों में यही शब्द गूँज रहे थे कि 'तू वह एप्पल नहीं उठा सकती' और मैं बिना कुछ और सोचे तुरंत उस ठेले के पास गयी और एक एप्पल उठा लिया।

ठेले वाला आसपास कहीं ओर खड़ा था और उसने मुझे ऐसा करते देख लिया था तो वह वहीँ से चिल्लाया और इधर सारा साहस और निर्भयता एक ही झटके में वहां छोड़कर हम ऐसे दौड़े जैसे कोई मेराथन जीतना था। अपने मोहल्ले के खेलों में अपनी परफॉरमेंस की वजह से मुझे बिजली और भैया को बादल का ख़िताब मिला हुआ था इसलिए ठेले वाला रेस में हमसे जीत तो नहीं सकता था पर उसे पीछे आता हुआ देखकर एप्पल वहीँ छोड़कर कुछ देर और हमारी दौड़ जारी रही। एप्पल वाले को तो उसकी एप्पल मिल गयी थी पर उस दिन मेरे मासूम मन ने बहुत कुछ खो दिया था।

भैया को मुझे ब्लैकमेल करने का एक अच्छा-खासा बहाना मिल गया था। अब जब-जब भैया को मुझसे कोई बात मनवानी होती थी वह यही कहकर मनवाता कि वह मम्मी-पापा को एप्पल चोरी वाली बात बता देगा और कई दिनों तक उसकी ब्लैकमेलिंग सफल रही। पर उसे शायद नहीं पता था कि उसकी बात को चैलेंज की तरह मानकर बीच बाजार में किसी ठेले से एप्पल उठा लेने वाली लड़की अपनी यह करतूत खुद सबको बताने का साहस भी तो कर सकती है। और फिर क्या...मैंने सारी घटना खुद ही मम्मी-पापा को सुना दी और एक बड़ा बोझ मन से उतर गया।

मम्मी-पापा ने क्या कहा वह कुछ याद नहीं पर बचपन की यह घटना कितनी ही हल्की-फुल्की और हंसी मजाक में उड़ा देने वाली ही क्यों न हो इससे कितने सारे सबक सीखे जा सकते हैं। सबसे पहला तो यही कि किसी के भी कहने में आकर, या किसी भी उन्माद में बिना सोचे-समझे हम कोई काम नहीं करें। वह कोई भी कार्य साहस और निर्भयता कभी नहीं हो सकता जिससे हमारी आत्मा पतन के मार्ग पर धकेलता हो। दूसरा अपनी गलतियों, अपराधों और दोषों को स्वीकार करने में हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। सच सिर्फ एक बार ही बोलना होता है पर झूठ और अपराध बोध को तिल-तिल कर जीना पड़ता है और तीसरा यह कि भले ही दूसरे दोषी रहे हों तब भी किसी पर दोषारोपण किये बगैर जब अपने हिस्से की गलतियों की जिम्मेदारी हम खुद लेने लगते हैं तो परिस्थितियां और परिणाम न भी बदल पायें पर उनका सामना करने की हिम्मत जरुर आ जाती है। क्योंकि शिकायतें और अपेक्षाएं अक्सर जीने नहीं देती।

Monika Jain ‘पंछी’
(06/02/2016)

Feel free to add your childhood incidents or your views about this story.