Wednesday, February 24, 2016

Essay on Education System of India in Hindi

Essay on Modern Education System of India in Hindi. Adhunik Shiksha Pranali par Nibandh. Schooling Structure, Educational Problems Article, Speech, School Paragraph. आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर निबंध.
 
और भी लाखों तरीके हैं...
 
भाषा व्याकरण और वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ हममें से अधिकांश लोग करते हैं। कुछ कम, कुछ ज्यादा। अशुद्धियाँ करने वालों का मजाक उड़ाती पोस्ट्स भी कई बार देखी हैं। यहाँ तक कि यह भी लिखा देखा है कि अशुद्ध लिखने से बेहतर है लिखा ही न जाए। इससे ज्यादा नकारात्मक और निराशवादी कथन और क्या होगा? यह बिल्कुल ऐसा ही है कि अगर आप हकलाते हैं तो बोलना बंद कर दें; लंगड़ाते हैं तो चलना बंद कर दें; कम नज़र आता है तो देखना ही बंद कर दें।
 
हममें से कईयों की प्रारंभिक शिक्षा ऐसे विद्यालयों में हुई है, जहाँ ये कभी बताया ही नहीं गया कि विराम चिह्न, अनुस्वार, नुक्ता आदि किस बला का नाम है। कहाँ और कैसे इनका प्रयोग करना है। बताया जाता भी कैसे? जिनसे अपेक्षा थी, वे या तो बड़े आलसी थे या फिर उन्हें खुद इनका सही प्रयोग नहीं मालूम था। मतलब यह समस्या अधिकांश मामलों में व्यक्ति विशेष की नहीं, एक तंत्र की है। कमजोर शिक्षा तंत्र की। जिसे केवल ठहाके लगाकर तो कभी भी नहीं सुधारा जा सकता।
 
कुछ समय पहले पड़ोस में रहने वाली एक 6th क्लास की स्टूडेंट ने बताया कि उनका हिंदी विषय में शब्दार्थ का क्लास टेस्ट था। उसमें एक शब्द था विधाता, जिसका अर्थ वह भगवान लिखकर आ गयी तो उनकी टीचर ने यह कहते हुए गलत कर दिया कि बुक में तो ईश्वर दिया हुआ है और तुम्हारा पर्यायवाची शब्दों का टेस्ट नहीं हो रहा है, शब्दार्थ का हो रहा है। इसलिए वही लिखना है जो बुक में लिखा है। ज्यादा आश्चर्य तो नहीं हुआ क्योंकि ऐसी घटनाएँ तो मैं भी पढ़ाई के दौरान बहुत बार झेल चुकी हूँ। जहाँ टीचर्स सही आंसर को गलत कर देते थे। क्लास के सबसे होशियार बच्चे को ब्लैक बोर्ड पर सबके लिए आंसर्स लिखने को कहकर आराम से कुर्सी पर पसर जाते थे। बच्चों से कॉपीज चेक करवाते थे। पढ़ाई के नाम पर सिर्फ और सिर्फ चैप्टर की रीडिंग...पर मैं एक छोटे से कस्बे की एक सरकारी हिंदी माध्यम स्कूल की छात्रा रही हूँ और ये जो वाकया है ये शहर की एक नामी स्कूल का है जहाँ बच्चों से फीस के नाम पर मोटी-मोटी रकम वसूल की जाती है। इसलिए थोडा आश्चर्य मिश्रित दुःख हुआ और समझ नहीं आया कि क्या कहूँ...हे ईश्वर!...हे भगवान्!...या हे विधाता!
 
इसी तरह एक बार घर के बाहर एक लड़की आई। मैंने पूछा क्या करती हो? वह बोली, 'बकरियाँ चराते हैं।' मैंने पूछा स्कूल नहीं जाती? उसने कहा, 'स्कूल तो छोड़ दी है। स्कूल वाले कौनसी नौकरी दे रहे हैं, जो स्कूल जाएँ। करना तो खेती और बकरियाँ चराने का काम ही है।' आगे मैं कुछ बोल नहीं पायी, क्योंकि जहाँ दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो, वहाँ पर बाल श्रम का विरोध और तथाकथित स्कूली शिक्षा की बातें बेमानी है। क्योंकि जो स्कूली शिक्षा दी जा रही है, वह शिक्षित बेरोजगारों की भीड़ बढ़ाने का काम जरुर कर रही है। ऐसे बेरोजगार जो खेती और पशुपालन के काम को अपने लायक नहीं समझते और सफ़ेद कॉलर वाली नौकरी पा नहीं सकते।
 
खैर! यह एक अलग मुद्दा है, लेकिन हाँ बात अगर लेखन सम्बन्धी अशुद्धियों की हो तो बेहतर होगा कि सामान्य अशुद्धियों को इंगित करती हुई पोस्ट्स विद्वजन डालते रहें या फिर जहाँ अशुद्धि दिखे वहीं अशुद्ध और शुद्ध शब्द बता दिया जाए। यह भी जरुरी है कि जिनकी अशुद्धियाँ बतायी जा रही हैं, वे इसे अपने अहम् पर चोट का मसला न बनायें और सहर्ष गलतियों को सुधारने को तैयार रहें। समाज सेवा सिर्फ वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम में जाकर फोटो खिंचवाने से ही नहीं होती, और भी लाखों तरीके हैं।
 
 
By Monika Jain ‘पंछी’

How is this essay about education system of India?