Tuesday, February 16, 2016

Essay on Positive Attitude in Hindi

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मैं इस तरह मरना नहीं चाहती

कुछ दिन पहले एक नन्हीं सी चिड़िया सीढ़ियों के रास्ते में फंस गयी थी। छत का दरवाजा और रोशनदान सब खोल देने के बावजूद भी उसे काफी देर तक रास्ता नज़र नहीं आया और बड़ी देर तक वह चीं-चीं करती रही। उसके ये चीं-चीं के स्वर दिल को भेदने वाले थे। जब तक आवाज़ आती रही मन बेचैन रहा। किसी काम में मन नहीं लगा। फिर जब कुछ देर बाद आवाज़ आना बंद हुआ और जाकर देख लिया कि चिड़िया उड़ चुकी है तब जाकर तसल्ली हुई।

नीचे आकर कुछ पढ़ने बैठी तो अचानक ख़याल आया कि यह आवाज़ कितनी जानी पहचानी है। नन्हीं चिड़िया की यह आवाज़ बिल्कुल उस नन्हें बच्चे जैसी ही तो है जो माँ से दूर कहीं अपह्रत करके ले जाया गया हो, या बिल्कुल उस लड़की के जैसी जिसे रास्ते पर कुछ आवारा लड़कों ने घेर लिया हो, या बिल्कुल उस मुर्गे या बकरे जैसी जिसकी गर्दन पर बस कुछ ही देर में छुरी चलायी जाने वाली हो, या बिल्कुल उस वृद्धा जैसी जिसे घर के एक कौने में पटककर उसके मरने का इंतजार किया जा रहा हो। भय और मदद की पुकार की ये आवाजें हर रोज चारों ओर से तो उठती हैं, फिर हमें आजकल कुछ सुनाई क्यों नहीं देता? क्यों धीरे-धीरे हमारी संवेदनशीलता खत्म सी होती जा रही है। जब कारणों को टटोलने बैठी तो देखा एक बहुत बड़ा कारण खुद इन नकारात्मक ख़बरों का अतिप्रसार ही तो है जो धीरे-धीरे हमें संवेदना शून्य बना रहा है।

कुछ दिन पहले ही एक बड़ी अच्छी बात भी मालूम चली। अफ्रीका के समुदाय में जब भी कोई व्यक्ति कोई गलती या अपराध करता है तो उसे गाँव के बीचोबीच ले जाया जाता है। गाँव के लोग उसे चारों ओर से घेर लेते हैं और उसे दो दिन तक उसके सभी अच्छे कामों के बारे में याद दिलाया जाता है, जो उसने अब तक किये हैं। बुराई के आवरण में उसके भीतर उपस्थित अच्छा इंसान जो कहीं खो गया है, यह उसे फिर से जगाने की कोशिश है।

पर हम अगर गौर करें तो पायेंगे कि आज न्यूज पेपर हो, चाहे न्यूज चैनल, सोशल साइट्स हो या कोई भी अन्य माध्यम...सब जगह नकारात्मकता बहुत ज्यादा परोसी जा रही है। सिर्फ समस्या, सिर्फ चिंताएं, सिर्फ शिकायतें ही शिकायतें...समाधान की बातें बहुत कम नज़र आती है। ऐसा लगता है जैसे दुनिया में अच्छाई और भलाई नाम की कोई चीज बची ही नहीं है। खून से लथपथ, बलात्कार, चोरी, रिश्वत, लूट, सांप्रदायिक दंगों और अश्लीलता से सनी ख़बरें दिन-रात हमारे चारों ओर हाहाकार मचाये रहती है। न इनके समाधानों पर ज्यादा चर्चा होती है और न ही उन अच्छी ख़बरों का ज्यादा प्रसार होता है, जहाँ किसी ने किसी के जीवन को बचाया हो या किसी ने अजनबी रहते हुए भी बुरे वक्त में किसी की मदद की हो, या जिसका पूरा जीवन ही मानवता को समर्पित रहा हो।

जबकि इसी दुनिया में ग्यारह साल की एक ऐसी बहन भी है जो अपने छह साल के भाई के बीमार होने पर उसे कंधे पर उठा अकेले आठ किलोमीटर दूर अस्पताल तक पहुंचाकर उसकी जान बचाती है। इसी दुनिया में रिटायर हो चुके एक ऐसे हेडमास्टर भी हैं जो रिटायर होने के बाद भी स्कूल जाकर बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते हैं और पढ़ाने से पहले स्कूल परिसर का झाड़ू भी लगाते हैं। इसी दुनिया में एक ऐसे शिक्षक भी हैं जो सुबह उठकर अख़बार बांटने का काम इसलिए करते हैं ताकि स्कूल के बच्चों को गुणवत्ता युक्त मिड डे मील उपलब्ध करवा सकें और इसी दुनिया में ऐसे माता-पिता भी हैं जो अपनी छह साल की बेटी की मौत हो जाने पर भी अपना धैर्य खोये बिना उसकी आँखों को दान कर किसी की ज़िन्दगी रोशन करने का ज़ज्बा रखते हैं।

तथ्य यह है कि यह दुनिया जो अभी तक टिकी हुई है , अच्छाई पर ही टिकी हुई है। क्योंकि हर इंसान में एक अच्छा इंसान स्वाभाविक तौर पर होता है। मतलब आज भी अच्छाई बुराई की तुलना में ज्यादा है, क्योंकि जिस दिन बुराई बाजी मार लेगी उस दिन तो दुनिया का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। तो बहुत जरुरी है कि हम ज्यादा से ज्यादा अच्छी बातों का, अच्छे लोगों का, अच्छी घटनाओं का प्रसार करें। क्योंकि जो हम पढ़ते, सुनते और देखते हैं उसका हमारे व्यक्तित्व पर बहुत गहरा असर पड़ता है। जिस बात की जितनी ज्यादा चर्चा होती है उसकी उतनी ही गहरी जड़े पैठने लगती है। लगातार बुरी ख़बरों को सुनना हमें संवेदना शून्य, क्रूर और कठोर बनाता है।

क्योंकि बुराई का प्रसार ज्यादा होता है तो व्यक्ति अपनी तुलना अक्सर निम्नतर से करने लगता है। इतने क्रूरता पूर्ण अपराधों की ख़बरें उसे हमेशा इस भ्रम में बनाये रखती है कि वह दूसरों से कम बुरा है, उसकी बुराईयाँ, उसकी गलतियाँ जायज हैं। और ऐसा सोचते-सोचते वह अधिक से अधिक बुराईयाँ संचित करने लगता है।

जब हर तरफ बुराई की ही चर्चा हो; हिंसा, बलात्कार, चोरी की ही बातें हों तो अपराध करते समय उसका डर और संवेदना बिल्कुल खत्म हो जायेगी क्योंकि उसे लगेगा कि सभी यही तो कर रहे हैं। दूसरी ओर अगर अच्छी बातों और अच्छाईयों की चर्चा ज्यादा हो तो व्यक्ति कोई भी हीन कार्य करते समय अपनी तुलना अन्य लोगों की अच्छाई से करेगा और इतना आसान नहीं होगा उसके लिए बुरा काम करना। क्योंकि अच्छाई की चर्चा, भलाई की चर्चा अच्छाई की जड़ें मजबूत करती है।

इसलिए क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम नकारात्मक ख़बरों के प्रसार को थोड़ा कम करें। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम उनके समाधानों की चर्चा ज्यादा करें। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अच्छी बातों की चर्चा ज्यादा करें। यह जरुरी है। हमारी संवेदना को बचाने के लिए बेहद जरुरी है। क्योंकि कोई अंतर नहीं एक इंसान के मर जाने में और उसकी संवेदना के मर जाने में। और मैं इस तरह मरना नहीं चाहती, बिल्कुल भी नहीं।
 
By Monika Jain ‘पंछी’