Tuesday, February 2, 2016

My Childhood Essay in Hindi

My Childhood Essay in Hindi. When I was a Child Memories, Bachpan ki Yaadein, Wandering Days Recollection, Walk Experiences Paragraph, Ghoomakad, Walking Friends, Wander. बचपन की यादें, घुमक्कड़.
 
मैं घुमक्कड़...
 
बचपन से ही मुझे पैदल घूमने का बहुत शौक रहा है. मम्मा बताती है कि जब मैं दो साल की थी तो अपनी ही एक हम उम्र सहेली के साथ बिना किसी को खबर पड़े चुपके से घूमने निकल जाया करती थी. सड़क पर चलते-चलते हम जाने कहाँ-कहाँ पहुँच जाते थे . मतलब हम आये दिन खो जाते थे और दोनों परिवारों में कोहराम मच जाता था. बाद में हमारे बड़े भाइयों को पहरे पर बैठाया जाता था, तो भी हम कभी-कभी जाने कैसे चकमा देकर निकल ही जाते थे.
 
तब हमारा घर बन रहा था और मैं अपनी सहेली से अक्सर कहती, ‘चल, नए घर घूमने चलें’. माँ और भैया यह भी बताते हैं कि हम एक जोड़ी चप्पल पाँव में पहनकर जाते थे और एक जोड़ी जूते हाथ में ले जाते थे :p. अब इसके पीछे क्या लॉजिक रहा होगा यह तो नहीं पता, लेकिन हाँ हमारा यह घूमना तब छूटा जब एक दिन कुछ डॉग्स हमारे पीछे पड़ गए, तब हाथ वाले जूते वहीँ छूट गए और कुछ लोगों की मदद से हम अपने-अपने घरवालों को मिल गए. मैं सहेली की मम्मी की गोद में और सहेली मेरी मम्मी की गोद में...वाह! क्या सीन रहा होगा :p और फिर रोते-रोते, डांट खाते हुए घर पहुँचे होंगे. :) उसके बाद मेरा परिवार नए घर में शिफ्ट हो गया...और उस सहेली के साथ घुमक्कड़ी बस वहीँ तक रही. हालाँकि बाद में फिर एक बार हम दो साल साथ-साथ पढ़े.
 
कुछ भी याद न रहने वाली उम्र के उस दौर के बाद भी किसी ना किसी रूप में यह घुमक्कड़पन हमेशा जारी रहा. जब किसी का साथ रहा तब भी और जब न रहा तब भी. इनफैक्ट मैं तो पढ़ाई भी घूम-घूम कर किया करती थी. तब का एक पड़ोसी दोस्त बताता है कि वह और उसका एक मित्र जो दोनों ही मेरे क्लासमैट्स थे मुझे किताब हाथ में लेकर छत पर लगातार घंटों घूमते देखकर उनका सर चकरा जाता था. छत पर ही एक दिन वह उसके दोस्त का प्रपोजल कार्ड लेकर आया था...और बड़ी मासूमियत से मैंने उसी समय उसे वापस लौटा दिया...और उस पड़ौसी मित्र ने कहा, कोई नहीं वह यूज़ कर लेगा इस कार्ड को किसी लड़की को देने के लिए. :p पता नहीं उसने उसके दोस्त को जाकर क्या कहा होगा. :)
 
मुझे दिन में सोने की आदत कभी नहीं रही इसलिए स्कूल से आने के बाद दिन में जब घर में सब को सोता हुआ देखती थी तो मन न लगने के चलते पूरे घर में पैर पटकते हुए चक्कर लगाती रहती थी और इंतजार करती थी कि कोई उठ जाये. पड़ोस की लड़कियों के साथ भी मोर्निंग और नाईट वाक के कई दौर चले. यहाँ तक कि लव रिलेशन की भी सबसे खूबसूरत चीज लगती है...रात के अँधेरे में हाथ पकड़ कर लम्बी सैर पर जाना, तब ऐसा लगता है कि बस चलते रहें, चलते रहें, वापस कभी लौटना ही न हो….तुम भी चलो, हम भी चलें...चलती रहे ये ज़िन्दगी की तर्ज पर. :)
 
खैर! आज अचानक मेरा मन किया जानने का कि अब तक मैं कितने किलोमीटर चल चुकी हूँ. अगर यह पता चल जाता तो शायद कोई रिकॉर्ड मेरे नाम भी हो जाता. :p ;)
 
By Monika Jain ‘पंछी’
 
How is this essay about childhood memories?