Monday, February 1, 2016

Poem on Innocence in Hindi

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मुक्ति...तुमसे
 
तुम सामने नहीं थे
कैसे देख पाती तुम्हारे भावों को
कैसे महसूस पाती तुम्हारी छद्मता
कैसे सुन पाती उस बेफिक्र कुटिल हंसी को
जिसे मेरी मासूमियत से कोई सरोकार ही न था.

तुम सामने न थे
और तब...
तुम्हारा शब्द-शब्द ही सत्य था मेरे लिए
तुमने जैसा खुद को बताया 
मैंने वैसा ही तुम्हें गढ़ा 
मैंने प्रेम को प्रेम पढ़ा.
 
तुमने जैसा प्रकट किया मैंने वैसा ही माना 
मैंने स्नेह को स्नेह जाना
मैंने परवाह को भी परवाह ही माना.

और देखो अब तुम्हारे आखिरी कटु शब्दों को भी
मान लिया है ब्रह्म सत्य
उतार लिया है मन में एक मंत्र की तरह
कि जब-जब भी याद सताती है तुम्हारी
जप लेती हूँ वह मंत्र
इस आशा में 
कि इस मंत्र का ध्यान ही दिलाएगा मुक्ति
तुमसे और तुमसे जुड़ी हर याद से.

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this poem about innocent love?