Monday, March 7, 2016

Essay on Indian Culture and Tradition in Hindi

Essay on Indian Culture and Tradition in Hindi. Customs of India Article, Parampara Speech, Festivals Paragraph, Sanskriti, Dogma, Heritage, Pratha Lekh. भारतीय परम्परा और संस्कृति पर निबंध, कुप्रथा.
 
परंपरा कहीं प्रदूषण न बन जाए

पर्व, संस्कृति, परंपरा, प्रकृति के साथ इनके जुड़े होने सम्बंधित भावुक कर देने वाली बातें बहुत पढ़ीं. इनका मजाक उड़ाने वाली, विरोध करने वाली, तर्क की कसौटी पर कसी पोस्ट्स भी बहुत पढ़ीं. दोनों काफी कुछ अपनी-अपनी जगह सही हैं. मैं जन्म से जिस धर्म और परिवार से जुड़ी हूँ और जो स्वभाव और परिस्थितियां पायी हैं उसमें परम्पराओं, रीति-रिवाजों, कर्म-कांडों से बहुत ज्यादा पाला पड़ता नहीं...और खुद का आकर्षण नहीं इसलिए जहाँ तक संभव हो पाला पड़ने भी नहीं देती. पर अगर बात प्रकृति से जुड़ाव, स्नेह, संवेदनशीलता की आये तो हर रोज पर्व और उत्सव मनाने वाले कई लोगों से बहुत बेहतर स्थिति है. कोई अपनी परम्पराएं संजोकर रखना चाहता है, कोई छुटकारा चाहता है, जो जैसा भी चाहता है वैसा करे. लेकिन हम जो भी जीवन पद्दतियां अपनाते हैं उनमें धीरे-धीरे पसर आने वाले आतंकवाद, शोषण, अन्याय, असंवेदनशीलता, दिखावे, हिंसा और पाखण्ड को नजरंदाज करते रहें यह भी तो सही बात नहीं. यह ऐसा युग है जहाँ पर अहिंसा के नाम पर भी भयंकर हिंसा हो जाती है. जहाँ धर्म के नाम पर कितना अधर्म हो रहा होता है इसका अहसास तक नहीं होता. ऐसे में आँखों और मन को क्षण भर के लिए लुभाने वाली चीजों के पीछे कौन-कौन से आधार खोखले हो रहे हैं, इस पर ध्यान दिया जाना भी जरुरी है. पर्वों पर रात दिन छूटने वाले पटाखें, लाउडस्पीकर वाले रात्रि जागरण, सुबह असमय नींद उड़ा देने वाली आरती और भजनों की तेज आवाजें क्या यही प्रकृति और इसके प्राणियों से प्रेम है? कम से कम रातों को शांति के और सुबहों को तो पंछियों की सुरीली आवाजों के नाम कर दिया होता.
 
हमें यह समझना होगा कि आज आस्था, धर्म, ईश्वर और परम्पराओं से कई ज्यादा जरुरत दुनिया को संवेदनशीलता और अच्छाई की है. संवेदनशीलता प्रकृति और इसके समस्त प्राणियों के प्रति. अगर परम्पराएँ प्रकृति से जोड़ने में सफल हो पाती, तो आज प्रकृति और पर्यावरण की ये हालत न होती. तथाकथित परम्पराओं को निभाते तो मैंने उन्हें भी देखा है, जो झरनों, झीलों, नदियों में शराब छलकाते हुए, फूहड़ गानों पर घंटों डांस करते हैं. परम्पराएँ निभाते उन्हें भी देखा है, जो तोते, चिड़ियाँ जैसे कई पशु-पक्षियों को पिंजरों में कैदकर गर्व से फूलें नहीं समाते. परम्पराएँ निभाते उन्हें भी देखा है, जिनके लिए पत्नी सिर्फ घर में काम करने वाली और उनके विषय भोगों को पूरा करने वाली मशीन से ज्यादा कुछ भी नहीं. परम्पराओं के नाम पर होने वाली हत्याएँ देखी हैं, परम्पराओं के नाम पर होने वाला शारीरिक और मानसिक शोषण भी. और भी सेकड़ों उदाहरण...जरुरत क्या है चीजों को यूँ गोलमोल घुमाकर, उन्हें सही सिद्ध करने की. क्या सीधी-सरल बातें समझ नहीं आती? या बस दिखावा करते-करते एक दिन सबको ले डूबना ही हमारी एकमात्र इच्छा और नियति है. बल्कि आजकल तो परंपरा और आधुनिकता दोनों का वह कॉकटेल दिखाई पड़ता है जिसने चमक और धमक की अति के पीछे अपने सारे आधारों को खोखला कर देने की ठानी है.
 
मैं धर्म और परम्पराओं की विरोधी नहीं लेकिन जब परम्पराएँ, प्रतीक, रिवाज और कर्म-कांड अपना महत्व खोने लगे और शोषण और व्यापार ही उनका उद्देश्य मात्र रह जाए तो उन्हें भुला देने में ही भलाई है. कहीं किसी की मृत्यु होती है और सुर में सुर मिलाकर महिलाएं पल्ला प्रथा के नाम पर रोने का अभिनय करती हैं. अभिनय के समाप्त होने पर यही महिलाएं मृत्यु वाले पूरे परिवार का इतिहास, भूगोल सब बांचने लगती है. बेटी ने किसी और जाति में विवाह किया है, इसलिए उसके रहते हम यहाँ नहीं रह सकते. पति ने ये किया, पुत्र ऐसा है, फलां, ढीमका और भी न जाने क्या-क्या. परिवार, समाज, देश और दुनिया सभी को संवेदनशीलता और प्रेम की जरुरत है. इन बेवजह की नौटंकियों की नहीं. कुछ दिन पहले सुना था दक्षिण तमिलनाडु के विरुद्धनगर में 'तलईकुथल' नाम की एक परम्परा है. जिसके अनुसार बुजुर्गों को नारियल पानी पिला कर फिर किसी ठंडे तेल से मालिश करके तब तक ठंडे पानी से नहलाया जाता है जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो जाती. इस परंपरा के चलते अपने दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्नी किसी की भी हत्या कर दी जाती है और कोई पछतावा भी नहीं. क्या खाकर पैदा होते हैं ऐसे लोग? उन्हें इंसान तो नहीं कह सकते पर 'जानवर' वो भी कैसे कहें? लोग अपने स्वार्थ के लिए कोई भी परंपरा बना लेते हैं. अपने ही मतलब के लिए उसे जब चाहे तोड़ मरोड़ लेते हैं और अपने ही मतलब के लिए इन परम्पराओं की दुहाई देते नहीं थकते. थू है ऐसी परम्पराओं पर, इन्हें बनाने वालों पर और इनका पालन करने वालों पर.
 
परम्पराओं, प्रतीकों, कर्मकांडों और संस्कृति के नाम पर छल की संभावनाएं बहुत ज्यादा बढ़ गयी है. हमें समय को देखकर चलना होगा और आज की आवश्यकताओं को समझना होगा. सालों पहले जो चीजें प्रासंगिक थी, आज भी हो जरुरी नहीं. समस्यायों के घुमा-फिरा कर नहीं, सीधे समाधान ढूंढने होंगे. मंदिर, मस्जिद, सिन्दूर, मंगलसूत्र, पूजा-पाठ, आरती, ज्योतिष, वास्तु इनके पीछे चाहे जितने वैज्ञानिक कारण गिनाये जाए पर क्या ये चीजें आज की समस्यायों का समाधान करने में सक्षम है? सारी समस्याएं हमारे भीतर की उपज है. तो समाधान भी वैसे ही ढूंढने होंगे जो सीधे दिल और दिमाग पर असर करे. इधर-उधर भटकाने वाले समाधान नयी समस्याएं पैदा करेंगे और कुछ नहीं.
 
सारी अमूर्त चीजों को मूर्त रूप में बदल देने वाली परम्पराएँ और व्यवस्थाएं कितना भला कर पायी है, वर्तमान के सन्दर्भ में इसकी समीक्षा बेहद जरुरी है. कहीं ऐसा ना हो कि हम खोखली परम्पराओं पर गर्व करते रह जाएँ और वह जमीं जिस पर इन्हें आरोपित किया गया था उसका पूरा सफाया ही हो जाए. सत्य के प्रतीक बचे रहे और सत्य पूरी तरह मिट जाए. प्रेम और साहस के प्रतीक बचे रहे पर प्रेम और साहस कहीं नजर ही ना आये, ऐसा तो नहीं होना चाहिए न?

 
By Monika Jain ‘पंछी’

How this essay about unnecessary traditions of our culture?