Wednesday, March 30, 2016

Essay on Nonviolence in Hindi

Essay on Nonviolence in Hindi. Ahimsa Paramo Dharma Paragraph, Ahinsa par Nibandh, Non Violence Day Article, Fearlessness Speech, Abhay Daan Anuched. अहिंसा परमो धर्मः पर निबंध, अभयदान दिवस, जीव दया.
 
जीना सबको ही भाता है
 
हर किसी का जीवन हिंसा पर ही खड़ा है. हिंसा के बिना किसी जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती. लेकिन अनावश्यक हिंसा को तो रोका जा ही सकता है. बचपन में फूलों की सुन्दरता से आकर्षित होकर मैं कभी-कभी फूल तोड़ लेती थी, पर फूल को तोड़ते ही उसकी सुन्दरता जाने कहाँ गायब हो जाती थी और हर बार फूल तोड़ने पर पछतावा ही होता था. धीरे-धीरे कब फूलों का जीवन पौधों पर ही अच्छा लगने लगा, पता भी न चला...और अब फूल नहीं तोड़े जाते. किसी पूजा-पाठ करने वाले के लिए भी नहीं.
 
क्योंकि अगर किसी का यह विश्वास भी है कि सृष्टि की रचना ईश्वर/अल्लाह ने की है, तब भी सृष्टि का रचयिता अपने ही नाम पर अपनी ही रचनाओं की मृत्य से ख़ुश कैसे हो सकता है? किसी निर्दोष या मासूम की हत्या से तो बिल्कुल भी नहीं. हम सभी किसी न किसी मात्रा में हिंसक हैं...कोई कम तो कोई ज्यादा. इसलिए यह तो समझ आता है कि किसी की कटु आलोचना का अधिकार हमें नहीं है. लेकिन हम मिलकर इस दुनिया को जितना संभव हो, सबके लिए सुंदर और जीने योग्य तो बना ही सकते हैं. क्योंकि जीना भला किसे नहीं पसंद? और इतना नहीं कर सकते तब भी इतना तो कर ही सकते हैं कि जो काम गलत है, सिर्फ हमारे स्वार्थ और मनोरंजन के लिए है, धर्म और ईश्वर जैसी अमूर्त चीजों के नाम पर उन्हें मढ़कर उनका महिमामंडन तो न करें.
 
कुछ बच्चे और कुछ बड़े भी कई बार इसी फिराक में रहते हैं कि कब कोई नन्हा कीड़ा-मकोड़ा दिखे और कब उस पर अपना हाथ साफ़ करें. और तो और मारकर ऐसे ख़ुश होते हैं जैसे किसी शेर-चीते को फतह कर आये हों, लेकिन जब वास्तव में शेर या चीता सामने आएगा तो ऐसी घिग्गी बंधेगी कि मुंह से आवाज़ भी नहीं निकलने वाली...तो हिंसा वस्तुत: हमारी कायरता/भय ही है और अहिंसा वीरता...जिसका जन्म सिर्फ निर्भयता से ही हो सकता है. सिर्फ निर्भय ही अभय दे सकता है. इसलिए ही वर्धमान जो अदृश्य जीवों को भी अभयदान देते थे महावीर कहलाये.
 
कुछ दिन पहले किसी अथीति के स्वागत और मनोरंजन के लिए एक कबूतर को रॉकेट के साथ बांधकर उड़ाया गया. हवा में ही कबूतर के चिथड़े उड़ गए. कबूतर से भोला और शांत पक्षी तो ढूंढे नहीं मिलेगा. कई बार बहुत करीब से कबूतर, चिड़िया, चींटी आदि को मरते देखा है. हर बार यही पाया कि मृत्यु की पीड़ा और जीने की इच्छा प्रजातियों में विभेद नहीं करती. मनुष्य जरुर अपने प्रयासों से इस पीड़ा से ऊपर उठ सकता है, और सिर्फ उसी दिन मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ सिद्ध होता है. बाकी एक मनुष्य और पशु में क्या अंतर है? विकास के नाम पर हम कितनी भी ऊंची इमारते बना लें, समूचे विश्व को डिजिटल कर दें लेकिन ये सब करके हम किसी पे कोई अहसान तो नहीं कर रहे. हाँ अपनी जन्मदात्री प्रकृति का दोहन और अन्य प्राणियों से उनके अधिकार जरुर छीन रहे हैं. एक जानवर सिर्फ हमारे मनोरंजन या धर्म की भेंट चढ़ जाए यह स्वीकार्य नहीं है. जैसी संवेदनाएं हम इंसानों में होती है वैसी ही इन पशु पक्षियों में भी. जिस तरह हमारी जीजिविषा है, वैसी ही इन जीवों की भी. जैसा दर्द हमें होता है, वैसा ही इन्हें भी होता है. और जिस दिन हम इतना सा समझ जाएँ उस दिन अहिंसा धीरे-धीरे स्वत: ही जीवन में उतरने लगेगी, उसके लिए फिर अलग से प्रयास की जरुरत नहीं रहेगी.
 
कुछ दिन पहले कुछ बच्चों के साथ छत पर बैठी थी, तभी अचानक कोई मकोड़ा आया और किसी के पैर के नीचे आकर घायल हो गया. मेरे मुंह से बरबस निकला, 'अरे! मकोड़ा मर गया'. वह बच्ची बोली, 'इसे क्या जरुरत थी बीच में आने की.' तब मैंने कहा, 'वह मासूम है. उसे क्या पता कि कहाँ उसकी जान को खतरा है. इसलिए ख़याल तो हमें ही रखना होगा.' वह दिन है और आज का दिन अब जिसे भी मकोड़ा दिखता है वह बोलता/बोलती है, 'मासूम आ गया, मासूम आ गया' और यह कहते हुए पास आने पर सब उसे बचाने की जुगत में लग जाते हैं या सेफ प्लेस पर छोड़कर आ जाते हैं. वे सारे बच्चे माँसाहारी है. उनका यह कार्य प्रेरित हो सकता है. लेकिन वास्तव में अहिंसा हमारा स्वभाव ही है. हम बस उसे भुलाये बैठे हैं.

By Monika Jain ‘पंछी’
 
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