Wednesday, March 30, 2016

Essay on Science and Religion in Hindi

Essay on Science and Religion Coexist in Hindi. Dharam aur Vigyan Nibandh, Spirituality Article, Conflicts Quotes, Complementary Relationship Paragraph, God Dharma Speech. धर्म और विज्ञान पर निबंध.

(1)
 
जड़ से चैतन्य की ओर
 
चीजों को विज्ञान की भाषा में ही समझना और समझाना बेहद जरुरी है. और युग के अनुरूप अनावश्यक बातों से छुटकारा भी जरुरी है. अनावश्यक अलंकरण और चमत्कृत करना भ्रम पैदा करता है और यहीं से जन्म लेते हैं अन्धविश्वास और अन्धानुकरण.
 
धर्म शब्द को भी बड़ा विचित्र रूप से देखा जाता है. और जितना इसे आस्तिक चमत्कृत रूप से देखते हैं, उतना ही नास्तिक घृणित रूप से. जबकि शब्द बेचारा दूसरे शब्दों की तरह से ही सीधा सा है. बस स्वार्थ के लिए इसका महिमामंडन कर दिया गया है. फ़िलहाल मुझे तो यही समझ में आया है कि धर्म का मार्ग अपने मूल स्वभाव या प्रकृति को पाने का मार्ग है. यह चेतना के विकास का मार्ग है. और यह विकास सिर्फ मनुष्य के लिए नहीं हर वस्तु के लिए है. 
 
ईश्वर का ख़याल करते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में त्रिशूल, तलवार, गोटा और भी ना जाने कैसे-कैसे औजार लिए हुई, ऊपर से नीचे तक सजी धजी छवियाँ उभरने लगती है. जबकि चेतना, आत्मा, परमात्मा ये सभी शब्द पञ्च तत्वों में से उस तत्व की ओर इंगित करते हैं जिसे आकाश, स्पेस, ईथर, स्पिरिट या शून्य आदि कहा जाता है. और शायद इसलिए ही कहा जाता है कि परमात्मा कण-कण में व्याप्त है. 
 
अगर सचमुच वैज्ञानिक ह्रदय बनना है तो ये आस्तिक और नास्तिक की श्रेणियों से थोड़ा बाहर निकलकर खुला और विस्तृत बनने की जरुरत है. न तो हमारे पूर्वज इतने मुर्ख थे और न ही हम इतने बुद्धिमान हैं कि कोई भी बात शत प्रतिशत दृढ़ता के साथ कह सकें. बल्कि मुर्खता का प्रतिशत अब ज्यादा नजर आता है. क्योंकि अगर हर कोई इतना जड़ हो जाता तो पशु से मनुष्य तक की ये यात्रा भी संभव न होती. और जब पशु से मनुष्य तक की यात्रा संभव है तो मनुष्य से परमात्मा तक की यात्रा की संभावनाओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता. लेकिन शब्दों के मनमाने अर्थ लगाकर कई लोग फिर से मनुष्य से पशु बनने की तैयारी में लगे हुए हैं.
 
(2)
 
उत्थान या पतन

(Science without Religion is Lame, Religion without Science is Blind )
 
विज्ञान खोज का मार्ग है...हम उसे दोहन का मार्ग बना रहे हैं.
धर्म भी पथ है गति का...पर हम उसे दुर्गति का पथ बना रहे हैं.
धर्म और विज्ञान पूरक है उत्थान के...रुको!...कहीं हम उन्हें पतन का पूरक न बना दें.
 
प्रश्न : इतनी गूढ़ बात कहो तो फिर जरा विस्तार से कहा करो बौस..... न समझ आऐ तो....??

उत्तर : न समझ आये तो पूछा जाए. :) विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को जानने का मार्ग है. हमने उसे सुविधाभोगी तकनीक के लिए प्रकृति के दोहन तक सीमित कर दिया है. धर्म आत्मा/परमात्मा के रहस्य तक पहुँचने का मार्ग है...हमनें उसे पाखण्ड, दिखावे, कट्टरता और राजनीति तक सीमित कर दिया है. धर्म और विज्ञान सहायक है एक दूसरे के...रहस्यों को जानने के लिए. खोज का एक रास्ता बाहर को जाता है और एक भीतर को. लेकिन आज दोनों अपना मूल खो रहे हैं.

प्रश्न : बाकी सब तो ठीक है लेकिन यह 'धर्म' कौन सा वाला धर्म है; रिलिजन वाला धर्म या फिर 'यदा यदा ही धर्मस्य...' वाला धर्म?

उत्तर : ये धर्म है अपनी मूल प्रकृति तक पहुँचने का.

प्रश्न : कृपया थोड़ा प्रकाश डालें... क्या है हमारी मूल प्रकृति?

उत्तर : हर व्यक्ति जीवन में मुख्य रूप से क्या चाहता है? जो सामान्यतया उसे मृत्यु तक नहीं मिलता. वह जो सामान्यत: नहीं मिलता है उसे पा लेना ही मूल प्रकृति को पा लेना है. बाकी तो जब मिलेगी तब बताऊंगी. :p

प्रश्न : मोनिका जी ऐसे कुछ भी से काम नहीं चलेगा, कृपया विस्तार से बताएं. यह तो टालने वाली बात हो गयी.

उत्तर : धर्म जीवन के समस्त द्वंदों से मुक्त होने का मार्ग है. मनुष्य जिस सुकून की तलाश में जीवन भर भटकता रहता है, उसे पाने का रास्ता. टाला नहीं है. धर्म के बारे में सबसे सही रूप में वही बता सकता है जो इन द्वंदों से पूर्ण रूप से मुक्त हो चुका हो. बाकी कई चीजें लिखती रहती हूँ. पसंदीदा विषय है. आप पढ़ते रहिये. जवाब मिल जायेंगे.

By Monika Jain ‘पंछी’

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