Sunday, March 13, 2016

Poem on Colours in Hindi

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प्रेम : राग और रंगों से परे
 
उठाये थे मैंने रंग
तब जब प्रेम में थी।
प्रेम को रंग रही थी
या भर रही थी रंगों में प्रेम
इसकी ख़बर न थी।
झोंका था खुद को इस कदर
कि जो सृजित हुआ था
मेरी ज्ञात सीमाओं से परे था।
पर तुम्हारी रंगअन्धता?
वह भी तो थी चरम पर!
नहीं देख पायी वह कोई रंग!
नहीं महसूसा उसने कोई समर्पण!
उसने पहले गढ़े और फिर पढ़े
कोरे स्वार्थ के समीकरण!
कि बहुत रोया था उस दिन प्रेम!
बह गए थे सारे रंग!
पर नहीं ओढ़नी है
इन आँखों को कोई रंगअन्धता!
इन्हें चुनना है रंगों से परे
उस पारदर्शिता को
जिसके लिए नहीं खोना पड़ता है प्रेम!
जो हर रंग को पहचान
हो जाती है उससे एकाकार
फिर भी रहती है पूर्णत: निर्लिप्त!
क्योंकि परे है यह राग और रंगों से!
 
By Monika Jain ‘पंछी’
 
How is this poem about love beyond colours and attachment?