Saturday, March 5, 2016

Selfish People Quotes in Hindi

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Selfish Quotes

  • अपने जीवन में समस्यायों का पहाड़ खड़ा हो फिर भी उन्हें भूलकर दूसरों की समस्याएं धैर्य से सुनने की संवेदनशीलता...अपनी क्षमता के अनुरूप उसके लिए जो किया जा सके वह करने का ज़ज्बा. इसके बाद भी बदले में मिलता है आलोचना, शिकायतें और दोषारोपण! क्षमता अनुरूप सहयोग के लिए हम तत्पर रह सकते हैं, लेकिन बेवजह की नौटंकियों को कब तक स्पेस दे सकते हैं? लोगों की बचकानी परेशानियाँ यह कहाँ जानती हैं कि वास्तव में समस्याएं होती क्या है. अपने स्वार्थ और अपेक्षाओं से भरपूर वे दूसरों की परेशानी कहाँ देख सकते हैं? काश! वे समझ पाते कि कोई अपनी समस्यायों का रोना नहीं रोता तो इसका तात्पर्य यह नहीं होता कि उसके जीवन में समस्याएं नहीं. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • जाने कितने उपद्रव शब्दों के उपद्रव हैं. क्योंकि शब्दों की आत्मा तो कभी की खो चुकी है और इन भाव रहित शब्दों को हम अपना अहंकार बना बैठे हैं. कभी ब्राह्मण, जैन, बौद्ध, प्रेम, धर्म, इस्लाम, अहिंसा...जैसे शब्दों के सही अर्थ खोजने निकले तो अहसास होगा कि हम तो इन शब्दों के आसपास भी नहीं फटकते. लेकिन हम जानकार भी अनजान बने रहेंगे क्योंकि सत्य हमारे स्वार्थ को मुश्किल जान पड़ता है. वरना कैसे कोई किसी के मंदिर प्रवेश को निषिद्ध कर सकता है? कैसे कोई मनुष्य या पशुओं के समूह के समूह को बम और तलवारों का ग्रास बना सकता है? कैसे कोई स्त्रियों से धर्म के नाम पर उनकी आत्मा तक छीन सकता है?
    जहाँ स्वार्थ होगा वहां हम हिंसा का विरोध करेंगे लेकिन हम अहिंसा के समर्थक नहीं बन सकते. जहाँ स्वार्थ होगा वहां हम असत्य का विरोध करेंगे लेकिन हम सत्य के समर्थक नहीं बन सकते. जहाँ स्वार्थ होगा वहां हम अनैतिकता, अमानवीयता का विरोध करेंगे लेकिन हम मानव नहीं बन सकते. हम सिर्फ चुनाव करते हैं, अपने-अपने स्वार्थों का चुनाव. और चुन लेते हैं उन-उन शब्दों को जो हमारे स्वार्थ को पोषित करे. ~ Monika Jain ‘पंछी’  
  • मैं ये करूँगा तो मुझे पाप मिलेगा. मैं ये करूँगा तो मुझे पुण्य मिलेगा. ऐसी गणित, ऐसी कैलकुलेशन, ऐसे भाव धर्म नहीं है. यह कोरी सौदेबाजी है. हम स्वर्ग के सपने देखते हैं, 72 हूरों के सपने देखते हैं, प्रतिफल मिलने के सपने देखते हैं, नरक से डरते हैं तो हम पक्के सौदेबाज हैं. हम बिल्कुल वही कर रहे हैं जो हर रोज करते हैं. इसमें धर्म कहाँ से आया? धर्म स्वभाव होना चाहिए...और जब धर्म स्वभाव होता है तो धीरे-धीरे हर जगह हमें आत्म अनुभूति, आत्म दर्शन होने लगते हैं. ऐसे में बेल, बकरी, चींटी, हाथी, घोड़ा, गाय कुछ भी कटे हमें ऐसा लगने लगता है जैसे हमको ही काटा जा रहा है. इसे समानुभूति कहते हैं. या कुछ लोगों की भाषा में सभी में परमात्मा का दर्शन करना यही है. उसमें पाप-पुण्य या प्रतिफल की अवधारणा कहीं नहीं होती. सीधा विशुद्ध रूप तक तो पहुँचा नहीं जा सकता. लेकिन धर्म का रास्ता तो यही है, बाकी सब सौदेबाजी. ~ Monika Jain ‘पंछी'
  •  स्वार्थ के सामने कोई सिद्धांत नहीं टिक सकता. ~ अज्ञात / Unknown

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