Wednesday, March 9, 2016

Story of Diwali in Hindi

Story of Diwali Festival in Hindi for Kids, Children. Short Deepavali Kahani, Deepawali Ka Tyohar Katha, Festival of Lights Tale, Moral Tales, Stories. दिवाली की कहानी, दीपावली का त्यौहार कथा.
 
रोशनपुर की पहली दिवाली
 
दिवाली के कुछ ही दिन बचे थे. हमारे छोटे से कस्बे में सफाई का काम जोरों पर था. कुछ ही दिनों में बच्चों के स्कूल की भी छुट्टियाँ होने वाली थी. रत्ना जो पड़ोस के घरों में झाड़ू-पोचे करती थी, उसी की मदद से मैं भी दिवाली की सफाई में जुटी हुई थी. बच्चों में हमेशा की तरह खासा उत्साह था दिवाली को लेकर. कभी दिवाली पर बनने वाली मिठाईयों की प्लानिंग होती, तो कभी घर के भीतरी और बाहरी डेकोरेशन की, तो कभी इस बार कौन-कौन से और कितने पटाखे छुडायेंगे इसकी.

रत्ना आज अपनी 7-8 साल की बच्ची को भी साथ लेकर आई थी, पर उसने उसे सफाई वाले कमरे में आने से मना कर दिया और बाहर बरामदे में ही बैठकर खेलने के लिए कहा. बच्ची बाहर ही खेलने लगी. मैंने रत्ना से पूछा, ‘अंदर क्यों नहीं आने दिया?’ तो उसने कहा, ‘दीदीजी, उसे दमा है. धूल-मिट्टी उड़ती है तो बहुत खाँसी चलने लगती है. उसे साथ लेकर भी ना आ रही थी पर वह जिद करने लगी तो लाना पड़ा.’
 
रत्ना के यह कहते-कहते ही उसकी बेटी खेलते-खेलते अचानक सफाई वाले कमरे में आ गयी और उसे खांसी चलने लगी. रत्ना को आश्वस्त कर मैं उसे अपने साथ ऊपर वाले कमरे में ले आई. उसे बिस्तर पर बैठाया, पानी पिलाया और फिर उससे बातें करने लगी. तभी मेरे बच्चे श्रुति और श्रेय भी दौड़े-दौड़े वहां आ गए.
 
श्रुति ने रत्ना की बेटी से पूछा, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’

‘कोमल’, वह धीरे से बोली.

थी भी वह एकदम प्यारी और कोमल सी. मैं उसका ध्यान रखने की हिदायत देकर उसे बच्चों के साथ छोड़कर नीचे आ गयी और सफाई का काम देखने लगी.

जब कमरे की सफाई पूरी हो गयी तो रत्ना ने कोमल को आवाज़ लगाई. आज रसोई में भुट्टे सिक रहे थे. मैंने रत्ना को भी कुछ भुट्टे खाने को दिये. उसे अभी और भी घरों में सफाई के लिए जाना था सो मैंने कहा, ‘यही बैठकर खा लो दोनों. फिर तो ठंडे हो जायेंगे.’

रत्ना और कोमल दोनों बरामदे में दीवार के सहारे बैठ गए और भुट्टे खाने लगे. तभी कोमल ने रत्ना से पूछा, ‘माँ, दिवाली के लिए सब इतनी साफ-सफाई क्यों करवाते हैं? कित्ती खांसी चलती है मुझे.’

रत्ना ने उसे इशारे से चुपचाप भुट्टे खाने को कहा.

मैंने रत्ना से कहा, ‘अरे! इसे चुप क्यों करवा रही हो. ऐसे बच्चों के सवालों को टाला नहीं करते.’ ‘कोमल बेटा, क्या पूछना है तुम्हें मुझसे पूछो.’ मैंने कोमल के पास जाकर कहा.

कोमल संकोचवश चुप रही तो मैंने ही उसे बताना शुरू किया, ‘बेटा, सफाई करना बहुत जरुरी है. सफाई रहेगी तो हम कई बीमारियों से बचकर रहेंगे. बल्कि साफ़-सफाई होने के बाद तुझे भी बहुत अच्छा महसूस होगा. हाँ बस जब सफाई हो रही हो और कहीं धूल मिट्टी उड़ रही हो तो तुझे वहां से दूर रहना है. पर सफाई हो जाने के बाद फिर तुझे खांसी नहीं चलेगी, और फिर दिवाली की रात लक्ष्मी माता भी तो हमारे घरों में आती है, तो उनके स्वागत के लिए भी सफाई तो करनी पड़ेगी न.’

कोमल कुछ सोचते हुए बोली, ‘लेकिन आंटीजी, मुझे तो दिवाली वाले दिन भी बहुत ज्यादा खांसी चलती है. माँ मुझे घर से बाहर भी नहीं निकलने देती. मेरा कित्ता मन होता है कि मैं भी नयी-नयी ड्रेस पहनकर सबकी तरह माँ और बापू के साथ रौशनी देखने जाऊं. पर माँ और बापू नहीं ले जाते. कहते हैं डॉक्टर ने मना किया है. मुझे ज्यादा मिठाई भी खाने को नहीं मिलती. मुझसे सांस भी नहीं ली जाती है और खांसी चलती रहती है तो मैं फिर जिद भी नहीं कर पाती, और अगले दिन तो पूरी सड़क पर जले हुए पटाखे ही पटाखे दिखते हैं. कित्ती गन्दी लगती है सड़क. क्या लक्ष्मी माता को भी पटाखे अच्छे लगते हैं? क्या जो पटाखे जलाते हैं वे उन्हीं के घर आती हैं?’

कोमल के मासूम मन ने अपनी सारी जिज्ञासा और शिकायत तो प्रकट कर दी, पर मेरे पास इन बातों का कोई जवाब नहीं था.

रत्ना बोली, ‘ये नासमझ है दीदीजी. अब इसकी किस्मत ही खोटी है तो कोई क्या करे? पटाखे तो सब हमेशा से ही जला रहे हैं. अब एक इसके लिए तो बंद होने से रहे. बस हर दिवाली इसी बात से आँखें भर आती है कि जब सारी दुनिया खुशियाँ मना रही होती है तो मेरी बेटी बिस्तर में पड़े-पड़े खांसती रहती है. जब से थोड़ी समझ आई है इसे तब से एक दिवाली भी नहीं देखी इसने. डॉक्टर ने ज्यादा मिठाई और तली-फली चीजों के लिए भी मना किया है सो वह भी नहीं दे सकती.’ यह कहकर रत्ना तो चली गयी. लेकिन मैं काफी देर तक स्तब्ध सी वहीँ खड़ी रही.

फिर अंदर आकर शाम का डिनर तैयार करने लगी. इसी बीच श्रुति और श्रेय के पापा विकास ऑफिस से घर आ गए. थोड़ी देर में बच्चे और विकास सभी डिनर टेबल पर आ गए. बच्चे अपने पापा को दिनभर की बातें बताने लगे. तभी विकास ने हँसते हुए पूछा, ‘अच्छा, इस बार तुमने अभी तक अपने पटाखों की लिस्ट नहीं पकड़ाई मुझे. लगता है बहुत बड़ी लिस्ट बन रही है इस बार.’ पटाखों का नाम सुनते ही एक बार फिर कोमल का चेहरा सामने आ गया. मैं कुछ कहने ही जा रही थी, तभी श्रेय बोला, ‘नहीं पापा, इस बार हम पटाखे नहीं जलाएंगे.’ ‘हाँ पापा, इस बार हम बिल्कुल पटाखे नहीं जलाएंगे. श्रुति ने श्रेय की बात दोहराते हुए कहा. मैं आश्चर्य से दोनों को देखने लगी और सोचने लगी, ‘क्या ये दोनों वही श्रुति और श्रेय हैं जिनके पटाखों की लिस्ट दिवाली के महीने भर पहले से ही तैयार होने लगती है.’ विकास भी बड़े अचरज से दोनों को देखने लगे. तब श्रुति ने कहा, ‘मम्मा, आज हमने कोमल की सारी बातें सुनी थी. कितनी प्यारी है वह. और हम सब लोगों की वजह से वह अपनी दिवाली भी नहीं मना पाती. हमने तो यह भी तय किया है कि स्कूल में हम सब बच्चों से रिक्वेस्ट करेंगे कि इस बार वे दिवाली पर पटाखे न जलाये.’

‘बहुत अच्छा किया तुमने बच्चों. बल्कि कोमल ही क्या, पटाखों से तो सभी को परेशानी होती है. पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, पर्यावरण, वृद्ध जनों, नवजात बच्चों के साथ-साथ हम सब के लिए पटाखों का विषैला धुआँ और तेज आवाज़ बहुत हानिकारक है. इसलिए तो हर बार मैं तुम्हें कम से कम पटाखे जलाने को कहती हूँ. यूँ तो तुम कभी नहीं सुनते. पर इस बार तो कोमल ने कमाल कर दिया.’ मैंने सबको खाना परोसते हुए कहा.

विकास ने मेरी तरफ देखते हुए विस्मय से पूछा, ‘रश्मि! कोमल और कमाल ये सब क्या है?’ तब मैंने उन्हें सारी बात बताई. हम दोनों को ही बच्चों के इस निर्णय पर बहुत ख़ुशी और गर्व महसूस हो रहा था.

हमारे कस्बे का बस वह एक ही हाई स्कूल था, जहाँ पूरे कस्बे के बच्चे पढ़ने आते थे. प्रार्थना सभा में श्रुति और श्रेय ने सभी को कोमल के बारे में बताया और सभी से रिक्वेस्ट की कि क्या इस बार हम पटाखे न जलाकर दिवाली पर हमारे कस्बे के गरीब लोगो की बस्ती में मिठाई, दीपक, कपड़े आदि बांटने चल सकते हैं ? ताकि कोमल जैसे गरीब परिवार के बच्चे, बीमार और वृद्ध जन सभी मजे से दिवाली मना सके. और फिर दिवाली पर चहकने का हक़ तो पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों का भी बनता है, तो क्यों न इस बार की दिवाली हम सबके लिए ख़ुशनुमा बना दें.’

बच्चों की बात सुनकर सारा स्कूल प्रांगण तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा. सभी शिक्षकों ने उनके इस सराहनीय कदम की भरपूर तारीफ की और सभी ने इस अच्छे कार्य में अपना पूरा-पूरा सहयोग देने का वादा किया.

बच्चों ने अलग-अलग टोलियाँ बनाकर अपने-अपने मोहल्ले से चंदा इकट्ठा किया और दिवाली की सुबह गरीबों की बस्ती में सभी को फल, मिठाइयाँ, कपड़े और दीपक वितरित करने चल पड़े. बच्चों के इस प्रयास की कुछ ऐसी लहर दौड़ी कि इस बार हमारे कस्बे में एक भी पटाखा नहीं छोड़ा गया.

कोमल शाम को अपनी माँ के साथ हम सबको दिवाली की शुभकामनाएँ देने आई. उसके चमक धमक वाले कपड़े और उसकी खिलखिलाती मुस्कुराहट देखकर ऐसा लगा जैसे उसकी तरह हम सबने भी दिवाली पहली बार ही मनाई है.
 
By Monika Jain ‘पंछी’
 
 
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