Tuesday, March 8, 2016

Women Empowerment Essay in Hindi

Women Empowerment Essay in Hindi. Mahila Sashaktikaran par Nibandh, Empowering Female Article, Nari Mukti Speech, Women Power Paragraph, Freedom Speech, Azadi. महिला सशक्तिकरण पर निबंध, नारी मुक्ति.


बस इतनी सी आज़ादी...दोगे?

उपरोक्त फेसबुक पोस्ट पर आये कुछ सवालों के जवाब :
 
जिन्होंने यह कहा कि आज़ादी मांगी नहीं जा सकती, वह लेनी/छीननी पड़ती है...या जिन्होंने यह कहा कि आज़ादी भीतर होती है.
  • बेशक! वास्तविक और पूर्ण आज़ादी भीतर ही है...बाहर कहीं भी नहीं. और इस पूर्णता या आज़ादी के लिए स्त्री और पुरुष क्या...हर एक भेद से ऊपर उठना होता है...और वह प्रकृति के विरुद्ध जाना नहीं, अपनी वास्तविक प्रकृति पाना ही है. लेकिन उस पूर्णता को प्राप्त करने से बहुत पहले और उस पूर्णता को प्राप्त करने के लिए भी भीतर के साथ-साथ बाहर एक अनुकूल माहौल की जरुरत होती है. उस अनुकूल माहौल को माँगना बस सहयोग माँगना है. हम सब आपस में इतने सम्बंधित हैं कि यह अनुकूल माहौल छीना नहीं जा सकता...सहयोग से ही बनाया जा सकता है.
 
जिन्होंने यह कहा कि यह भूलना भी क्यों चाहिए कि तुम स्त्री हो...या जिन्होंने यह कहा कि आप पुरुष बनना चाहती हैं.
  • सबसे पहले तो यह कि हर पुरुष में एक स्त्री और हर स्त्री में एक पुरुष पहले से ही विद्यमान है. यही वजह है कि पूर्णता भीतर की चीज है बाहर की नहीं. पर उस पूर्णता से पहले जब मैं यह कहती हूँ कि मैं हमेशा यह याद नहीं रखना चाहती कि मैं स्त्री हूँ तो मैं प्रकृति द्वारा एक स्त्री को प्रदत्त भिन्नताओं को नकारने की बात नहीं कह रही. एक पुरुष और स्त्री के स्वाभाविक आकर्षण को नकारने की बात भी नहीं कह रही. कुछ मर्यादाएं और शालीनताएँ जो समय के अनुरूप एक सुव्यवस्था के लिए जरुरी है (दोनों ओर से) उन्हें भुलाने की बात भी नहीं कह रही. मैं बस उन जबरन बनायी सीमाओं की बात कह रही हूँ जो एक स्त्री में सिर्फ स्त्री होने की वजह से भय उत्पन्न करती है. जहाँ वह चलते समय, कुछ बोलते समय, किसी शुरुआत से पहले, किसी निर्णय से पहले...या कई सारे मुद्दों पर सिर्फ इसलिए रुक जाती है या डर जाती है कि वह तो स्त्री है. उसे डर है कि प्रेम में उसने पहल की तो वह चरित्रहीन सिद्ध हो जायेगी. उसे डर है कि वह अकेले या असमय बाहर निकली तो कोई इज्जत नाम की चीज लुट सकती है. और भी ढेर सारी बातें. 
  • याद करती हूँ उन दिनों को जब बहुत ज्यादा अंतर्मुखी और निर्दोष होने की वजह से दुनिया से बेखबर थी. घर से दूर भी रात के 9-10 बजे जरुरी काम होने पर अकेले बाहर निकल जाती थी. रात के 3-4 बजे तक अकेले छत पर बेख़ौफ़ पढ़ती रहती थी. कुछ महीनों तक रात 7-9 बजे की एक ऐसी क्लास में थी जहाँ पर मैं अकेली लड़की और बाकी सारे लड़के थे...पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मुझे पढ़ना था. एग्जाम टाइम में प्रैक्टिकल सब्जेक्ट्स समझाने के लिए पूरी रात लड़कों के साथ बैठकर पढ़ाया है. बस इतना चाहती हूँ कि आज भी और आगे भी वैसी ही रह सकूँ. मैंने यह तो कहा ही नहीं कि सब पुरुष एक से हैं...न ही यह कहा कि लड़कियों को कुछ समझने और बदलने की जरुरत नहीं. मैंने सिर्फ सहयोग की बात की है जो लड़के और लड़कियों सभी की ओर से अपेक्षित है.
 
जिन्होंने ममता, करुणा, क्षमा, सहनशीलता आदि स्त्री गुणों की बात की.
  • अपनी कई कमियों को स्वीकारते हुए इन गुणों की पूरजोर समर्थक हूँ. यहाँ सड़क पर दौड़ते पिल्लों के लिए भी ममता उमड़ पड़ती है. मौसी और बुआ कहने वाले बच्चे अचानक से मम्मा भी कह चुके हैं. बच्चों को हाथों से खाना खिलाना, उनके साथ खेलना, उन्हें कहानियां सुनाना, उनका ख़याल रखना सब बहुत पसंद है. करुणा के आड़े पशु जगत, मानव जगत, धर्म, जाति, लिंग ये सब सीमायें नहीं आती. लेकिन ये ऐसे गुण हैं जो सिर्फ स्त्री के लिए नहीं सबके लिए हैं. इन्हें सिर्फ स्त्री से बांधकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता. जब मैं कहती हूँ कि मैं हमेशा याद नहीं रखना चाहती कि मैं स्त्री हूँ तो समझिये कि मैं सबमें इन्हीं गुणों के विकास की बात कहती हूँ.

By Monika Jain ‘पंछी’