Friday, April 29, 2016

Poem on Ant in Hindi

Poem on Ant in Hindi for Kids. Cheenti par Kavita, Insects Rhymes, Chinti, Emmet, Burrow, Ants, Animal Welfare Poetry, Abhay Daan Slogans, Jeev Daya Lines, Shayari. चींटी पर कविता, अभय दान, जीव दया.

शरण
 
रसोई में कुछ करते हुए
अचानक पाँव पर हुई
तेज, असहनीय,
कंटीली चुभन!


मन ने उस क्षण के
छोटे से हिस्से में
दर्द के अहसास और
चींटी के अनुमान से लेकर
उसे तेजी से हटा देने को
बढ़ा दिए थे हाथ
बन उसका कफ़न!


पर समीप पहुंचकर अचानक
ठिठक गया मेरा हाथ!
सोचा यह कुछ अन्याय होगा
उस अबोध के साथ!


उजाले में जाकर उसे
हल्के हाथ से हटाया,
और फिर थोड़ा
अपने पाँव को सहलाया।


इतनी सी गलती की सजा
नहीं हो सकती न
किसी के जीवन का वरण!
संभव हो जितना भी
मिले सबको ही शरण!

By Monika Jain ‘पंछी’


Thursday, April 28, 2016

Thinking Quotes in Hindi.

Thinking Quotes in Hindi. Soch Vichar Sms, Idea, Mind Messages, Views, Chintan Status, Consideration Quotations, Concern Thoughts, Opinion Slogans, Notion Sayings, Suvichar. सोच, विचार, चिंतन मनन.
 
Thinking Quotes

  • शब्द, विचार और भाव इतने ज्यादा सापेक्ष हैं कि जो सन्दर्भ न समझा तो सब मिथ्या हो जाता है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • किसी से आपका एक विचार मिलता है, अच्छी बात! दूसरा भी मिलता है, और भी अच्छी बात! तीसरा भी मिलता है, कुछ ज्यादा ही अच्छी बात! पर चौथा भी मिलना ही चाहिए यह अपेक्षा ज्यादती है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • छोटी-छोटी सी बातों पर दंगे क्यों भड़क जाते हैं? विचार संक्रमण इसका मुख्य कारण है. जब विचारों, मन और आवेशों पर नियंत्रण ना हो, सतर्कता और जागरूकता की अनुपस्थिति हो तो ऐसे में किसी नकारात्मक विचार का आग की तरह फैलना और सब कुछ तबाह कर देना संभव है. यह वही भीड़ होती है जो किसी प्राकृतिक आपदा के समय धर्म, जाति सब कुछ भूलकर मदद भी करती है क्योंकि तब सकारात्मक विचारों का संक्रमण होता है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • लोग अक्सर द्वैत के बारे में विचार करते हैं. जबकि 'कुछ होने' से 'कुछ न होने' तक का सफ़र बहुत लम्बा है. किसी क्षण कोई बीच रास्ते में कहीं पर भी हो सकता है, जहाँ प्रगमन और प्रतिगमन दोनों ही संभावनाएं हैं. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • तुम्हारा दृष्टिकोण तुम्हारे बारे में बहुत कुछ बता देता है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • जब तक कुछ भी नया पढ़कर और जानकर हमारी सोच बेहतर न बनें और चीजों को देखने और समझने का नजरिया विस्तृत न हो, तब तक हमने कुछ नया जाना और सीखा नहीं है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • सोचना आसान होता है. काम करना कठिन होता है, लेकिन दुनिया में सबसे कठिन काम अपनी सोच के अनुसार काम करना होता है. ~ Johann Wolfgang Goethe / जॉन वोल्फगेंग गोएथ 
  • जहाँ सभी की सोच एक ही जैसी हो तो समझ लें कि कोई भी ज्यादा सोच ही नहीं रहा. ~ डबल्यू. लिफमैन 
  • सोच विचार से जीवन प्राय: नीरस हो जाता है. हमें कर्म ज्यादा, सोचना विचारना कम और जीवन को अपने सामने से गुजरते हुए देखना बंद करना चाहिए. ~ चेमफोर्ट  
  • विचार ही कार्य का मूल है. विचार गया तो कार्य गया ही समझो. ~ महात्मा गाँधी / Mahatma Gandhi  
  • यदि तुम एक बात बोलने से पूर्व दो बार सोच लेते हो तो तुम अच्छा बोलोगे. ~ विलियम पेन / William Penn  
  • सोचो चाहे जो कुछ, कहो वही जो तुम्हें कहना चाहिए. ~ फ़्रांसिसी कहावत  
  • अपने विचारों के प्रति सतर्क रहें, वे किसी भी क्षण बन सकते हैं. ~ आयरा गैसेन 
  • एक क्रियान्वित विचार तीन अधूरे विचारों से कहीं बेहतर है. ~ जेम्स लाइटर / Gems Lighter  
  • किसी काम को करने से पहले बहुत देर तक सोचते रहना अक्सर उसके बिगड़ने की वजह बनता है. ~ ईवा यंग / Eva Young  
  • सुविचारों से सुफल उपजते हैं और कुविचारों से कुफल. ~ जेम्स एलन / James Allen  
  • मनुष्य जैसा आहार या पान करता है वैसे ही उसके आचार एवं विचारों का निर्माण होता है. ~ अज्ञात / Unknown  
  • वह व्यक्ति जो दूसरों को राय देते समय अपने कान बंद कर लेता है, उसे अपने खुद के विचारों की अखंडता में कम यकीन होता है. ~ विलियम कॉग्रीव / William Congreve 
  • विचारशील व्यक्ति हर जगह सम्मान पाता है. ~ सोफोक्लेस / Sophocles
 
How are these quotes about thinking?
 
 

Saturday, April 23, 2016

Essay on Respect in Hindi

Essay on Respect in Hindi. Samman Apmaan par Nibandh. Respecting Self Others Article. Give and Take Honor, Regard, Value, Insult, Disgrace, Humiliation, Speech, Paragraph. आदर सम्मान पर निबंध, अपमान.
 
सम्मान मांगता है सम्मान...
 
सामान्यतया मेरा किसी के प्रति सम्मान उसके पद, ओहदे, यश, डिग्री, ख्याति, रूप, रंग आदि का मोहताज नहीं है. हाँ यह उसके कुछ विशेष आंतरिक गुणों-अवगुणों और निर्दोषिता-दोष से प्रभावित जरुर हो सकता है. और अगर बात आदर्श की हो तो सम्मान सिर्फ व्यक्तियों का नहीं, सिर्फ प्राणियों का नहीं बल्कि वस्तुओं का भी होना चाहिए. इसके अलावा कोई भी आपका अपमान तब तक नहीं कर सकता जब तक आप उस अपमान को स्वीकार न करें.
 
लेकिन आदर्शों से नीचे जब-जब हम सांसारिक लेनदेन में सक्रिय होते हैं, तब अगर हम सम्मान चाहते हैं तो सबसे पहले हमें सम्मान देना भी आना चाहिए. और काश! कि सम्मान सिर्फ शब्दों का मोहताज होता. सम्मान तो भावना, वाणी, कर्म हर स्तर पर कार्य करता है.
 
  • जब आप किसी के आपके प्रति प्रेम, चिंता और संवेदनशीलता की पूर्ण उपेक्षा करके अपने दोस्तों के साथ लगायी गयी शर्तों और उनके सामने अपनी छवि विशेष को बनाये रखने को अधिक महत्व देते हैं. 
  • जब आप किसी और की गलती की सजा किसी और को देते हैं. 
  • जब आप स्नेहवश या जबरन किसी को कोई वस्तु दें और बाद में अहंकार वश यह घोषित करें की आपने दान दिया है. 
  • जब आपके शक और संदेह के दायरे में किसी को बार-बार अपनी विश्वसनीयता, सच्चाई और ईमानदारी का प्रमाण देना पड़े. 
  • जब आप अपने अंधविश्वासों के चलते अपने साथ हुई हर बुरी घटना के लिए किसी निर्दोष को जिम्मेदार समझने लगते हैं (प्रकट या अप्रकट रूप में). और उससे अछूतों से भी बदतर बर्ताव करते हैं. 
  • जब आप अति सम्मानजनक, आलंकारिक शब्दों और असुर पात्रों के नाम का प्रयोग व्यंग्य बाण छोड़ने और किसी को नीचा दिखाने के लिए करते हैं. 
  • प्रेम को भले ही प्रेम का प्रतिदान न मिले लेकिन वह स्वीकृति और सम्मान तो चाहता ही है. जब आप किसी के प्रेम को सम्मान न देकर अपने इतिहास और भविष्य के प्रेम में ही खोये रहकर बार-बार उसे उपेक्षित महसूस करवाएं. 
  • जब कोई आपसे इन सब चीजों की वजह से उपजे गहरे तनाव से बाहर निकलने के लिए थोड़ी सी मदद चाहता हो, जहाँ प्रश्न उसके जीवन और मृत्यु तक का हो, तब भी आप असंवेदनशील बने रहें. 
  • किसी की मजबूरियों को समझे बिना, पूरा सच क्या है यह जाने बिना, आप किसी की रचनात्मकता पर भावनाओं के दोहन का दोषारोपण करते हैं (तब जबकि भावनाएं भी उसकी स्वयं की है). उसकी हर अच्छी बात, उसके प्रेम और समर्पण सबको नजरंदाज कर सिर्फ उसमें दोष ही दोष ढूंढते हैं. 
  • स्वयं को आप जिसके किसी कार्य की प्रेरणा समझते हैं, निष्पक्ष होकर विचार करने पर पायेंगे कि उसमें भी आपको बहुत कुछ प्रेरणादायक मिला ही होगा. फिर भी आप उसे कोसते हैं, नीचा दिखाते हैं, हीन महसूस करवाते हैं. 
  • जब आधे सच को प्रकट करते हुए आप बार-बार किसी का विश्वास तोड़ते हैं, कभी किसी की ईर्ष्या से बचने के लिए तो कभी अपने अहम् और मनोरंजन के लिए. 
  • और इन सारे अपमानों को नजरंदाज करके भी कोई सुलह चाहता हो, अपनी गलतियों की क्षमा मांगता हो, थोड़ी सी समझ, विश्वास, समय और सहयोग चाहता हो, पर आप पत्थर से भी अधिक कठोर बन जाएँ. 
  • और भी ढेर सारी बातें जो फ़िलहाल स्मृतियों से बाहर है…                                             
जब आप यह सब करते हैं तब आप सम्मान/अपमान क्या कर रहे होते हैं...फुर्सत में सोचियेगा. इसके बाद भी अगर आप यह अपेक्षा करें कि आपको सम्मान मिलना चाहिए, आपको कोई कुछ भी न कहे...तब तो आप अद्भुत हैं.

अगर मानना चाहें तो सम्मान और अपमान की सीमायें बहुत विशाल है, और अगर न माने तो सम्मान और अपमान जैसा कुछ होता ही नहीं. बाकी कोई व्यक्ति जो सामान्यतया राह में चलते कीड़ों-मकोड़ों और वस्तुओं के प्रति भी सम्मान रखता है. जो अपने घर के बाहर कुछ खाने या पहनने को मांगने आये गरीब बच्चों और लोगों से भी ससम्मान आचरण करता हो, वह उसका अपमान क्यों करेगा, जिससे वह उस समय भावनात्मक रूप से इतना जुड़ा हुआ हो. यह भी विचारणीय है. फिर भी आपको ससम्मान धन्यवाद!

By Monika Jain ‘पंछी’


Thursday, April 21, 2016

Essay on Ego in Hindi

Essay on Ego in Hindi. Ahankar par Nibandh, Egotism Paragraph, Narcissism Article, Possession, International, World Justice Day, Social Injustice, Nyay Anyay Lekh. अहंकार पर निबंध, सामाजिक न्याय लेख.

असल न्याय...प्रकृति के हिस्से है

अहंकार श्रेय नहीं देता...वह सब कुछ अधीन कर लेना चाहता है.”
 
इस पंक्ति को लिखते समय न जाने कितने चेहरे आँखों के सामने से गुजर गए. उसमें से एक चेहरा था बचपन में स्कूल की एक अध्यापिका का. स्कूल के समय में पढ़ाई के साथ-साथ अन्य साहित्यिक गतिविधियों में भी मैं बहुत सक्रीय थी. पंचायत, जिला, राज्य एवं विविध स्तरों पर होने वाली प्रतियोगिताओं की जानकारी बच्चों तक पहुँचाने का कार्य उन्हीं अध्यापिका का था.
 
विषय पता चलने के बाद मैं दिन-रात मेहनत करके घर पर रखी कुछ पत्रिकाओं, किताबों और मन से डिबेट, निबंध, भाषण, कविता, पेपर रीडिंग या जो भी कोई प्रतियोगिता होती उसका कंटेंट तैयार करती थी. प्रतियोगिता का परिणाम लगभग हमेशा प्रथम रहता था. जिसकी सूचना इस तरह मिलती थी कि वह अध्यापिका सारे स्कूल के हर एक क्लास, प्रिंसिपल रूम, स्टाफ रूम सबमें घूम-घूमकर फूली न समाती हुई कहती कि मोनिका का फलां प्रतियोगिता में प्रथम स्थान आया है और उसे सारी की सारी तैयारी मैंने ही करवाई थी. उनका अपने ’मैं’ पर इतना जोर होता था कि मेरा ’मैं’ गौण हो जाता था :). ऐसा कई बार हुआ. जिस क्लास में मैं खुद बैठी होती थी वहां भी यह सूचना मुझ तक ऐसे ही पहुँचती थी, बल्कि उन्होंने तैयारी करवाई इस बात पर मेरा समर्थन भी ले लिया जाता. टीचर्स के प्रति सम्मान, उस स्कूल के माहौल का डर और मेरी अंतर्मुखता इस बात की इजाजत नहीं देती थी कि मैं कुछ विरोध में कहूँ.
 
पक्षपात को पोषण भी अहंकार से ही मिलता है. यह पक्षपात जाति पर आधारित हो सकता है, संबंधों पर आधारित हो सकता है, या कोई भी अन्य आधार हो सकता है. उस समय मैं 10th क्लास में थी और वे अध्यापिका 12th क्लास की क्लास टीचर थी. जिसकी कुछ छात्राओं से उनका विशेष लगाव था. तब जिला स्तरीय टूर्नामेंट में एक निबंध प्रतियोगिता की सूचना आई थी. उन अध्यापिका ने मुझसे कंटेंट तैयार करके लाने को कहा. कई दिनों की मेहनत के बाद मैं 30-40 पृष्ठों का एक निबंध तैयार करके ले गयी. उन्होंने मुझसे वह ले लिया और एक दो दिन बाद मुझे स्टाफ रूम में बुलाया जहाँ 12th क्लास की वे छात्राएं भी थीं. उनकी ओर इशारा करके उन अध्यापिका ने मुझे कहा कि इन लड़कियों का आखिरी साल है इस स्कूल में इसलिए इन्हें प्रतियोगिता में भेज देते हैं. ( हालाँकि मेरा भी आखिरी साल ही था उस स्कूल में...क्योंकि वहां मेरे सब्जेक्ट्स थे नहीं, लेकिन उन अध्यापिका के अनुसार मुझे और भी अवसर मिलेंगे. ) और यह कहकर वह निबंध जो मुझसे तैयार करवाया गया था उन्हें दे दिया गया. मैं चुपचाप क्लास में चली आई थी. लेकिन घर आकर बहुत रोई थी. उस समय न तो इतना बड़प्पन था कि ख़ुशी-ख़ुशी यह स्वीकार कर पाती और न ही इतना साहस कि विरोध कर पाती.
 
अगले साल स्कूल बदल गया था. नया स्कूल कोएड था और वहां बहुत स्वतंत्रता थी. लेकिन फिर भी हर विद्यालय में कुछ अध्यापक ऐसे होते ही हैं जो अपनी मान्यताओं, स्वार्थ, अहंकार और ईर्ष्या के सामने प्रतिभा का सम्मान नहीं करते. मुझे नहीं पता यह सही था या गलत लेकिन 6th क्लास से लेकर 11th क्लास तक हर साल बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड जिसमें मेरा नाम मेजोरिटी से फाइनल होता था वहां किसी एक या दो अध्यापकों के हस्तक्षेप की वजह से वह आखिरी क्लास (12th) के बच्चों को दे दिया जाता था.
 
इसी तरह जीवन कई सारे पक्षपातों का साक्षी रहा है. बहुत कुछ खोया है लेकिन मेहनत के बल पर बहुत कुछ पाया भी है. पर मन बस अब इस खोने और पाने से बहुत ऊपर उठ जाना चाहता है. कभी-कभी कुछ मामलों में अन्याय जैसा लगता था लेकिन अब समझ चुकी हूँ कि सामान्यत: मनुष्य अहंकार और इससे जनित पक्षपात, पूर्वाग्रहों, ईर्ष्या, द्वेष, मोह आदि से युक्त होता ही है. बस मात्रा और आधार अलग-अलग होते हैं. और इसी वजह से मनुष्यों द्वारा न्याय जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. इसके अलावा जीवन ऐसा है कि किसी एक के साथ भी किसी आधार पर न्याय किया जाएगा तो वह किसी और के साथ किसी अन्य आधार पर अन्याय हो ही जाएगा. इसका आशय यह नहीं कि गलत के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाई जाए. जहाँ जरुरी है वहां उठाई ही जानी चाहिए. कई बार उठाती भी हूँ, कई बार नहीं भी...जब लगता है कि शांति बड़ी चीज है. हमें कब क्या करना है यह प्रश्न सही और गलत के साथ-साथ सजगता, कर्तव्य और जिम्मेदारी का भी है. बाकी असल न्याय प्रकृति के हिस्से है और उसी के हिस्से रहेगा. और यह केवल वह प्रकृति नहीं जो बाहर है, यह वह प्रकृति भी है जो प्रारब्ध, संचित कर्मों और प्रवृत्तियों के रूप में हमारे भीतर है. यह वह प्रकृति है जो सर्वत्र है.
 
By Monika Jain ‘पंछी’

How is this memoir about ego and justice?

Wednesday, April 20, 2016

Happy Birthday Poem in Hindi

Happy Birthday Kids Poem in Hindi. Janamdin ki Badhai Kavita, Friends Bday Wishes Poetry, Janam Diwas Shubhkamnaye Shayari, Rhymes, Lines, Messages. जन्मदिन की शुभकामनाएं कविता, जन्मदिवस बधाई शायरी.

जन्मदिन मनाएं
 
तेरे सपने सच हो जाए
खुशियाँ पलकों पर सज जाए
मुस्कान तेरे होठों पर छाये
बार-बार ये दिन आए।

रोशन हर दिन तेरा हो 
दूर-दूर तक उजेरा हो 
आशाओं का डेरा हो
हर पल नया सवेरा हो।
 
सूरज उजियारा ले आए
फूल, तितलियाँ, भंवरे गाएँ
मिलकर तेरा जन्मदिन मनाएँ।

By Monika Jain 'पंछी'

How is this birthday poem for kids? 
 

Sunday, April 17, 2016

Essay on Emotions in Hindi

Essay on Managing Emotions in Hindi. Mood Awareness, Mind Consciousness, Strong Feelings, Emotional Thoughts, Sense, Bhavna, Bhav, Thinking, Vichar, Wish, Chetna. भाव भावना, विचार, चेतना, होश, सजगता.
 
विचार/ भाव कर्म हैं
 
“तुम्हारा मुझे इतने दिनों बाद अचानक कुछ लिख भेजना अनायास ही न था। कुछ ही देर पहले मन की गहराईयों ने तुम्हें याद किया था।”
 
इस स्टेटस को लिखते हुए मन की असीम क्षमताओं को परिचित करवाते न जाने कितने चल-चित्र आँखों से गुजर गए । बिना एक शब्द कहे विचारों और भावनाओं के सम्प्रेषण के अनगनित उदाहरणों का यह मन साक्षी रहा है.

जैसे कुछ ही दिनों पहले एक घटना हुई. कई महीनों पहले एक पोस्ट पर मुझसे काफी बड़े एक फेसबुक मित्र से किसी विचार के न मिलने पर हुई एक चर्चा पर शायद कोई बात उन्हें हर्ट कर गयी (हालाँकि अपनी बात मर्यादित तरीके से ही रखती हूँ ) और वे अनफ्रेंड करके चले गए. उस पोस्ट पर उनके कमेंट्स जिस तरह थे पढ़कर थोड़ा बुरा मुझे भी लगा था क्योंकि हमेशा उनके कमेंट्स बहुत विनम्र भाषा में होते थे...और उनके कमेंट्स से उनका विशेष स्नेह झलकता था. वे अमित्र करके चले गए, मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की. लेकिन कुछ दिनों से 'on this day' वाली पोस्ट्स में उनके पुराने बहुत प्रेरणादायक कमेंट्स देखे तो सोच रही थी कि हम मनुष्य कितनी छोटी-छोटी बातों पर गलतफहमियां और अहंकार पाल कर बैठ जाते हैं और जो अच्छा होता है उसे भूल जाते हैं.

खुद पर भी गुस्सा आया कि मुझे तर्क-वितर्क में पड़ने की जरुरत ही क्या थी. ये जरुरी तो नहीं कि किसी बात पर विचार न मिले तो अपनी बात को सही सिद्ध करने की कोशिश की ही जाए. गलत कौन था और कौन नहीं ये बातें हमेशा मायने नहीं रखती. मायने रखती है वह सहज अनुभूति जो हम सभी को आपस में जोड़ती है. और फिर जब अच्छा सोचने के लिए इतनी सारी बातें हों तो फिर किसी छोटी सी बात का बुरा माना ही क्यों जाए. यह सब एक-दो दिन पहले सोचा ही था कि अगले दिन होली पर उनका शुभकामनाओं का मेसेज आ गया. यह बिल्कुल अप्रत्याशित था. जिस तरह से वह गए थे, जीवन में फिर कभी कोई बात होने के आसार न लगते थे. लेकिन भाव कितने सशक्त होते हैं यह इसका एक उदाहरण था. इसलिए हमारी कोशिश यह रहे कि हम अपने भावों और विचारों को हमेशा अच्छा रखें.

दुनिया की समस्त समस्यायों का कारण और समाधान हमारे भाव और विचार ही हैं जो कर्म बनते हैं...और बिना बाहरी कर्म बने भी बहुत गहरा प्रभाव डालते हैं. क्योंकि भाव अपने आप में एक कर्म है. और चर्चा करते समय जो विजयी ही होने का भाव अनायास ही हमारे मन में चला आता है बडा ही तुच्छ है, उस भाव के सामने जिसे ‘स्वीकार’ कहते हैं. एक बार कहीं पढ़ा था कि आन्दोलन और क्रांतियाँ अक्सर सूर्य/ग्रहों से संचालित होती है. मनुष्य के विचारों और भावों पर भी प्रकृति का बहुत प्रभाव होता है. एक नियमित समय के बाद व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही स्तर पर घटनाओं का दोहराव होता है. ऐसे में सिर्फ वहीँ व्यक्ति काल चक्र और प्रारब्ध के प्रभाव में अनायास बहने से खुद को बचा सकते हैं जो हमेशा सजग रहे. मुक्ति का द्वार भी सिर्फ उन्हीं के लिए होता है.

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this article about emotions and feelings and their effects? 
 
 

Friday, April 15, 2016

Funny Childhood Memories in Hindi

Funny Childhood Real Life Incidents in Hindi. Funniest Kids Memories, Interesting Laughter Stories, Hilarious Comedy, Humorous, Laughing, Humor Jokes, Bachpan ki Yaadein, Kahaniyan. बचपन की कहानियाँ.
 
मेरे हिस्से...कुछ बेवकूफ किस्से...
 
(1)
 
मैं...कुम्भकर्ण की नानी

बात तब की है जब मैं छोटी बच्ची थी। अपनी कुम्भकर्णी नींद की वजह से मुझे घर में 'कुम्भकर्ण की नानी' कहकर बुलाया जाता था। बड़े भैया ने दिया था यह नाम! कुम्भकर्ण की तरह बहुत देर तक तो नहीं सोती थी, लेकिन हाँ नींद इतनी गहरी होती थी कि रात में कोई चोर जिस कमरे में मैं सोयी हूँ उसमें चोरी करके चला जाए तो भी मुझे कुछ पता न चले। कभी-कभी जल्दी सो जाने पर माँ नींद में उठाकर कुछ खिला देती...पर मुझे याद नहीं रहता। गर्मियों में छत पर सोते समय बारिश आ जाने पर कब और कैसे ऊपर से नीचे पहुँच जाती थी, वह भी याद नहीं रहता था। आसपास सोने वाले भाई बहन कहते थे मैं नींद में उन्हें लात मारती थी। :p कभी-कभी नींद में कुछ बोल भी जाती थी। शुक्र है कि नींद में चलने की आदत नहीं थी। :D

हाँ तो मेरी कुम्भकर्णी नींद के ही बचपन के दिनों में एक रात मुझे भयंकर प्यास लगी और नींद खुल गयी। यह अपवादजनक मामला था। सामान्यतया सोने के बाद सीधा सुबह ही उठती थी। तो उस दिन बहुत तेज प्यास लग रही थी। सोने की जगह के ऊपर झरोखे में एक बोतल रखी थी। नींद में इतना दिमाग नहीं लगाया कि इसमें पानी नहीं रखा है। पानी तो रसोई में है। मैंने बस उसे उठाया और पीने लगी। उसके बाद 2-3 घंटे तक उल्टियाँ होती रही, क्योंकि उस बोतल में तिल का तेल था। :p

(2)

जीवात्मा की सैर और मेरी खैर...

एक छोटे से कस्बे के अपने छुटपने के दिनों में एक दिन मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी। थोड़ा लेट हो गयी थी। मैं लेसेस वाले जूते पहनती थी। उस दिन हर रोज की तरह उन्हें उल्टा करके झाड़ने की बजाय सीधे ही पहन लिया और स्कूल के लिए रवाना हो गयी। वो बारिश के दिन थे, हमारा पुराना घर खुला-खुला था और वह एरिया कभी किसी समय शायद फार्मिंग लैंड रहा था, इसलिए छोटे-छोटे जीव-जंतु आ जाया करते थे.

जूते पहनने के बाद मुझे एक जूते में कुछ मुलायम और गुदगुदा सा महसूस हो रहा था। मुझे लगा जल्दी-जल्दी पहने हैं तो हो सकता है कुछ फंसा रह गया होगा और ऐसा सोचकर इग्नोर कर मैं चलती रही। चलते-चलते स्कूल में पहुँच गयी और प्रेयर की घंटी के बाद हम सब प्रेयर में बैठ गए। अब जब मैं शांत हो गयी थी तब जूते में फंसी उस चीज की हलचल शुरू हो गयी, और कुछ ही देर में मुझे समझते देर न लगी कि मैं अपने जूते में किस जीवात्मा को उठाकर ले आई हूँ।

दिल की धड़कने थोड़ी बढ़ गयी थी, थोड़ा सा डर भी लग रहा था, लेकिन मैंने अपने आपको संयत रखा और चुपचाप आँखें बंद किये प्रेयर करती रही। फिर प्रार्थना खत्म होने के बाद जब समाचार, कहानी, आदर्श वाक्य आदि का रोजाना वाला दौर चल रहा था तो मैंने धीरे से अपना जूता खोला उसे हल्का सा झटका ताकि अंदर जो भी आत्मा जा बैठी है वह बाहर निकल जाए। लेकिन उस जीवात्मा को मेरा जूता बहुत पसंद आ गया था सो वह वही जमी रही। (हालाँकि उस जीवात्मा का क्या हाल रहा होगा, यह तो वही जाने। :p )

अब बिना जीवात्मा के निकले वापस उस जूते को पहनना निश्चित ही बहुत बहादूरी वाला काम था और मुझे वह करना ही था। पाँव में बहुत अजीब सा महसूस हो रहा था। हम सब 1 घंटे के प्रार्थना सभा के कार्यक्रम के बाद कतार से अपनी-अपनी क्लास में पहुंचे। मैं तुरंत अपनी सीट पर पहुंची और नीचे झुककर अपना जूता उतारा। फिर उसे एक-दो बार उल्टा कर झटका। वह जीव बाहर नहीं आया तो तीसरी बार मैंने जूते को बहुत तेज से पटका। हमारा क्लासरूम थियेटर की तरह सीढ़ीनुमा था। फाइनली कुछ बाहर निकला और उछलते कूदते पीछे की सीढ़ियों पे चला गया। और मैंने पूरे 1½ घंटे बाद चैन की सांस ली। उसके बाद पहला पीरियड शुरू होने के बाद जब मैं और सब सामने खड़ी टीचर को ध्यान से सुन रहे थे तब पीछे का पूरा चक्कर लगाकर वापस आगे आये एक छोटे से मेढंक महाशय ब्लैकबोर्ड के पास की जमीन पर उछलते कूदते दिखे। मैं मन ही मन मुस्कुराई। एक लम्बी कैद के बाद उसने भी तो जन्नत पायी थी और शायद जीवन में पहली बार इस तरह की भयानक सैर भी की होगी। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे ख़ास बात यह रही कि किसी को भी कुछ भी पता नहीं चला...न मेरे चेहरे से और न ही मेरी हरकतों से। :p :)

By Monika Jain ‘पंछी’

How are these funny memories of childhood?


Thursday, April 14, 2016

Poem on Relationship in Hindi

Poem on Relationship in Hindi. Rishta Kavita, Baby Friendship Lines, Soured Relation Poetry, Kids Love Shayari, Children Rhymes, Bitter Sms, Bitterness Quotes, Status. रिश्ता शायरी, रिश्ते कविता.

एक अनबना रिश्ता...
 
बनते-बनते रह गया। 
एक तीखी सी कड़वाहट, 
न आते-आते आ गयी।
 
मैं चाहती थी तुम्हें देखकर 
हमेशा कुछ यूँ मुस्कुराना... 
जैसे एक नन्हा बच्चा मुस्कुराता है 
अपने सामने बैठे 
दूसरे नन्हें को देखकर!

मैं चाहती थी तुम्हें देखकर 
यूँ शर्माना और छिप जाना... 
जैसे शर्माती है गुड़िया 
अरसे बाद मिलने आये 
किसी जाने-पहचाने 
अजनबी चेहरे को देखकर!
 
मैं छूना चाहती थी तुम्हें
बिल्कुल वैसे ही... 
जैसे छूता है कोई बच्चा 
सामने बैठे दूसरे बच्चे को 
बड़े कुतूहल और प्यार से!

जानकर उसे अपना ही प्रतिबिम्ब
वह आता है उसके निकट 
बड़ी ही उत्सुकता 
और दुलार से!

फिर दोनों हाथों से अपने मुंह को दबाये 
भरता है एक मीठी सी किलकारी! 
जैसे मिल गयी हो उसे 
इस ज़माने की खुशियाँ सारी!
 
एक बहुत प्यारा रिश्ता, 
बनते-बनते रह गया। 
न आते-आते आ गयी।

By Monika Jain ‘पंछी’
 
 

Wednesday, April 13, 2016

Guru Purnima Poem in Hindi

Guru Purnima Poem in Hindi for Kids. Ved Vyasa Poornima Kavita, Shishya Shikshak Diwas Shayari, Teacher’s Day Poetry, Wishes Rhymes, Quotes, Sms, Messages, Slogans, Lines. गुरु व्यास पूर्णिमा कविता.

गुरु

बहुत मुश्किल है कह पाना 
किसी एक को गुरु,
क्या हो आधार
और कहाँ से हो शुरू?

वह कोयल जो रोज
मेरी बालकॉनी के 
सामने वाले पेड़ पर 
कूंकती है घंटों, 
वह भी बता जाती है कि 
वह चींटी जो बार-बार
नीचे उतार देने पर भी 
चढ़ आती है मेरे बिस्तर पर, 
कह जाती है 
न कोई हार,
न कोई जीत है।
 
वह चाँद जो रोज 
उग आता है आकाश में 
कर अपनी अनोखी कलाओं को साकार, 
द्वैत ही है संसार

और वह सूरज जो 
बिना कुछ पाने की उम्मीद किये 
लाता है हर रोज 
अपार ऊर्जा का भंडार, 
गहरे में उतार जाता है...
बस देना है जीवन 
किस-किस का मैं नाम लूँ
किस-किस को उतारूँ? 
किस-किस को पुकारूँ?
 
जो आँखों में है आंसूओं का सबब 
वह आग का धुआँ भी तो है 
गुरु का ही एक रूप, 
छाया जहाँ देती है
जीवन को सुख की परिभाषा, 
यह जताती है धूप

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this poem on the occasion of Guru Purnima?


Tuesday, April 12, 2016

Reincarnation Proof in Hindi

Reincarnation Evidence, Proof in Hindi, Punarjanma Essay, Rebirth Samsara Cycle Facts, Law of Karma Theory, Life After Death Beliefs, Spirit Salvation, Soul Liberation Article. पुनर्जन्म का रहस्य.
 
मैं पुनर्जन्म में विश्वास क्यों करती हूँ...

कल एक मित्र से हुई आध्यात्मिक चर्चा के दौरान उन्होंने कुछ प्रश्न पूछे जैसे : निर्वाण किसी का लक्ष्य क्योंकर होना चाहिए? क्या मुक्ति या निर्वाण को समझने के लिए पुनर्जन्म का कांसेप्ट एक जरुरी अवधारणा है? क्या हम यह नहीं मान सकते कि मुक्ति बस इसी जन्म में हमारी इच्छाओं का अंत व मन की शांति है?
 
ये कई लोगों के प्रश्न होंगे लेकिन इस प्रश्न के उत्तर पर आगे बढ़ने से पूर्व हमें निरपेक्ष मुक्ति को समझना होगा. निरपेक्ष मुक्ति, निर्वाण या मोक्ष संसार के सभी द्वैत और द्वंद्वों जैसे सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, रात-दिन, सफलता-असफलता... आदि से मुक्त होना है. मेरे ख़याल से निरपेक्ष मुक्ति का प्रश्न सिर्फ तभी उठ सकता है जब पुनर्जन्म की अवधारणा को सच माना जाए. वरना तो सापेक्ष मुक्ति ही काफी है. जैसे हमें कोई जगह अच्छी नहीं लग रही तो हम उसे छोड़ आये. कोई चीज खाना पसंद नहीं या हमारे लिए नुकसानदायक है तो हमने उसे खाना छोड़ दिया. यह सब सापेक्ष मुक्ति के उदाहरण हो सकते हैं. और अगर पुनर्जन्म को सच माना जाए तो आत्महत्या या मृत्यु भी एक सापेक्ष मुक्ति ही है.
 
जब हम पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं तो फिर हमारे सामने कई प्रश्न उठते हैं जैसे : What the hell I am doing in this universe again and again? कभी कॉकरोच, कभी मधुमक्खी, कभी गाय, कभी इंसान, कभी हाथी, कभी पुरुष, कभी स्त्री के रूप में जन्म लेकर अनंत काल तक इस संसार में भटकते रहना; हर जन्म में प्रेम, शादी और बच्चे पैदा करना...यह सब कितनी बड़ी पागलपंती वाला ख़याल है. बल्कि एक ही जन्म में हर रोज खाना, पीना, नहाना, सोना...सब काम रिपीट करते रहना भी कितनी बेतुकी सी बात है. क्या इन सबके लिए ही हम हैं? विकास, उपलब्धियों, वैज्ञानिक खोजों को भी शामिल कर लिया जाए तब भी यह सारा विकास और सुविधाएँ इस बेवकूफी भरे सांसारिक भ्रमण के लिए ही तो है. चक्रीय जीवन की ऊब की वजह से ही निर्वाण किसी का लक्ष्य होता है. यह ऊब कब होगी और कब स्थायी रूप से हमारे मन में अपने अस्तित्व को लेकर प्रश्न उठना शुरू होंगे यह कई सारी बातों पर निर्भर करता है, हमारे पूर्वजन्मों पर और हमारी चेतना के स्तर पर भी.

अब अगर कोई यह माने की बस एक ही जन्म होता है और जितने भी बुद्ध पुरुष हुए हैं उनकी मुक्ति सिर्फ उस एक जन्म से ही थी, मन की शांति और सदाचार के रूप में तो फिर कई सारे प्रश्न खड़े होते हैं. सिर्फ एक ही जन्म की शांति के लिए कोई साधना और तप के इतने कठिन रास्तें क्यों चुनेगा? तब जबकि कई मामलों में ऐसा होता है कि आत्मज्ञान/कैवल्य की प्राप्ति के साथ-साथ ही शरीर भी नष्ट हो जाता है. सिर्फ कुछ ही मामले होते हैं जैसे महावीर, गौतम बुद्ध और ऐसे ही कुछ प्रसिद्द व्यक्तित्व जो आत्मज्ञान की प्राप्ति के बाद भी कुछ वर्षों तक जीवित रहते हैं. जैसे महावीर आत्मज्ञान के बाद 40 वर्षों तक और शायद गौतम बुद्ध 30 वर्षों तक जीवित रहे थे. हिन्दुओं में तो खैर अवतार को भी माना जाता है जिसमें कोई आत्मज्ञानी अगर चाहे तो
संसार के कल्याण के लिए उपयुक्त परिस्थितियों को चुनकर फिर से जन्म भी ले सकता है. यहाँ कोई कहेगा कि संसार का कल्याण भी तो एक इच्छा ही है, तो ऐसा माना जाता है कि कर्म का बंधन सिर्फ तभी तक रहता है जब तक हमारा अहंकार रहता है. जब किसी व्यक्ति की चेतना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के साथ एकाकार हो जाती है तब वह कर्ता नहीं रह जाता. इसलिए कोई कर्म बंधन भी नहीं होता.
 
अब अगर वे व्यक्ति जो आत्मज्ञान की प्राप्ति के साथ ही शरीर भी छोड़ जाते हैं, उनके सन्दर्भ में अगर एक ही जन्म का अस्तित्व माना जाए तो फिर उनकी इतनी कठिन साधना की वजह? कौनसी शांति और कौनसे सदाचार के लिए? जन्म तो केवल एक ही माना है न आप ने. ऐसे में तो आत्महत्या भी कोई बुरा विकल्प नहीं है. अगर शांति इतनी जरुरी है तब तो आत्महत्या शायद सबसे आसान उपाय हुआ. तब कोई महावीर क्यों 12 वर्षों तक मौन रहेगा? कोई गौतम क्यों अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़कर वर्षों तक भटकेगा और जब उसे सत्य पता चल जाए तब अपनी पत्नी और पुत्र को भी उसी रास्ते पर चलने की दीक्षा देगा. जब एक ही जन्म है तो ये सब क्यों? बाकी एक अच्छा इंसान तो समाज में रहते हुए भी बना जा सकता है. फिर ये सारे झंझट क्यों? पर नहीं! ऐसा नहीं है. न सिर्फ एक अच्छा इंसान भर बन जाने से बात बन जायेगी और न ही आत्महत्या से. आत्महत्या समस्यायों का समाधान नहीं बल्कि नए जन्म के रूप में नयी समस्यायों को आमंत्रण है. वे समस्याएं जो जानी-पहचानी भी नहीं. अभी वाली कम से कम पता तो है. इसलिए आत्महत्या मुक्ति नहीं है और स्वाभाविक मृत्यु भी मुक्ति नहीं है. क्योंकि जन्म केवल एक नहीं होता बल्कि यह एक अनंत चक्र है.
 
प्रकृति का होना, इस ब्रह्माण्ड का होना, जीवन का होना ही अपने आप में एक बहुत बड़ा चमत्कार है. ऐसे में अगर आत्मा, परमात्मा या पुनर्जन्म की बातें सच हो भी तो इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है. गुलाब की एक कलम रोपकर हम एक दिन एक कली को उगते हुए देखते हैं और फिर सुगंध से सराबोर एक सुन्दर सा फूल खिल आता है. यह क्या किसी चमत्कार से कम है? हमें किसी चीज की प्रक्रिया भर मालूम है उससे क्या कोई चीज सामान्य हो जाती है? इसलिए या तो यह सम्पूर्ण अस्तित्व ही एक चमत्कार है या फिर कुछ भी चमत्कार नहीं. और ये दोनों ही बातें विरोधाभासी नहीं.
 
By Monika Jain ‘पंछी’

How is this article about reincarnation? 


Sunday, April 10, 2016

Jealousy Quotes in Hindi

Jealousy Quotes in Hindi. Jealous Sms, Insecure People Quotations, Insecurity Sayings, Envy Status, Malice Messages, Eershya Lines, Irshya Jalan Slogans, Green Eye Proverbs. ईर्ष्या पर विचार, डाह जलन.
 
Jealousy Quotes 

  • कुछ लोगों को अपनी गुरुता का अभिमान बहुत ज्यादा होता है. इन मायनों में कि जैसे उन्होंने कभी किसी को कुछ बता दिया तो इसका मतलब यह हुआ कि उस इंसान को जो कुछ भी आता है या उनके आने से पहले भी जो आता था, वह सब उनकी ही देन है. :p खैर ऐसा कोई आपवादिक सच हो तब भी अभिमान का कोई कारण बनता ही नहीं. क्योंकि जिसने दिया है उसे भी कहीं से मिला ही है. सामने वाले के स्नेह, सम्मान, विनम्रता और अत्यधिक लगाव से सिक्त व प्रभावित श्रेय / कृतज्ञता को वे पहचान नहीं पाते...और उनकी गुरुता का अभिमान और भी बढ़ जाता है. कभी-कभी स्नेह की डोर टूट जाने पर अंतत: यह अभिमान ईर्ष्या का रूप ले लेता है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • व्यक्तित्व का ऐसा कोई प्रारूप नहीं जिसे सारी दुनिया स्वीकार कर ले. महावीर, बुद्ध जैसे महामानव तक लोगों की ईर्ष्या, क्रोध से नहीं बच पाए तो हम किस खेत की मूली हैं? जिस दुनिया में मासूम, निरपराध, पूरी तरह से निर्दोष अजन्में बच्चे तक को नहीं बक्शा जाता.. उस दुनिया में यह अपेक्षा करना कि कोई हमसे नफरत नहीं करेगा, कोई हमें चोट नहीं पहुँचायेगा...पूरी तरह से बेमानी है. तो फिर रास्ता क्या है? रास्ता सिर्फ इतना है कि हम सही रास्ते पर दृढ़ता से चलते रहें. लोग जीना दुश्वार करेंगे, हमें नुकसान भी पहुँचायेंगे, हमारी आलोचना होगी, हमें अस्वीकार भी किया जाएगा...और इन सबके फलस्वरूप निराशा और उदासी हम पर हावी होगी. लेकिन इन्हें हावी होने देने से पहले एक पल हमें सोचना है कि...हम तो वही कर रहे हैं जो वो लोग चाहते हैं. और फिर उन लोगों के बारे में सोचना है जो हमसे हर हाल में प्यार करते हैं. लोग न भी हो तो वह शक्ति है जिसने हमें बनाया है फिर चाहे उसे ईश्वर कहा जाए या प्रकृति...और यहीं से हमें अपनी सकारात्मक ऊर्जा के ओरा को इतना असरदार बनाना है कि उसे किसी की ईर्ष्या या नफरत छू भी ना पाए. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • जो सारी दुनिया की ईर्ष्या से बचने की कवायद करता रहा, वह उससे ही ईर्ष्या कर बैठा जिसने उससे प्रेम किया था. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • सिर्फ सीक्रेट क्रश ही नहीं होते...होती है सीक्रेट एन्मिटी भी. बस वह ज्यादा देर तक सीक्रेट रह नहीं पाती. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • कोई अपने स्तर से ऊपर उठता प्रतीत हो तो उसे भावनात्मक शब्दों, आलोचनात्मक और व्यंग्यात्मक बाणों से फिर से अपने ही स्तर तक खींच लाने का प्रयास! ईर्ष्या, स्वार्थ और अहंकार ऐसे ही होते है न? और परीक्षा? वह भी तो ऐसी ही होती है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • दोष दर्शन की प्रवृत्ति हीनता से उत्पन्न होती है तथा ईर्ष्या से फलती फूलती है. ~ अज्ञात / Unknown  
  • गुण छोटे लोगों में द्वेष और महान व्यक्तियों में स्पर्धा पैदा करते हैं ~ फील्डिंग / Fielding
By Monika Jain ‘पंछी’

How are these quotes about jealousy? 
 
 

Saturday, April 9, 2016

Poem on Tiger in Hindi

Poem on World Tiger Day in Hindi for Nursery Kids. Bagh Diwas Kavita, Save Cheetah Poetry Lines, National Animal Rhymes, Slogans, Shayari. राष्ट्रीय पशु बाघ पर कविता, व्याघ्र बचाओ अभियान, चीता, तेंदुआ.

आओ! चलो हम बाघ बचाएं

बड़ा-बड़ा वह ताकतवर
लाल और पीला रंग लेकर
काली-काली धारी वाला
मैंने देखा बाघ निराला।
 
सुनना, सूंघना और देखना
बड़ी तीव्र इसकी क्षमता
वन, दलदल और घास भरे
मैदानों में यह रमता।
 
बड़ी तेज इसकी रफ़्तार
लम्बी दूरी से थक जाये
धीरज और ध्यान से छिपकर
निकट शिकार पे कूद लगाये।

शक्ति और गति का प्रतीक 
राष्ट्रीय पशु यह कहलाता 
मुख्य भूमिका बाघ निभाता।
 
संकट में इसका जीवन
जंगल में घुसता विकास 
करे वन्य जीवन का ह्रास।

विलुप्त हो जाए बाघ हमारे
इससे पहले हम जग जाएँ 
आओ! चलो हम बाघ बचाएं।

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this poem about tiger for kids?


Tuesday, April 5, 2016

Poem on Labour Day in Hindi

Poem on International Labour Day in Hindi for Kids. Dignity of Labor Poetry, Workers 1st May Kavita, Mazdoor Diwas Shayari, Parishram Slogans, Shramik. मजदूर दिवस कविता, श्रमिक, श्रम, परिश्रम दोहे.
 
श्रम तो बस एक पूजा है
 
क्या सिर्फ इसलिए
कि वह सड़क झाड़ता है 
और तुम सूट बूट पहन कर 
ऑफिस में बैठते हो, 
उसका काम छोटा 
और तुम्हारा काम 
बड़ा हो जाता है?

सोचो!
अगर महीनों तक 
तुम्हारी गली की सड़कें 
और नालियों की 
साफ़-सफाई न हो पाए, 
और तुम्हारे मौहल्ले में 
कचरे का ढ़ेर लग जाए,

तब अपने ही घर में तुम्हारा 
सांस लेना भी मुश्किल हो जायेगा। 
तब तुम्हारा ऑफिस के बड़े पद वाला 
रुबाब कहाँ जायेगा?

इसलिए 
काम तो कोई भी 
छोटा या बड़ा नहीं होता है, 
बल्कि अपनी जगह 
हर काम 
महत्वपूर्ण होता है।
 
जिसमें न कोई ऊँचा 
और न कोई नीचा है

By Monika Jain 'पंछी'

How is this poem about laborers on the occasion of international labour day?
 
 

Sunday, April 3, 2016

Poem on Rainbow in Hindi

Poem on Rainbow in Hindi for Kids. Seven Colours Poetry, Indradhanush ke Saat Rang Kavita, Reflection Refraction of Light Rhymes, Indra Dhanush Shayari. इन्द्रधनुष के सात रंग पर कविता. रेनबो शायरी.

इन्द्रधनुष
 
वो बारिश की बूँदें थी दर्पण 
जिनसे विक्षेपित हो पाया 
सूर्य की किरणों ने अपनी 
सतरंगी संभावनाओं का संसार!
उस प्रकाश में था सब रंगों का सार!!
 
हम सब भी तो हैं परछाईयाँ 
उसी एक परम, असीम, अदृश्य स्त्रोत की!
रंग और रूप हो चाहे जितने भी भिन्न 
पर सवारियां हैं हम सब एक ही जलपोत की!!
 
देखो जरा उस इन्द्रधनुष को,
समेटे हुए हैं अपने सातों रंगों को यूँ 
जैसे ली हो सात बच्चों ने संग-संग ही किलकारियां! 
इसने नहीं किया खुद से किसी भी रंग को जुदा
क्योंकि बेजोड़ है उसका सौन्दर्य
जिसमें गुल जाए सारी असंगतियाँ!!
 
तो क्यों न मिलकर बना ले हम
यह सारी दुनिया ही कुछ यूँ बेजोड़! 
कि बन न सके कोई इसका तोड़!!

सौन्दर्य न हो जहाँ बिखरा-बिखरा,
दूर-दूर छितरा-छितरा!
ईर्ष्या, नफरत संग गुल जाए दुश्वारियाँ सारी 
और प्रेम के गीतों से हो पुलकित
समूची यह वसुंधरा!!

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this poem about rainbow of love?


Saturday, April 2, 2016

Essay on Suicide Prevention in Hindi

Essay on Suicide Prevention in Hindi. Anti Aatmhatya Note, Atma Hatya Counseling Ways, How to Stop Suicidal Thoughts, Ideas, Aatma, Slogans, Tips, Methods, Messages, Tricks, Sms. आत्महत्या पर निबंध, लेख.

आत्महत्या कैंसिल, जीना शुरू

दो-तीन लेखकों की आत्महत्या की ख़बर आई तो खुद ही खुद की काउंसलिंग शुरू कर दी :p. वैसे जीवन जितनी भयंकर मुश्किलों से भरा पड़ा है और फिर बीच-बीच में जख्म पे नमक रगड़ने को नयी-नयी मुसीबतें और आती रहती तो ऐसे में कभी-कभी सच में बहुत टूट जाती हूँ. लगता है इस तरह से कब तक झेल पाऊँगी? दर्द की कोई तो सीमा हो? मुश्किलों का कोई तो अंत हो? दूर-दूर तक जब कोई हल नजर नहीं आता, भविष्य का अँधेरा डराने लगता है, निराशा और अकेलापन हावी होने लगते हैं, अपने परायों से भी ज्यादा पराये लगते हैं तो बहुत संभव है कदम बहक जाए. पर एक चीज जो मेरे साथ हमेशा रहती है वह है सेल्फ मोटिवेशन. जिसका रोल मेरे जीवन में सबसे अहम् है. क्योंकि मैं क्या चीज हूँ ये तो अति निकट प्राणियों को भी नहीं पता. कुछ अपवादों को छोड़कर सबके सामने बहुत समझदार और सहनशील प्राणी वाली छवि रही है हमेशा, जो कि कुछ मामलों में सच है नहीं. ऐसे में खुद ही खुद को संभालना होता है

बाकी जहाँ तक आत्महत्या का सवाल है तो फेसबुक पोस्ट्स और ब्लॉग पढ़ने के बाद सर आँखों पर बैठाने वाले जिस तरह के मेसेज आते हैं, उन्हें पढ़कर यह हक़ तो कभी का खो चुकी हूँ कि कभी इतनी कमजोर बन जाऊं कि ऐसा कोई कदम उठाने का ख़याल भी आये. क्योंकि हम जब लोगों की प्रेरणा बनने लगते हैं, लोग जब हम पर खुद से ज्यादा भरोसा करने लगते हैं तो हमारी जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है...बहुत ज्यादा. ऐसे में विश्वास का टूटना क्या होता है ये बहुत अच्छे से जानती हूँ, सो ऐसा किसी के साथ कर ही नहीं सकती. क्योंकि उम्मीदों और आशाओं के झरने जब अचानक सूखते हैं तो बहुत से लोग प्यासे रह जायेंगे. इसलिए झरने का कर्तव्य है हमेशा बहते रहना

आत्महत्या जैसे खतरनाक इरादों से बचने का जो उपाय मुझे समझ में आता है वह यही है कि जो चीज आपको नहीं मिल रही वह आप बाँटना शुरू कर दो. प्यार नहीं मिल रहा तो प्यार बाँटों, हौंसला देने वाला कोई नहीं तो दूसरों को हौंसला दो. मदद करने वाला कोई नहीं तो मदद करना शुरू कर दो. साथ देने वाला कोई नहीं तो दूसरों का सहारा बन जाओ. किसी रोते हुए को हँसा दो, किसी का दर्द सुन लो, और हो सके तो दवा बन जाओ. अनुभव कहता है ये चीजें मजबूत बनाती हैं...और फिर एक दिन ऐसा आता है कि हमें किसी की जरुरत नहीं रहती, क्योंकि हम सबकी जरुरत बन जाते हैं. 

दूसरा जो उपाय सही लगता है वह है नकारात्मक घटनाओं और नकारात्मक लोगों से दूर रहना. आप अवसाद ग्रस्त हैं तो कुछ दिनों के लिए टीवी और अख़बार को अलविदा कह दीजिये. जो भी पढ़िए, जो भी देखिये वह पाजिटिविटी लाने वाला हो. ईर्ष्या, द्वेष, नफरत, लोभ, लालच, मोह इन सबसे जितना संभव हो दूर रहें. जो परिस्थितियां हमारे हाथ में नहीं है उन्हें सहर्ष स्वीकार करें और जिन्हें ठीक किया जा सकता है उनके लिए निरंतर सकारात्मक रूप से संघर्षरत रहें. 

एक काम जो सबसे अच्छा है वह है अपनी क्रिएटिविटी को बाहर लाना. फिर चाहे यह शब्दों के जरिये हो, रंगों के जरिये, संगीत के रूप में हो या नृत्य के रूप में. क्रिएटिविटी हर हाल में सुकून देने वाली होती है. हमारी दुःख दर्द से भरी रचनाओं को भी जब गुणवत्ता के आधार पर बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएं मिलती है तो वह भी हमारे लिए ऊर्जा का स्त्रोत बन जाती है. इसलिए अवसाद के समय में अपने किसी भी शौक को जिन्दा करना या फिर कुछ नया सीखना जरुरी है. 

इसके अलावा एक चीज जो सबसे ज्यादा ऊर्जा देती है वह है हर हाल में मुस्कुराते रहना. मुस्कुराते रहने की आदत आधी परेशानियों को छू कर देती है और जो बाकी बचती है उन्हें सहने का हौंसला भी देती है. इसलिए जो भी हो, चाहे सब कुछ छिन जाए तब भी मुस्कुराहट को बचा कर रखना जरुरी है. सो आत्महत्या कैंसिल, जीना शुरू :) 

By Monika Jain 'पंछी'

How is this article about suicide prevention?