Thursday, April 21, 2016

Essay on Ego in Hindi

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असल न्याय...प्रकृति के हिस्से है

अहंकार श्रेय नहीं देता...वह सब कुछ अधीन कर लेना चाहता है.”
 
इस पंक्ति को लिखते समय न जाने कितने चेहरे आँखों के सामने से गुजर गए. उसमें से एक चेहरा था बचपन में स्कूल की एक अध्यापिका का. स्कूल के समय में पढ़ाई के साथ-साथ अन्य साहित्यिक गतिविधियों में भी मैं बहुत सक्रीय थी. पंचायत, जिला, राज्य एवं विविध स्तरों पर होने वाली प्रतियोगिताओं की जानकारी बच्चों तक पहुँचाने का कार्य उन्हीं अध्यापिका का था.
 
विषय पता चलने के बाद मैं दिन-रात मेहनत करके घर पर रखी कुछ पत्रिकाओं, किताबों और मन से डिबेट, निबंध, भाषण, कविता, पेपर रीडिंग या जो भी कोई प्रतियोगिता होती उसका कंटेंट तैयार करती थी. प्रतियोगिता का परिणाम लगभग हमेशा प्रथम रहता था. जिसकी सूचना इस तरह मिलती थी कि वह अध्यापिका सारे स्कूल के हर एक क्लास, प्रिंसिपल रूम, स्टाफ रूम सबमें घूम-घूमकर फूली न समाती हुई कहती कि मोनिका का फलां प्रतियोगिता में प्रथम स्थान आया है और उसे सारी की सारी तैयारी मैंने ही करवाई थी. उनका अपने ’मैं’ पर इतना जोर होता था कि मेरा ’मैं’ गौण हो जाता था :). ऐसा कई बार हुआ. जिस क्लास में मैं खुद बैठी होती थी वहां भी यह सूचना मुझ तक ऐसे ही पहुँचती थी, बल्कि उन्होंने तैयारी करवाई इस बात पर मेरा समर्थन भी ले लिया जाता. टीचर्स के प्रति सम्मान, उस स्कूल के माहौल का डर और मेरी अंतर्मुखता इस बात की इजाजत नहीं देती थी कि मैं कुछ विरोध में कहूँ.
 
पक्षपात को पोषण भी अहंकार से ही मिलता है. यह पक्षपात जाति पर आधारित हो सकता है, संबंधों पर आधारित हो सकता है, या कोई भी अन्य आधार हो सकता है. उस समय मैं 10th क्लास में थी और वे अध्यापिका 12th क्लास की क्लास टीचर थी. जिसकी कुछ छात्राओं से उनका विशेष लगाव था. तब जिला स्तरीय टूर्नामेंट में एक निबंध प्रतियोगिता की सूचना आई थी. उन अध्यापिका ने मुझसे कंटेंट तैयार करके लाने को कहा. कई दिनों की मेहनत के बाद मैं 30-40 पृष्ठों का एक निबंध तैयार करके ले गयी. उन्होंने मुझसे वह ले लिया और एक दो दिन बाद मुझे स्टाफ रूम में बुलाया जहाँ 12th क्लास की वे छात्राएं भी थीं. उनकी ओर इशारा करके उन अध्यापिका ने मुझे कहा कि इन लड़कियों का आखिरी साल है इस स्कूल में इसलिए इन्हें प्रतियोगिता में भेज देते हैं. ( हालाँकि मेरा भी आखिरी साल ही था उस स्कूल में...क्योंकि वहां मेरे सब्जेक्ट्स थे नहीं, लेकिन उन अध्यापिका के अनुसार मुझे और भी अवसर मिलेंगे. ) और यह कहकर वह निबंध जो मुझसे तैयार करवाया गया था उन्हें दे दिया गया. मैं चुपचाप क्लास में चली आई थी. लेकिन घर आकर बहुत रोई थी. उस समय न तो इतना बड़प्पन था कि ख़ुशी-ख़ुशी यह स्वीकार कर पाती और न ही इतना साहस कि विरोध कर पाती.
 
अगले साल स्कूल बदल गया था. नया स्कूल कोएड था और वहां बहुत स्वतंत्रता थी. लेकिन फिर भी हर विद्यालय में कुछ अध्यापक ऐसे होते ही हैं जो अपनी मान्यताओं, स्वार्थ, अहंकार और ईर्ष्या के सामने प्रतिभा का सम्मान नहीं करते. मुझे नहीं पता यह सही था या गलत लेकिन 6th क्लास से लेकर 11th क्लास तक हर साल बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड जिसमें मेरा नाम मेजोरिटी से फाइनल होता था वहां किसी एक या दो अध्यापकों के हस्तक्षेप की वजह से वह आखिरी क्लास (12th) के बच्चों को दे दिया जाता था.
 
इसी तरह जीवन कई सारे पक्षपातों का साक्षी रहा है. बहुत कुछ खोया है लेकिन मेहनत के बल पर बहुत कुछ पाया भी है. पर मन बस अब इस खोने और पाने से बहुत ऊपर उठ जाना चाहता है. कभी-कभी कुछ मामलों में अन्याय जैसा लगता था लेकिन अब समझ चुकी हूँ कि सामान्यत: मनुष्य अहंकार और इससे जनित पक्षपात, पूर्वाग्रहों, ईर्ष्या, द्वेष, मोह आदि से युक्त होता ही है. बस मात्रा और आधार अलग-अलग होते हैं. और इसी वजह से मनुष्यों द्वारा न्याय जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. इसके अलावा जीवन ऐसा है कि किसी एक के साथ भी किसी आधार पर न्याय किया जाएगा तो वह किसी और के साथ किसी अन्य आधार पर अन्याय हो ही जाएगा. इसका आशय यह नहीं कि गलत के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाई जाए. जहाँ जरुरी है वहां उठाई ही जानी चाहिए. कई बार उठाती भी हूँ, कई बार नहीं भी...जब लगता है कि शांति बड़ी चीज है. हमें कब क्या करना है यह प्रश्न सही और गलत के साथ-साथ सजगता, कर्तव्य और जिम्मेदारी का भी है. बाकी असल न्याय प्रकृति के हिस्से है और उसी के हिस्से रहेगा. और यह केवल वह प्रकृति नहीं जो बाहर है, यह वह प्रकृति भी है जो प्रारब्ध, संचित कर्मों और प्रवृत्तियों के रूप में हमारे भीतर है. यह वह प्रकृति है जो सर्वत्र है.
 
By Monika Jain ‘पंछी’

How is this memoir about ego and justice?