Tuesday, April 12, 2016

Reincarnation Proof in Hindi

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मैं पुनर्जन्म में विश्वास क्यों करती हूँ...

कल एक मित्र से हुई आध्यात्मिक चर्चा के दौरान उन्होंने कुछ प्रश्न पूछे जैसे : निर्वाण किसी का लक्ष्य क्योंकर होना चाहिए? क्या मुक्ति या निर्वाण को समझने के लिए पुनर्जन्म का कांसेप्ट एक जरुरी अवधारणा है? क्या हम यह नहीं मान सकते कि मुक्ति बस इसी जन्म में हमारी इच्छाओं का अंत व मन की शांति है?
 
ये कई लोगों के प्रश्न होंगे लेकिन इस प्रश्न के उत्तर पर आगे बढ़ने से पूर्व हमें निरपेक्ष मुक्ति को समझना होगा. निरपेक्ष मुक्ति, निर्वाण या मोक्ष संसार के सभी द्वैत और द्वंद्वों जैसे सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, रात-दिन, सफलता-असफलता... आदि से मुक्त होना है. मेरे ख़याल से निरपेक्ष मुक्ति का प्रश्न सिर्फ तभी उठ सकता है जब पुनर्जन्म की अवधारणा को सच माना जाए. वरना तो सापेक्ष मुक्ति ही काफी है. जैसे हमें कोई जगह अच्छी नहीं लग रही तो हम उसे छोड़ आये. कोई चीज खाना पसंद नहीं या हमारे लिए नुकसानदायक है तो हमने उसे खाना छोड़ दिया. यह सब सापेक्ष मुक्ति के उदाहरण हो सकते हैं. और अगर पुनर्जन्म को सच माना जाए तो आत्महत्या या मृत्यु भी एक सापेक्ष मुक्ति ही है.
 
जब हम पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं तो फिर हमारे सामने कई प्रश्न उठते हैं जैसे : What the hell I am doing in this universe again and again? कभी कॉकरोच, कभी मधुमक्खी, कभी गाय, कभी इंसान, कभी हाथी, कभी पुरुष, कभी स्त्री के रूप में जन्म लेकर अनंत काल तक इस संसार में भटकते रहना; हर जन्म में प्रेम, शादी और बच्चे पैदा करना...यह सब कितनी बड़ी पागलपंती वाला ख़याल है. बल्कि एक ही जन्म में हर रोज खाना, पीना, नहाना, सोना...सब काम रिपीट करते रहना भी कितनी बेतुकी सी बात है. क्या इन सबके लिए ही हम हैं? विकास, उपलब्धियों, वैज्ञानिक खोजों को भी शामिल कर लिया जाए तब भी यह सारा विकास और सुविधाएँ इस बेवकूफी भरे सांसारिक भ्रमण के लिए ही तो है. चक्रीय जीवन की ऊब की वजह से ही निर्वाण किसी का लक्ष्य होता है. यह ऊब कब होगी और कब स्थायी रूप से हमारे मन में अपने अस्तित्व को लेकर प्रश्न उठना शुरू होंगे यह कई सारी बातों पर निर्भर करता है, हमारे पूर्वजन्मों पर और हमारी चेतना के स्तर पर भी.

अब अगर कोई यह माने की बस एक ही जन्म होता है और जितने भी बुद्ध पुरुष हुए हैं उनकी मुक्ति सिर्फ उस एक जन्म से ही थी, मन की शांति और सदाचार के रूप में तो फिर कई सारे प्रश्न खड़े होते हैं. सिर्फ एक ही जन्म की शांति के लिए कोई साधना और तप के इतने कठिन रास्तें क्यों चुनेगा? तब जबकि कई मामलों में ऐसा होता है कि आत्मज्ञान/कैवल्य की प्राप्ति के साथ-साथ ही शरीर भी नष्ट हो जाता है. सिर्फ कुछ ही मामले होते हैं जैसे महावीर, गौतम बुद्ध और ऐसे ही कुछ प्रसिद्द व्यक्तित्व जो आत्मज्ञान की प्राप्ति के बाद भी कुछ वर्षों तक जीवित रहते हैं. जैसे महावीर आत्मज्ञान के बाद 40 वर्षों तक और शायद गौतम बुद्ध 30 वर्षों तक जीवित रहे थे. हिन्दुओं में तो खैर अवतार को भी माना जाता है जिसमें कोई आत्मज्ञानी अगर चाहे तो
संसार के कल्याण के लिए उपयुक्त परिस्थितियों को चुनकर फिर से जन्म भी ले सकता है. यहाँ कोई कहेगा कि संसार का कल्याण भी तो एक इच्छा ही है, तो ऐसा माना जाता है कि कर्म का बंधन सिर्फ तभी तक रहता है जब तक हमारा अहंकार रहता है. जब किसी व्यक्ति की चेतना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के साथ एकाकार हो जाती है तब वह कर्ता नहीं रह जाता. इसलिए कोई कर्म बंधन भी नहीं होता.
 
अब अगर वे व्यक्ति जो आत्मज्ञान की प्राप्ति के साथ ही शरीर भी छोड़ जाते हैं, उनके सन्दर्भ में अगर एक ही जन्म का अस्तित्व माना जाए तो फिर उनकी इतनी कठिन साधना की वजह? कौनसी शांति और कौनसे सदाचार के लिए? जन्म तो केवल एक ही माना है न आप ने. ऐसे में तो आत्महत्या भी कोई बुरा विकल्प नहीं है. अगर शांति इतनी जरुरी है तब तो आत्महत्या शायद सबसे आसान उपाय हुआ. तब कोई महावीर क्यों 12 वर्षों तक मौन रहेगा? कोई गौतम क्यों अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़कर वर्षों तक भटकेगा और जब उसे सत्य पता चल जाए तब अपनी पत्नी और पुत्र को भी उसी रास्ते पर चलने की दीक्षा देगा. जब एक ही जन्म है तो ये सब क्यों? बाकी एक अच्छा इंसान तो समाज में रहते हुए भी बना जा सकता है. फिर ये सारे झंझट क्यों? पर नहीं! ऐसा नहीं है. न सिर्फ एक अच्छा इंसान भर बन जाने से बात बन जायेगी और न ही आत्महत्या से. आत्महत्या समस्यायों का समाधान नहीं बल्कि नए जन्म के रूप में नयी समस्यायों को आमंत्रण है. वे समस्याएं जो जानी-पहचानी भी नहीं. अभी वाली कम से कम पता तो है. इसलिए आत्महत्या मुक्ति नहीं है और स्वाभाविक मृत्यु भी मुक्ति नहीं है. क्योंकि जन्म केवल एक नहीं होता बल्कि यह एक अनंत चक्र है.
 
प्रकृति का होना, इस ब्रह्माण्ड का होना, जीवन का होना ही अपने आप में एक बहुत बड़ा चमत्कार है. ऐसे में अगर आत्मा, परमात्मा या पुनर्जन्म की बातें सच हो भी तो इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है. गुलाब की एक कलम रोपकर हम एक दिन एक कली को उगते हुए देखते हैं और फिर सुगंध से सराबोर एक सुन्दर सा फूल खिल आता है. यह क्या किसी चमत्कार से कम है? हमें किसी चीज की प्रक्रिया भर मालूम है उससे क्या कोई चीज सामान्य हो जाती है? इसलिए या तो यह सम्पूर्ण अस्तित्व ही एक चमत्कार है या फिर कुछ भी चमत्कार नहीं. और ये दोनों ही बातें विरोधाभासी नहीं.
 
By Monika Jain ‘पंछी’

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