Monday, June 13, 2016

Poem on Buddha Purnima in Hindi

गौतम बुद्ध वैशाख पूर्णिमा कविता, सिद्धार्थ यशोधरा. Poem on Gautam Buddha Purnima in Hindi. Vaishakh Poornima Kavita, Vesak Day, Siddhartha Yashodhara, Jayanti.


सुनो बुद्ध -

हो चुके होंगे तुम मुक्त
अभी मनुष्यों ने नहीं दिया है निर्वाण तुम्हें
आये दिन तुम खड़े होते हो मुजरिम बनकर
किसी न किसी गृहस्थ प्रबुद्ध के कटघरे में।
कुसूर वही चिरंतन स्त्री पलायन।

पर तुम समझते हो
सिद्धार्थ भी तो अटका था दो ही चीज़ों में
धन और काम
इन ही दो पाटों के बीच पिस जाते हैं
सभी सांसारिक बोधिसत्व।
पर तुम कह तो सकते हो
वो तुम नहीं सिद्धार्थ था
चलो मैं कह देता हूँ।

सुनो गृहस्थ प्रबुद्धों -

कोई बुद्ध नहीं करता पलायन
सिद्धार्थ ही करते हैं।
बुद्ध पकड़ते ही नहीं
तो त्यागने का प्रश्न नहीं
सिद्धार्थ को लगता है
कि उसने पकड़ा है
सो वो ही त्यागता है
फिर सभी कुछ तो त्यागता है वो भी
तुम ही क्यूँ अटक जाते हो स्त्री पर?

फिर ये भी तो बताओ
कि लौट आये थे बुद्ध!
हर सिद्धार्थ का बुद्ध जब जन्मता है
तो स्वीकारता है वो सब
जो भूल गया था सिद्धार्थ
नि:शब्द खड़े सुनते भी तो हैं
यशोधरा के व्यथित ह्रदय को
क्या सिद्धार्थ सुन पाता?

बुद्ध के शून्य में ही समा पाता है
हर यशोधरा का प्रेम; जानती है
सिद्धार्थ में कुछ तो भोग था ही
अब यशोधरा भी समर्पित है भिक्षुणी होकर।

बस मानवों तुम्हारा ही शूल नही निकलता
पूछो अपने अंदर के सिद्धार्थ से
कितना बुद्ध पनपा है अभी
उत्तर में पाओगे स्वयं को नतमस्तक
बुद्ध के बुद्धत्व के सम्मुख
और वो शांत होंगे सदा की भाँति
इक मद्धिम मुस्कान लिए।

By Sushil Kumar

How is this poem about Gautam Buddha?