Sunday, May 1, 2016

Poem on Crying in Hindi

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मैं चाहती हूँ रोना  

 
फूट-फूट कर रोना!!
 
मन के भीतर तो
न जाने कब से
गहराता जा रहा है एक समंदर!
पर ये पलकों की जमीं
हो गयी है कितनी बंजर!!

सूरज नहीं निकलता आजकल...
धूप नहीं खेलती मेरे आँगन...
रुक गया है ग़मों का बादल बन
आँखों तक पहुँच पाना!
और फिर पलकों से टकराकर
मुसलाधार बरस जाना!!

मन शायद खोजता है सहारे!
गहरे सागर को भी तो नसीब है किनारे!!
पर वह सहारा जो झेल लेगा
कुछ पलों को आंसुओं की बौछार!
किसी दिन छूट जाएगा वह भी
बीच मझधार!!

तब मन का समंदर और भी गहरा जाएगा!
और पलकों का बिछौना फिर से पथरा जाएगा!!

इसलिए चाहती हूँ अकेले में होना!
बिन सहारों के ही रोना...फूट-फूट कर रोना!!

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this poem about crying?