Sunday, June 26, 2016

Hindi Essay on Unity in Diversity

अनेकता में एकता पर निबंध, भेदभाव. Hindi Essay on Unity in Diversity. Anekta mein Ekta, Inferiority Superiority Complex, Uniqueness, Discrimination, Exploitation.
 
मुक्ति भेदभाव से चाहिए अनूठेपन से नहीं
 
बात तब की है जब मैं कोई पांचवी या छठी क्लास में पढ़ती थी। एक बार मम्मी के साथ मैं कहीं रास्ते पर थी। हमें कहीं बाहर जाना था, बस का इंतजार हो रहा था और मम्मी मुझे एक जगह बैठाकर पास में किसी को बुलाने चली गयी। तभी वहां पर सफाई कर्मचारी की एक लड़की आई और आकर मेरे पास बैठकर मुझे बार-बार छूकर दूर चली जाती, और स्थानीय भाषा में कहती, 'देख! मैंने तुझे छू लिया...देख! मैंने तुझे छू लिया।' उसने यह पांच से छ: बार किया। मैं तटस्थ बैठी रही। उसका यह व्यवहार थोड़ा सा अजीब लगा पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी...तब बहुत ज्यादा अंतर्मुखी, शर्मीली और मासूम भी थी। लेकिन उसके जाने के बाद कुछ देर सोचा तो मन उसके प्रति दया से भर आया। क्योंकि मुझे चिढ़ाने और परेशान करने की कोशिश में वह खुद अपना ही अपमान कर रही थी। तब इतनी समझ तो नहीं थी कि उसे कुछ समझा पाती, पर आज भी इतना ही समझ पायी हूँ कि औरों को कुछ समझाने से पहले खुद को यह समझाना बहुत जरुरी है कि न मैं किसी से श्रेष्ठ हूँ और न ही किसी से कमतर।
 
अपनी कमियों को स्वीकार कर उनसे ऊपर उठना निश्चय ही जरुरी है लेकिन इसके लिए मन में हीनता से प्रेरित ईर्ष्या व द्वेष की कोई ग्रंथि रखने की आवश्यकता नहीं क्योंकि अवसर मिलने पर यही इन्फीरियरिटी कॉम्प्लेक्स सुपीरियरटी कॉम्प्लेक्स बन जाता है और ये दोनों ही कॉम्प्लेक्स कई अपराधों और समस्यायों की जड़ हैं। श्रेष्ठता के सारे मापदंड तो हमने ही निर्मित किये हैं। बाकी तो जितने भी जीवन इस धरती पर हैं वे बस अनूठे हैं...हीन या श्रेष्ठ नहीं।...और अगर हम चेतना को श्रेष्ठता का सबसे उपयुक्त मापदंड माने तब भी चेतना की श्रेष्ठता इसी में है कि वह किसी को हीन न समझे। सबमें स्वयं की अनुभूति एक आदर्श स्थिति है, पर पूर्ण आदर्श से पहले एक लम्बा रास्ता है और समाधान की दिशा यही है। बाकी तो कितनी भी क्रांतियाँ होती रहे, यह दुनिया नहीं बदलने वाली।
 
क्योंकि अक्सर जितनी भी क्रांतियाँ और आन्दोलन होते हैं वे बस शोषक को शोषित और शोषित को शोषक में रूपांतरित कर देने की कोशिश भर है। सामान्यतया कोई भी प्राणी शोषक और शोषित दोनों ही होता है। कई बार तो बात बस अवसर मिलने और न मिलने की हो जाती है। ऐसे में सबसे जरुरी है शोषक और शोषित के इस कुचक्र से ऊपर उठने के मार्ग पर बढ़ने की। इसके लिए जरुरी है कि भिन्नता को बस भिन्नता के तौर पर लिया जाए। उसे भेदभाव या किसी को नीचे और ऊपर समझने का आधार न बनाया जाए। पहले भिन्नता को भेदभाव का आधार बनाना और फिर समानता के लिए संघर्ष...आपको नहीं लगता कहीं कुछ चूक रहा है। क्योंकि समानता तो संभव है नहीं...और मुक्ति तो भेदभाव से चाहिए...अनूठेपन से नहीं। जब तक हम भिन्नता को एक अद्वितीयता के रूप में स्वीकार कर भेदभावों से ऊपर नहीं उठेंगे, तब तक क्रांतियाँ सिर्फ भेदभाव और शोषण के तरीकों और शोषक-शोषितों में बदलाव भर करेगी, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। इसलिए आवश्यक है समाधान के उस रास्ते पर बढ़ना जो विभिन्नता में एकता को महसूस कर सके।
 
By Monika Jain ‘पंछी’

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