Wednesday, June 29, 2016

Jain Philosophy : Tattva Gyan Parichay in Hindi

जैन धर्म दर्शन का तत्त्वज्ञान, तत्त्व परिचय. Jain Dharma Philosophy Tattva Gyan in Hindi. Jainism Tatva Parichay, 7 Fundamental Principles & Truths, Siddhant.
 
जैन दर्शन : तत्त्व विवेचना 
Jain Dharma Philosophy Tattva Gyan Parichay In Hindi
तत्त्व से आशय वस्तु के वास्तविक स्वरुप या स्वभाव से है। जैन दर्शन में सात तत्त्व माने गए हैं।
  1. जीव (Living Beings or Soul)
  2. अजीव (Non Living Beings)
  3. आस्रव (Influx of Karmas)
  4. बंध (Bondage of Karmas)
  5. संवर (Stoppage of Karmas)
  6. निर्जरा ( Destruction of Karmas)
  7. मोक्ष (Salvation or Liberation)
जीव (आत्मा) : आत्मा, चेतना या प्राण को ही जीव कहा जाता है। सुविधा के लिए जगत की प्रत्येक वस्तु जिसमें चेतना या प्राण है उसे हम जीव कहेंगे। जैसे मनुष्य, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, पेड़-पौधे आदि। वस्तुत: आत्मा और शरीर दो अलग-अलग तत्त्व हैं। जिसमें आत्मा जीव व शरीर अजीव है। आत्मा का पुनः उत्पादन नहीं होता है। आत्मा को अजर, अमर, अविनाशी व निराकार माना जाता है। मृत्यु के समय सांसारिक आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर को ग्रहण करती है। इस आधार पर जीव दो प्रकार के होते हैं : मुक्त आत्मा (सिद्ध जीव) और अमुक्त आत्मा (संसारी जीव)। संसारी जीवों को पुनः इन्द्रियों के आधार पर (एकेंद्रिय से पंचेन्द्रिय) पांच भागों में विभाजित किया जाता है।

अजीव : जीव (आत्मा/चेतना) के अतिरिक्त जो भी जगत में विद्यमान है उसे अजीव कहते हैं। आत्मा के बिना हमारा शरीर भी अजीव ही है। वस्तुएं जैसे कंप्यूटर, टेबल, घड़ी, पेन आदि अजीव के उदाहरण हैं। अजीव पांच प्रकार के होते हैं : पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल।

आस्रव : कर्मों की आमद को आस्रव कहा जाता है। प्राणी के जन्म और मृत्यु के चक्र में भटकने का कारण उसके कर्मों को ही माना जाता है। फिर चाहे वे पूण्य हो या पाप। मन, वचन और काया तीनों ही स्तरों पर कर्मों की आमद होती है। यह आस्रव हर क्षण होता रहता है। आस्रव के दो भेद हैं : भाव आस्रव व द्रव्य आस्रव।

बंध : कर्मों का आत्मा के साथ जुड़ना बंध कहलाता है। जब तक इन कर्मों का फल प्राप्त नहीं होता तब तक ये आत्मा के साथ जुड़े रहते हैं। मुख्य रूप से किसी भी कर्म के साथ राग या द्वेष का भाव ही कर्मों के बंधन का कारण बनते हैं। कर्मों का फल केवल तभी मिलता है जब वे आत्मा के साथ जुड़ते हैं। बंध भी दो प्रकार का होता है : भाव बांध व द्रव्य बंध।

संवर : वह प्रक्रिया जिसके द्वारा नए कर्मों की आमद को रोका जाता है, संवर कहलाती है।

निर्जरा : वह प्रक्रिया जिसके द्वारा आत्मा के साथ बंधे कर्मों को नष्ट किया जाता है, निर्जरा कहलाती है। निर्जरा के दो भेद हैं : साविपाक निर्जरा (सकाम), आविपाक निर्जरा (अकाम)। इसी तरह भाव और द्रव्य निर्जरा भी होती है।

मोक्ष : संवर और निर्जरा द्वारा जब जीव के समस्त आठों कर्मों का क्षय हो जाता है, तब उसकी आत्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाती है, इस अवस्था को मोक्ष कहा जाता है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र मिलकर मोक्ष का मार्ग बनाते हैं। इन्हें त्रिरत्न कहा जाता है। मुक्ति आत्मा का श्रेष्ठतम उद्देश्य माना जाता है।

तत्त्वों को हम एक उदाहरण से समझेंगे। एक जहाज है, जो समुद्र में तैर रहा है। जिसमें कई यात्री यात्रा कर रहे हैं। जहाज किसी जगह से क्षतिग्रस्त हो जाता है जिससे समुद्र का पानी उसमें आने लगता है। जहाज के क्षतिग्रस्त हिस्से को ठीक किया जाता है जिससे कि नया पानी न आ सके। जहाज के भीतर भरे पानी को बाहर निकाला जाता है, और जब जहाज में पानी बिल्कुल नहीं रहता तब यात्री समुद्र को पार कर लेंगे।

  • यहाँ पर जहाज अजीव (शरीर) और यात्री जीव (आत्मा) हैं। 
  • जहाज में समुद्र के पानी का आना आस्रव (कर्मों का प्रवेश) है। 
  • जहाज में जो पानी भर गया है, वह बंध कहलायेगा। 
  • जहाज के क्षतिग्रस्त हिस्से को ठीक करके पानी के आगमन को रोकना संवर (नए कर्मों की आमद को रोकना) कहलायेगा। 
  • जहाज में भरे पानी को बाहर निकालना निर्जरा (जमा कर्मों का क्षय) कहा जाएगा। 
  • यात्रियों द्वारा समुद्र को पार करना जीवात्मा द्वारा इस संसार सागर को पार कर मुक्त हो जाना (मोक्ष) कहलायेगा।

    सभी तत्त्वों की विस्तृत विवेचना हम आगे पढ़ेंगे।