Friday, June 10, 2016

Poem on Cheating in Hindi

छल कपट कविता, झूठ शायरी, धोखा, धोखेबाज. Poem on Self Cheating in Hindi. Dhoka Shayari, Dhoke par Kavita, Jhoot, Lie, Deception, Cheaters, Betrayal, Liars, Cheat.

कितना हम खुद को छलते हैं

देख दूसरों की बढ़ती को मन ही मन जलते हैं
कितना हम खुद को छलते हैं।

बार-बार गलती दोहराकर हाथ आप ही मलते हैं
कितना हम खुद को छलते हैं।

मोह, वासना और इच्छा को समझ प्रेम मचलते हैं
कितना हम खुद को छलते हैं।

बार-बार ठोकर खाकर भी हम न कभी संभलते हैं
कितना हम खुद को छलते हैं।

कितने अभिनय, कितने झूठ, कितने भ्रम पलते हैं
कितना हम खुद को छलते हैं।

मन मालिक और हम गुलाम कितने रंग बदलते हैं
कितना हम खुद को छलते हैं।

राह न जिसकी मंजिल कोई उस पर हम चलते हैं
कितना हम खुद को छलते हैं।

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this hindi poem about cheating self?