Saturday, June 11, 2016

Poem on Surrogacy in Hindi

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कोख का मोल

निवेश को बाजार ढूंढती
हमारी पूंजीवादी व्यवस्था
कहीं भी कोई गुंजाइश
क्यों छोड़ने लगी?
देखो!
आज माँ की कोख भी
चंद रुपयों के पीछे
निवेश की दौड़ दोड़ने लगी।

वासना से पूरित आँखें
अब तक तो चलते-फिरते
स्त्री को माल कहते आई है।
पर मातृत्व भी हो जाएगा
बाजार के अधीन?
किराये की कोख
आज यही हाल कहते पाई है।

पैसों की दौड़ ने सबको कर दिया है
महज़ वस्तुओं में तब्दील!
कुछ बन गए खरीदकर
और कुछ बिकाऊ
अब हो सकती है कोई भी डील।

ममता है अनमोल’ कहते चेहरों को
कल तक गर्व से इठलाते देखा।
पर ’कोख का मोल’ लगाने वालों को
बेशर्मी से इसे झूठलाते देखा।

नहीं दोष केवल उस औरत का
जो कोख के व्यापार को बैठी है।
शामिल है पूरी ही व्यवस्था जो
जीवन को महज व्यापार बना बैठी है।

अपना अंश, अपना खून,
मनुष्य की आकांक्षाएं
कोई भी सीढ़ियाँ चढ़ लेती है।
पर जो होती है सच में माँ!
वह तो किसी भी रूप के लिए
ममता के भाव गढ़ लेती है।

By Monika Jain ‘पंछी’

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