Saturday, July 2, 2016

Jiva : Tattva Gyan : Jainism in Hindi

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जैन दर्शन : तत्व परिचय : जीव 
Jiva : Tattva Gyan : Jainism in Hindi
पिछली पोस्ट में हमने जैन दर्शन में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जिन सात तत्वों में बाँटा गया है, उनके बारे में स्थूल रूप से पढ़ा था। इस लेख में हम सात तत्वों में से पहले तत्व ’जीव’ (Living Beings) का विस्तृत अध्ययन करेंगे। जीव अर्थात जिसमें भी चेतना, प्राण या आत्मा है। जैन दर्शन में जीवों की 84 लाख प्रजातियाँ बताई गयी है। सबसे सरल आधार पर जैन दर्शन में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के जीवों को दो भागों में बाँटा गया है।
  1. मुक्त आत्मा (सिद्ध जीव / Liberated Soul) 
  2. अमुक्त आत्मा (संसारी जीव / Non Liberated Soul)
मुक्त जीव : वे आत्माएं जो सभी प्रकार के कार्मिक बंधनों को नष्ट कर जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो चुकी हैं, उन्हें मुक्त जीव कहा जाता है।
 
अमुक्त जीव : वे आत्माएं जो कर्म बंधन के कारण जीवन और मृत्यु के चक्र में फंसी हुई है, उन्हें अमुक्त जीव कहा जाता है।

अमुक्त या संसारी जीवों को गति के आधार पर दो भागों में बाँटा जा सकता है।

  1. स्थावर जीव (अगतिशील / Non Mobile) (1 इंद्रिय जीव) 
  2. त्रस जीव (गतिशील / (Mobile) (2, 3, 4, 5 इंद्रिय जीव)
स्थावर जीव : जीव जो अपनी इच्छा अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण नहीं कर सकते, स्थावर जीव कहलाते हैं।

त्रस जीव : जीव जो अपनी इच्छा से एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति कर सकते हैं, उन्हें त्रस जीव कहा जाता है।

स्थावर जीव पांच प्रकार के होते हैं :
  1. पृथ्वीकाय ( Earth Bodied) 
  2. अपकाय (Water Bodied) 
  3. तेउकाय / अग्निकाय (Fire Bodied) 
  4. वायुकाय (Air Bodied) 
  5. वनस्पतिकाय (Plant Bodied)
पृथ्वीकाय : पृथ्वी, मिट्टी, धातुएं, खनिज पदार्थ आदि जिनका शरीर होता है, वे पृथ्वीकाय कहलाते हैं। जैसे : मोती, पारा, सोना, चांदी, अभ्रक, फिटकरी, सोडा, मिट्टी, पहाड़ आदि। 

अपकाय : जीव जिनका शरीर जल के रूप में होता है, उन्हें अपकाय कहा जाता है। जैसे : कुएं का पानी, तालाब, समुद्र, झील, नदी, कुहासा, ओस, बर्फ, वर्षा का पानी आदि।

तेउकाय : जीव जिनका शरीर अग्नि के रूप में होता है, उन्हें अग्निकाय कहते हैं। जैसे : जलता हुआ कोयला, चिंगारी, ज्योति, बिजली आदि।

वायुकाय : जीव जिनका शरीर हवा होती है, उन्हें वायुकाय कहा जाता है। जैसे : हवा, तूफ़ान, आंधी, चक्रवात आदि।

वनस्पतिकाय : जीव जिनका शरीर वनस्पति के रूप में होता है, उन्हें वनस्पतिकाय कहा जाता है। जैसे : वृक्ष, फूल, फल, लताएँ आदि।

वनस्पतिकाय जीव दो प्रकार के होते हैं :
  1. साधारण वनस्पतिकाय 
  2. प्रत्येक वनस्पतिकाय
साधारण वनस्पतिकाय : जब एक ही शरीर में अनन्त आत्माएं निवास करती है तो उस वनस्पति शरीर को साधारण वनस्पतिकाय या अनंताकाय कहा जाता है। जड़ें या जमीकंद जैसे प्याज, लहसुन, गाजर आदि।
 
प्रत्येक वनस्पतिकाय : जब एक शरीर में एक ही आत्मा होती है तो ऐसे जीव प्रत्येक वनस्पति काय कहलाते हैं। जैसे : पेड़, पौधे, झाड़ियाँ, फल, फूल, पत्तियाँ आदि।

अमुक्त या संसारी जीवों को इन्द्रियों के आधार पर पांच भागों में बाँटा जा सकता है।

  1. एकेंद्रिय (One Sensed) 
  2. बेइन्द्रिय (Two Sensed) 
  3. तेइन्द्रिय (Three Sensed) 
  4. चउरिन्द्रिय (Four Sensed) 
  5. पंचेन्द्रिय (Five Sensed)
एकेंद्रिय : वे जीव जिनमें सिर्फ एक इन्द्रिय ’स्पर्शन इन्द्रिय’ (Sense of Touch) होती है, एकेंद्रिय जीव कहलाते हैं। इन्हें स्थावर जीव भी कहते हैं।

बेइन्द्रिय : वे जीव जिनमें दो इन्द्रियाँ ‘स्पर्शन’ व ’रसना’ (Sense of Taste) होती है, बेइन्द्रिय जीव कहलाते हैं। जैसे केंचुआ, लट्ट, बैक्टीरिया आदि।

तेइन्द्रिय : वे जीव जिनमें तीन इन्द्रियाँ ‘स्पर्शन’, ‘रसना’, ‘घ्राण’ (Sense of Smelling) होती है, तेइन्द्रिय जीव कहलाते हैं। जैसे दीमक, खटमल, चींटियाँ आदि।

चउरिन्द्रिय : वे जीव जिनमें चार इन्द्रियाँ ‘स्पर्शन’, ‘रसना’, ‘घ्राण’ व ’चक्षु’ (Sense of Sight) होती है, उन्हें चउरिन्द्रिय जीव कहते हैं। जैसे तितली, मच्छर, मक्खी, झींगुर आदि।

पंचेन्द्रिय : वे जीव जिनमें पांच इन्द्रियाँ ‘स्पर्शन’, ‘रसना’, ‘घ्राण’, ‘चक्षु’ व ’कर्ण’ (Sense of Hearing) होती है, पंचेन्द्रिय जीव कहलाते हैं। जैसे : मनुष्य, घोड़ा, गाय, शेर, कबूतर आदि।

पंचेन्द्रिय जीव भी दो प्रकार के होते हैं।

  1. संज्ञी 5 इंद्रिय जीव (Sentient) : जिनमें पांच इन्द्रियों के साथ मन भी होता है। 
  2. असंज्ञी 5 इंद्रिय जीव (Non Sentient) : जिनमें पांच इन्द्रियाँ होती है लेकिन मन नहीं होता है।  

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