Monday, July 11, 2016

Essay on Prayer in Hindi

प्रार्थना पर निबंध. भक्ति, पूजा, समर्पण. Essay on Importance of Prayer to God in Hindi. Prarthana Nibandh. Bhakti, Puja, Devotion Article, Worship Paragraph.

Essay on Prayer in Hindi
 
प्रार्थना याचना नहीं अर्पणा है

यूँ तो घर में पूजा-पाठ का माहौल नहीं है, लेकिन घर या बाहर विशेष अवसरों पर कभी जब गणेश जी, लक्ष्मी जी, हनुमान जी आदि के भजनों, चालीसा, आरती आदि से मुख़ातिब होती थी तो मुझे इनके बोल कुछ अच्छे नहीं लगते थे। क्योंकि ज्यादातर ऐसे भजन और आरतियाँ हैं जिनमें अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए देवी-देवताओं को रिश्वत की पेशकश की गयी है। ऐसा लगता है जैसे बस अपने मतलब के लिए चापलूसी की जा रही हो। गुणों को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा हो। देवी या देवता विशेष को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया जा रहा है और बाकी सबको हीन। सारे जगत के देवी-देवताओं को पूजने वाले भक्त हनुमान जी को यह कहकर पागल बनाते हैं : “और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई।” एक बात समझ नहीं आती...हनुमान जी ऐसे तो नहीं होने चाहिए कि उन्हें दूसरों की पूजा करने से कोई आपत्ति हो। कई सारी पूजा-पाठ व व्रत पद्दतियां ऐसी हैं कि जिनमें कोई चूक हो जाने पर अनिष्ट का भय भी दिखाया गया है। ईश्वर ऐसे भी नहीं हो सकते कि वे हमें भयभीत करें।

आज आरती और चालीसा की एक किताब हाथ में आई। खोलकर पढ़ने लगी। कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत कर रही हूँ :

बालाजी को ख़ुश करने के लिए :

तिहारे सिर पै मुकुट बिराजे, कानों में कुंडल साजै
गले बिराजै अनुपम हार, अनोखी तिहारी झांकी।
तिहारे नैन सुरमा साजै, माथे पै तिलक विराजै
मुख में नागर पान लगा है, अनोखी तिहारी झांकी।।

वैष्णो देवी को ख़ुश करने के लिए :

सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।
पान, सुपारी, ध्वजा, नारियल ले तेरी भेंट चढ़ाया।।
सुवा चोली तेरे अंग विराजै केसर तिलक लगाया।
ब्रह्मा वेद पढ़े तेरे द्वारे, शंकर ध्यान लगाया।।

माँ संतोषी को ख़ुश करने के लिए :

जय संतोषी माता, जय संतोषी माता
अपने सेवक जन की सुख संपत्ति दाता।
सुन्दर चीर सुनहरी माँ धारण कीन्हों
हीरा, पन्ना दमके तन सिंगार लीन्हों।
गेरू लाल छटा छवि बदन कमल सोहे,
मंद हंसत कल्याणी त्रिभुवन मन मोहे।
भक्ति भाव माय पूजा अंगीकृत कीजै
जो मन बसै हमारे इच्छा फल दीजै।

दुर्गा चालीसा में :

कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै।।
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला।।
आशा तृष्णा निपट सतावै। मोह मदादिक सब विनशावें।।
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरो इक चित्त तुम्हें भवानी
दुर्गा चालीसा जो नर गावै। सब सुख भोग परम पद पावै।।

‘ॐ जय जगदीश हरे’ आरती में :

जो ध्याये, फल पावे, दुःख बिनसे मन का
सुख-संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे
विषय विकार मिटाओं, पाप हरो देवा ।

‘आरती श्री शिवजी की’ में :

त्रिगुण शिव की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे।।

ऊपर वर्णित विविध आरती और प्रार्थनाओं पर दृष्टि डालने पर कई सारे विरोधाभास और हास्याद्पद बातें झलक रही हैं, जिनमें से एक यह है कि एक और तो हम ईश्वर को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वह मोह-माया, राग-द्वेष आदि से मुक्त है। दूसरी और हम उसकी पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि हम उनसे अपने लिए सारे भोग, सुख और संपन्नता चाहते हैं। यहाँ कुछ लोग कहेंगे कि ईश्वर अलग है, वह निर्गुण है। देवी-देवता अलग होते हैं। उनकी पूजा मनवांछित फल पाने के लिए की जाती है और वे राग-द्वेष आदि से मुक्त नहीं होते। यह सत्य हो सकता है। लेकिन तब प्रश्न यह उठता है कि अपने उचित-अनुचित सभी स्वार्थों की सिद्धि के लिए प्रार्थना को हम धर्म या भक्ति का नाम कैसे देते हैं?

धन, संपत्ति, सुख, वैभव कोई भी कामना गलत नहीं कही जा सकती है। किन्तु ये सब अहंकार को मजबूत करने वाले साधन है। अहंकार को बढ़ाने वाले साधनों को आध्यात्म, धर्म या प्रार्थना के साथ जोड़ना उचित नहीं लगता। भौतिक जगत के सुखों की भिक्षा मांगने को प्रार्थना कह देना और खुद को धार्मिक समझ लेना कुछ अजीब सा है। इसी तर्ज पर आज धर्म व्यापार बन बैठा है।

बचपन में स्कूल में सप्ताह के हर दिन अलग प्रार्थना गायी जाती थी। तब मुझे एक प्रार्थना का बेसब्री से इंतजार रहता था : “इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो न...हम चले नेक रस्ते पे हमसे, भूलकर भी कोई भूल हो न।” सारी प्रार्थनाओं में बस एक यही मुझे सबसे अच्छी लगती थी...और सारे मन्त्रों में से ’नवकार मन्त्र’ जिसमें केवल गुणों को पूजा गया है, किसी भी नाम को नहीं, ताकि वे गुण हमारे भीतर उतर सके और हम निर्गुण स्वरुप को प्राप्त हो सके। हालाँकि कोई प्रार्थना विशेष मेरी दिनचर्या का अंग नहीं है लेकिन आज भी कभी किसी मंदिर में जाना होता है या मूर्ति के समक्ष हाथ जोड़ती हूँ तो कुछ भी मांग नहीं पाती। अब तो अपनी तकलीफों और संघर्ष को दूर करने के लिए भी कोई अर्जी भगवान को नहीं भेजती। ईश्वर के सामने जाकर कुछ माँगना ऐसा ही है जैसे हम ईश्वर को निर्देश दे रहे हैं या सिखा रहे हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। खैर! ऐसी कई प्रार्थनाएं और मन्त्र और भी हैं जिनमें निहित भावों को ईश्वर की सच्ची प्रार्थना की श्रेणी में रखा जा सकता है। जहाँ हम खुद को पूर्ण समर्पित कर स्वयं वही बन जाना चाहते हैं जिसकी हम पूजा करते हैं।

भक्तियोग भी वही मार्ग है। यहाँ मीरा, सूरदास, रसखान आदि द्वारा अपने आराध्य की लीलाओं या रूप छवि के वर्णन की आलोचना मैं नहीं कर रही क्योंकि वह आध्यात्म का एक अलग मार्ग है जहाँ आप हर जगह अपने इष्ट को ही देखने लगते हैं। और हर हाल में इष्ट का स्थान आपसे महत्वपूर्ण होता है। साकार भक्ति का यह रूप पूर्ण समर्पण है जहाँ भक्त अपने भगवान के साथ एकाकार हो जाना चाहता है। प्रार्थना वास्तव में मिटने की आकांक्षा ही हो सकती है, अहम् को मजबूत करने की नहीं। प्रार्थना में भोग की कामनाएं या इच्छाएं नहीं हो सकती। लड्डू, पेड़े आदि की घूस नहीं हो सकती। चापलूसी नहीं हो सकती।

मंदिर, मस्जिद, पूजा-पाठ की विविध सामग्रियां, आसन, मन्त्र, दिशा ये सब प्रारम्भिक साधन या पद्दतियां हो सकती है ताकि प्रार्थना हमारी जीवन चर्या में शामिल हो जाए। साथ ही इन सबका अपना-अपना विज्ञान है। लेकिन वास्तव में प्रार्थना के लिए इन सबका होना जरुरी नहीं है। ज्यों-ज्यों अहंकार का विसर्जन होता जाता है त्यों-त्यों हर पल प्रार्थना बनता जाता है।

लेकिन हम अगर अपने इष्ट को सिर्फ अपनी इच्छाओं को पूरा करने, तकलीफों को दूर करने, मोटर, गाड़ी, बंगला दिला देने के लिए ही याद करते हैं तो प्रार्थना का यह स्तर अच्छा नहीं है। प्रार्थना एक ऐसा गुण है जिसमें भक्त को स्वर्ग, सुख-संपत्ति किसी की कामना नहीं होती, वह बस अपने आराध्य में लीन हो जाना चाहता है...और मिट जाना या विसर्जित हो जाना कोई आकांक्षा नहीं होती, यह तो सभी आकांक्षाओं का खत्म होना है। संक्षेप में प्रार्थना याचना नहीं अर्पणा है, स्वयं की अर्पणा
By Monika Jain ‘पंछी’
 
 
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