Saturday, August 13, 2016

Save Animals Essay in Hindi

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Save Animals Essay in Hindi

(1)
 
अपनी ढपली अपना राग

हिंदुत्व श्रेष्ठ है इसलिए हिंदुत्व ही बचना चाहिए।
इस्लाम श्रेष्ठ है इसलिए इस्लाम ही बचना चाहिए।
इंसान श्रेष्ठ है इसलिए इंसान ही बचना चाहिए।
सारी मिथ्या घोषणाएं हमारी! बिल्कुल अपनी ढपली...अपना राग की तर्ज पर। और इन सारी घोषणाओं के पीछे जो चीज प्रमुखता से चलती है वह है : राजनीति, मालकियत, सत्ता, अहंकार, नियंत्रण और अपने विस्तार की भावना। लेकिन पानी पी-पीकर हमें अगर किसी चीज को कोसना है तो वह है धर्म! खैर...अमूर्त चीजों पर अपना गुस्सा निकालना हर हाल में बेहतर है। कम से कम इस क्रोध की अग्नि में कोई मारा तो नहीं जाता। बाकी इंसान कितना ज्यादा श्रेष्ठ है इसका पता भी तब ही चल सकता है जब इंसान और किसी जीवन के बिना इस धरती पर बच सके। बाकी जिसे सच में जीव हत्या से आपत्ति हो वह न तो गाय के मारे जाने का समर्थन कर सकता है और न ही गाय को मारने वाले इंसान को मार डालने का समर्थन कर सकता है। वैसे ये जबरन किसी को भी माता-पिता, भाई-बहन बनाने वाले इंसान भी किसी चमत्कार से कम नहीं। स्वार्थ को रिश्तों का जामा पहनाना कोई हमसे सीखे। जब तक गाय घोषणा नहीं कर देती कि मैं तुम्हारी माता हूँ, तब तक हमारे लिए यही बेहतर है कि हम अपनी भावनाओं को अपने नियंत्रण में रखे और उसे अपने बछड़े की माता ही बने रहने दें। ~ Monika Jain ‘पंछी’

(2)

प्रेम : एक सर्वव्यापी भाषा
 
घर में मेरी सबसे फेवरेट जगह होती है छत। कुछ दिन पहले छत पे ही खड़ी थी तभी पास ही के एक खाली प्लाट से नेवलों का एक प्यारा सा जोड़ा एक के पीछे एक गुजर रहा था। पीछे वाले को जाने कैसे इतनी ऊपर मैं नजर आ गयी। वह सर ऊंचा कर मुझे देखने लगा/लगी। थोड़ी दूर चलता...फिर मुंह ऊपर करके देखता, फिर कुछ दूर चलता फिर ऊपर देखता। अब आगे बढ़ चुका था, तब भी उसका पीछे मुड़कर और सर ऊंचा कर देखना जारी रहा। ऐसे ही आज नीचे एक गाय का बछड़ा खड़ा था। वह भी सर ऊपर करके लगातार 10 मिनट तक बड़ी क्यूरोसिटी से देखता रहा। मैंने प्यार से पलके झपकाई इस तरह ^_^ तो बदले में उसने भी झपका दी। :) 
उस दिन भी और आज भी मेरा इतना मन हुआ उनसे बात करने का। बार-बार यही सोच रही थी काश! मुझे उनकी या उन्हें मेरी भाषा समझ में आती तो कितनी सारी बातें करते हम लोग। लेकिन दुनिया में एक भाषा और भी तो होती है ~ प्रेम की भाषा, जो कि सर्वव्यापी है। जिसके आगे सारे शब्द बोने हो जाते हैं। ~ Monika Jain ‘पंछी’

(3)

गर आप वह पंछी होते...

एक अंकल जी कहीं पर बोलते दिखे, 'इन तोतों के लिए मैंने इतना बड़ा पिंजरा इसलिए ही बनावाया है ताकि इनकी आज़ादी में कोई खलल न पड़े।' (इत्ता बड़ा अहसान :o)

प्यारे अंकल जी,

आकाश को नापने वाले पंछियों के लिए कोई कितना बड़ा पिंजरा बनवा सकता है भला? पंछी पिंजरे में रहने को होते तो उनके पंख क्यों होते? कैदखाना स्वर्ण महल हो तब भी एक बंदिशों से रहित झोपड़ी से बदतर होता है...महसूस करके देखिये। परिंदों की आज़ादी पर यह फैसला लेने का हक़ आपको किसने दिया? उनकी आज़ादी का निर्णय उन पर ही छोड़ दीजिये न!...और भी बहुत कुछ है कहने को...पर बस आप एक पल को सोचिये - गर आप वह पंछी होते तो? ~ Monika Jain ‘पंछी’

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