Saturday, August 20, 2016

Stop Rape Quotes in Hindi

बलात्कार, यौन शोषण, दुष्कर्म. Stop Rape Quotes in Hindi. Anti Sexual Abuse, Sexually Assault, Baltkar par Nibandh, Harassment, Slogans, Essay, Sms, Status.

Stop Rape Quotes

  • बलात्कार! बलात्कार! बलात्कार! आखिर कब तक सुनना पड़ेगा ये शब्द?...कब तक? जिस शब्द को सुनकर, देखकर और पढ़कर ही रूह काँप उठती है, उसे अंजाम देने वाले दरिन्दे कौनसी दुनिया से आते हैं? अब तो उन्हें कोई अपशब्द कहना उन शब्दों का भी अपमान लगता है। जिस तरह से ये बलात्कार शब्द हमारे जीवन में अन्य सामान्य से शब्दों की तरह घुलता जा रहा है...बहुत डर लगता है। कहाँ जा रहा है हमारा समाज? कोई तो अंत हो ऐसी घटनाओं का? कभी तो ऐसा दिन आये जब ये शब्द सुनने को ना मिले...कभी तो? ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • हर बलात्कार की घटना पूरी नारी जाति की स्वतंत्रता और सहजता के घेरे को छोटे से छोटा करती जाती है और कहीं न कहीं हमारी मासूमियत का खात्मा भी। खुद का कहूँ तो कुछ वर्षों पहले तक रात के 9-10 बजे भी अकेले घर से बाहर निकलने में कोई हिचक नहीं होती थी। पढ़ाई के दिनों में रात के 2-3-4 बजे भी छत पर अकेले पढ़ लेती थी। घर से दूर अनजाने शहर में कई जगह अकेले चले जाती थी। माँ-पापा के जरुरी काम से बाहर जाने कई बार अकेले घर पर रह चुकी हूँ। आवश्यक होने पर लड़कों से भरी क्लास में अकेले पढ़ चुकी हूँ। बाहरी दुनिया से इतनी अनजान कि कोई कुछ पूछे तो उसका सीधा-सीधा और सही जवाब देना ही आता था। कुछ छिटपुट घटनाएँ होती रही लेकिन उन्होंने तब तक कोई डर पैदा नहीं किया था। लेकिन अब जैसी घटनाएँ सुनने में आ रही है...कभी-कभी वह भी सोचना पड़ता है जो कभी नहीं सोचना चाहती थी। क्या स्त्री होना कोई अपराध है? या फिर समाज की नज़रों से परिभाषित तथाकथित स्त्री के तमगे को भूलकर एक इंसान की तरह जीने की ख्वाहिश कोई जुर्म? ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • बहुत हो लिए हम सब शर्मसार! कितना शर्मसार होएँगे और कब तक होते रहेंगे? शर्म आने के लिए दुनिया में शर्म जैसी कोई चीज बची भी है? इस शब्द को कुछ दिन खूँटी पर टांगते हैं और सीधा मुद्दे पर आते हैं। आज से, और अभी से हम सब लोग अपने जीवन में या खुद से जुड़े लोगों के जीवन में ऐसा कौनसा बदलाव करने वाले हैं जिससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन घटनाओं में कुछ तो कमी आये? ये बलात्कारी आसमान से तो टपक रहे नहीं है। हमारे ही घरों में पैदा हो रहे हैं। या फिर ये बलात्कार पुरुषों के किसी नए फैशन के रूप में आया है, वैसे ही जैसे ये शर्मशार शब्द आजकल बड़ा चलन में है। जो भी हो पर मैं जानना चाहती हूँ, शर्मसार होने के अलावा हमारी और क्या-क्या भूमिका होनी चाहिए? ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • कल से देहली गैंग रेप पर कई पोस्ट्स पढ़ चुकी हूँ। हर बार कुछ भी पढ़ने के बाद बहुत कुछ होता है जो दिल से बाहर निकलना चाहता है, पर शब्दों के मामले में इतना असहाय खुद को कभी भी महसूस नहीं किया। किस अधिकार से कुछ भी कहूँ जबकि जानती हूँ कि कहने के अलावा क्या कर पाऊँगी मैं? अगर मेरा लिखा नहीं बदल सकता दूषित मानसिकताओं को तो ऐसा लिखना निरर्थक ही है न? ~ Monika Jain ‘पंछी’